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Indian Polity
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भारतीय संविधान के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) के अभिलेख न्यायालय (Court of Record) होने की स्थिति, अवमानना (Contempt of Court) की शक्ति और न्यायिक सक्रियता के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 129 के अनुसार उच्चतम न्यायालय एक अभिलेख न्यायालय होगा और उसको अपने अवमानना के लिए दंड देने की शक्ति सहित ऐसी न्यायालय की सभी शक्तियां होंगी, जिसके तहत न्यायालय को न केवल अपनी अवमानना के लिए बल्कि अधीनस्थ न्यायालयों की अवमानना के लिए भी दंडित करने की पूर्ण संवैधानिक शक्ति प्राप्त है।
- 2. 'न्यायिक अवमानना अधिनियम, 1971' के अंतर्गत दी गई परिभाषा के अनुसार, 'सिविल अवमानना' (Civil Contempt) का तात्पर्य उच्चतम न्यायालय के किसी निर्णय, डिक्री, आदेश, रिट या अन्य आदेश की wilfully (जानबूझकर) अवज्ञा करना है, जबकि 'आपराधिक अवमानना' (Criminal Contempt) के अंतर्गत ऐसा प्रकाशन या कृत्य शामिल है जो न्यायालय की गरिमा को कम करता है या न्याय के प्रशासन में हस्तक्षेप करता है।
- 3. संविधान के अनुच्छेद 142 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय को अपनी अधिकारिता का प्रयोग करते हुए ऐसा डिक्री या आदेश पारित करने की पूर्ण शक्ति प्राप्त है जो उसके समक्ष लंबित किसी वाद या विषय में पूर्ण न्याय (Complete Justice) करने के लिए आवश्यक हो, और संसद द्वारा बनाई गई किसी विधि के उपबंधों के अधीन रहते हुए ही ऐसा आदेश पूरे भारत में प्रवर्तनीय होता है।
- 4. उच्चतम न्यायालय ने 'प्रशांत भूषण अवमानना मामले (2020)' और अन्य ऐतिहासिक निर्णयों में यह प्रतिपादित किया है कि न्यायालय के अधिकार क्षेत्र और निष्पक्षता पर रचनात्मक, निष्पक्ष और सद्भावनापूर्ण आलोचना (Fair Criticism) करने वाले तार्किक बयानों को भी आपराधिक अवमानना के दायरे में माना जाएगा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19(1)(a)) इसे पूर्ण संरक्षण प्रदान करती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 गलत है क्योंकि अनुच्छेद 129 के तहत उच्चतम न्यायालय को 'अभिलेख न्यायालय' होने तथा अपनी अवमानना के लिए दंड देने की शक्ति प्राप्त है, किंतु अधीनस्थ न्यायालयों की अवमानना के मामले में दंडित करने की शक्ति मुख्य रूप से संबंधित उच्च न्यायालयों (अनुच्छेद 215 के तहत) के पास होती है। कथन 2 सही है; 'न्यायिक अवमानना अधिनियम, 1971' के अनुसार सिविल अवमानना न्यायालय के आदेशों की जानबूझकर अवज्ञा से और आपराधिक अवमानना न्याय प्रशासन में हस्तक्षेप या न्यायालय की मानहानि से संबंधित है। कथन 3 बिल्कुल सही है; संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत उच्चतम न्यायालय को 'पूर्ण न्याय' (Complete Justice) करने की अद्वितीय शक्ति प्राप्त है। कथन 4 गलत है क्योंकि न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि सद्भावनापूर्ण और निष्पक्ष आलोचना (Fair Criticism) आपराधिक अवमानना के दायरे से बाहर है और अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत संरक्षित है, बशर्ते वह न्याय प्रशासन में बाधा न डाले। इस विषय की विस्तृत और गहन जानकारी के लिए आप भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पोर्टल का अध्ययन कर सकते हैं।
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राज्य विधानमंडल के अंतर्गत विधानसभा और विधान परिषद की वित्तीय शक्तियों, धन विधेयकों तथा साधारण विधेयकों की प्रक्रिया के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 198 के अनुसार धन विधेयक (Money Bill) को विधान परिषद में पुनः स्थापित नहीं किया जा सकता है, और यदि विधानसभा द्वारा पारित कोई धन विधेयक विधान परिषद को भेजा जाता है, तो विधान परिषद के पास यह संवैधानिक शक्ति होती है कि वह उस पर अपनी संस्तुति दे सके, किंतु वह इसे न तो अस्वीकार कर सकती है और न ही चौदह दिन से अधिक की अवधि के लिए रोक सकती है।
2. संविधान के अनुच्छेद 197 के प्रावधानों के तहत यदि किसी साधारण विधेयक को विधानसभा द्वारा दूसरी बार पारित करके विधान परिषद के पास भेजा जाता है, और विधान परिषद उसे फिर से अस्वीकार कर देती है या ऐसे संशोधन करती है जिनसे विधानसभा सहमत नहीं है, तो विधान परिषद उस विधेयक को अधिकतम एक माह की अवधि तक और रोक सकती है, जिसके पश्चात वह विधेयक दोनों सदनों द्वारा उस रूप में पारित मान लिया जाता है जिस रूप में उसे विधानसभा ने दूसरी बार पारित किया था।
3. राज्य विधानमंडल द्वारा पारित किसी भी विधेयक (चाहे वह धन विधेयक हो या साधारण विधेयक) को कानून बनने के लिए राज्यपाल की अनुमति अनिवार्य होती है, और जब कोई धन विधेयक राज्यपाल की अनुमति के लिए प्रस्तुत किया जाता है, तो राज्यपाल के पास यह शक्ति होती है कि वह उस विधेयक को राज्य विधानमंडल के पास पुनर्विचार के लिए वापस भेज सके।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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संसद का अधिवेशन कौन आहूत (Summon) करता है?
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भारतीय संविधान के प्रथम भाग के अंतर्गत 'संघ एवं उसके राज्य क्षेत्र' (अनुच्छेद 1-4) और राज्यों के पुनर्गठन से संबंधित प्रावधानों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 2 के अंतर्गत संसद को विधि द्वारा ऐसे निबंधनों और शर्तों पर, जो वह ठीक समझे, संघ में नए राज्यों का प्रवेश या उनकी स्थापना करने की शक्ति प्रदान की गई है, जबकि अनुच्छेद 3 के तहत मौजूदा राज्यों के पुनर्गठन, उनके क्षेत्रों में परिवर्तन या नाम बदलने की शक्ति संसद में निहित है।
2. अनुच्छेद 3 के अधीन किसी नए राज्य के निर्माण या उसके क्षेत्र में परिवर्तन से संबंधित कोई भी विधेयक राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश के बिना संसद के किसी भी सदन में पुनः स्थापित नहीं किया जा सकता, तथा राष्ट्रपति द्वारा ऐसा विधेयक संबंधित राज्य के विधानमंडल को उसके विचार जानने के लिए भेजा जाना अनिवार्य है और राज्य विधानमंडल द्वारा व्यक्त किया गया विचार संसद के लिए पूर्ण रूप से बाध्यकारी होता है।
3. सर्वोच्च न्यायालय के 'बेरुबारी यूनियन वाद' (1960) में दिए गए परामर्श के अनुसार, भारतीय संघ के किसी भी भू-भाग (क्षेत्र) को किसी विदेशी राज्य को सौंपने के लिए अनुच्छेद 3 के तहत साधारण बहुमत से विधि बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि इसके लिए संविधान के अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संविधान संशोधन अधिनियम पारित करना अनिवार्य है, जिसे बाद में नौवें संविधान संशोधन (1960) द्वारा कार्यान्वित किया गया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान की प्रस्तावना (उद्देशिका) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. प्रस्तावना में उल्लिखित 'न्याय' (सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक) के आदर्श को रूस की क्रांति (1917) से प्रेरणा लेकर शामिल किया गया था, जबकि 'स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व' के आदर्श को फ्रांसीसी क्रांति (1789) से लिया गया है।
2. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 'बेरूबारी यूनियन वाद' (1960) में यह स्पष्ट निर्णय दिया गया था कि प्रस्तावना संविधान का एक अभिन्न अंग है और संसद अनुच्छेद 368 के तहत इसमें संशोधन कर सकती है, बशर्ते मूल ढाचे का उल्लंघन न हो।
3. प्रस्तावना में अभी तक केवल एक बार वर्ष 1976 में 42वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा संशोधन किया गया है, जिसके माध्यम से इसमें 'समाजवादी', 'पंथनिरपेक्ष' और 'अखंडता' शब्द जोड़े गए थे।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान की प्रस्तावना (उद्देशिका) और उसके ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा प्रस्तुत 'उद्देश्य प्रस्ताव' (Objectives Resolution), जिसे 22 जनवरी 1947 को संविधान सभा द्वारा सर्वसम्मति से स्वीकार किया गया था, भारतीय संविधान की प्रस्तावना का मूल आधार बना।
2. 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा प्रस्तावना में पहली और एकमात्र बार संशोधन किया गया, जिसके तहत इसमें 'समाजवादी' (Socialist), 'पंथनिरपेक्ष' (Secular) और 'अखंडता' (Integrity) शब्दों को जोड़ा गया।
3. सर्वोच्च न्यायालय ने 'केशवानंद भारती वाद (1973)' में यह स्पष्ट रूप से निर्धारित किया कि प्रस्तावना संविधान का एक अभिन्न अंग है और इसमें अनुच्छेद 368 के तहत संशोधन किया जा सकता है, बशर्ते इसके 'मूल ढाँचे' (Basic Structure) को कोई क्षति न पहुँचे।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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