BaalVikas
Menu

त्वरित लिंक्स

Indian Polity
7 views

भारतीय निर्वाचन आयोग और चुनाव सुधारों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. संविधान के अनुच्छेद 324 के अनुसार निर्वाचन आयोग मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों (यदि कोई हों) से मिलकर बनता है, जिनकी नियुक्ति संसद द्वारा बनाई गई किसी विधि के अध्यधीन राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, तथा मुख्य निर्वाचन आयुक्त को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान ही पदच्युत किया जा सकता है, जबकि अन्य निर्वाचन आयुक्तों को मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफारिश के बिना राष्ट्रपति द्वारा नहीं हटाया जा सकता है।
  2. 2. दिनेश गोस्वामी समिति (1990) ने लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनावों के लिए राज्य वित्त पोषण (State Funding) का समर्थन करते हुए यह संस्तुति की थी कि यह वित्त पोषण केवल वस्तु रूप में (in kind) होना चाहिए, न कि नकद रूप में, ताकि राजनीतिक दलों द्वारा धनबल के दुरुपयोग को नियंत्रित किया जा सके।
  3. 3. जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 33(7) के तहत कोई भी उम्मीदवार एक ही समय में अधिकतम दो निर्वाचन क्षेत्रों से लोकसभा या राज्य विधानसभा का चुनाव लड़ सकता है, तथा वर्ष 1996 में इस अधिनियम में संशोधन करके यह प्रावधान किया गया कि यदि कोई उम्मीदवार दोनों सीटों पर विजयी होता है, तो वह एक निर्वाचन क्षेत्र को छोड़कर दूसरे क्षेत्र का उपचुनाव का संपूर्ण खर्च वहन करेगा।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 असत्य है क्योंकि अनुच्छेद 324(5) के अनुसार मुख्य निर्वाचन आयुक्त को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश जैसी प्रक्रिया (महाभियोग जैसी) द्वारा ही हटाया जा सकता है, किंतु अन्य निर्वाचन आयुक्तों या प्रादेशिक आयुक्तों को मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफारिश पर ही राष्ट्रपति द्वारा हटाया जा सकता है, न कि बिना सिफारिश के। हाल ही में मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यालय की अवधि) अधिनियम, 2023 पारित किया गया है। कथन 2 सत्य है; दिनेश गोस्वामी समिति (1990) ने राजनीतिक दलों के चुनाव खर्चों को नियंत्रित करने के लिए राज्य द्वारा वित्त पोषण (State funding) का समर्थन किया था और यह सुझाव दिया था कि यह वित्त पोषण केवल वस्तु रूप में (पेट्रोल, कागज आदि) होना चाहिए न कि नकद रूप में। कथन 3 असत्य है; जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 33(7) के अनुसार एक उम्मीदवार अधिकतम दो निर्वाचन क्षेत्रों से चुनाव लड़ सकता है, किंतु 1996 के संशोधन में उपचुनाव का खर्च वहन करने का कोई प्रावधान नहीं जोड़ा गया था, बल्कि यह प्रावधान किया गया कि एक व्यक्ति के दो सीटों से जीतने पर यदि वह एक सीट छोड़ता है, तो उस खाली सीट पर उपचुनाव का खर्च तो होता है, किंतु वह खर्च उम्मीदवार द्वारा वहन नहीं किया जाता बल्कि आयोग द्वारा कराया जाता है। अधिक जानकारी के लिए पढ़ें भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था.
Share:

Related Questions

भारतीय संविधान के महत्वपूर्ण संवैधानिक संशोधनों और आपातकालीन उपबंधों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा यह उपबंधित किया गया कि राष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रीय आपातकाल (अनुच्छेद 352) की उद्घोषणा संपूर्ण भारत देश में या उसके किसी विशिष्ट भाग में एक साथ लागू की जा सकती है, तथा देश के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग आधारों पर एक साथ एकाधिक उद्घोषणाएँ भी प्रख्यापित की जा सकती हैं। 2. 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 के माध्यम से यह अनिवार्य किया गया कि राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणा केवल 'युद्ध', 'बाह्य आक्रमण' या 'सशस्त्र विद्रोह' के आधार पर ही की जा सकती है, तथा मंत्रिमंडल की लिखित संस्तुति (Written Recommendation) प्राप्त होने के पश्चात् ही राष्ट्रपति ऐसी उद्घोषणा कर सकता है। 3. राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणा करने वाले अनुमोदन प्रस्ताव को संसद के प्रत्येक सदन द्वारा उसकी घोषणा की तिथि से एक महीने के भीतर विशेष बहुमत (Special Majority) द्वारा अनुमोदित किया जाना अनिवार्य होता है, जिसे बाद में 44वें संशोधन द्वारा दो महीने से घटाकर एक महीना किया गया था। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? राज्य विधानमंडल के संदर्भ में, विधानसभा और विधान परिषद की विधाई शक्तियों, उनकी संरचना तथा आपसी गतिरोध निवारण की प्रक्रिया से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 169 के अंतर्गत किसी राज्य में विधान परिषद के सृजन या उत्सादन के लिए संसद विधि बना सकती है, बशर्ते संबंधित राज्य की विधानसभा ने इस आशय का संकल्प अपनी कुल सदस्य संख्या के बहुमत तथा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत से पारित कर दिया हो, और इस प्रकार पारित संकल्प के संबंध में राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति या संस्तुति अनिवार्य होती है। 2. साधारण विधेयक (Ordinary Bill) के पारित होने के संबंध में यदि विधान परिषद किसी विधेयक को अस्वीकार कर देती है या ऐसे संशोधन प्रस्तुत करती है जिससे विधानसभा असहमत है, या विधान परिषद द्वारा विधेयक को बिना किसी कार्रवाई के तीन महीने तक रोक लिया जाता है, तो ऐसी स्थिति में संविधान के अनुच्छेद 197 के तहत दोनों सदनों की संयुक्त बैठक (Joint Sitting) बुलाए जाने का स्पष्ट संवैधानिक प्रावधान किया गया है। 3. धन विधेयक (Money Bill) को केवल विधानसभा में ही पुनः स्थापित किया जा सकता है, और विधान परिषद को धन विधेयक को अस्वीकार करने का कोई अधिकार नहीं है; विधान परिषद को धन विधेयक प्राप्ति की तिथि से अधिकतम चौदह दिनों की अवधि के भीतर अपनी सिफारिशों के साथ या बिना सिफारिशों के विधानसभा को वापस लौटाना होता है, अन्यथा उस अवधि की समाप्ति पर वह विधेयक दोनों सदनों द्वारा उसी रूप में पारित समझा जाता है जिस रूप में वह विधानसभा द्वारा पारित किया गया था। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? भारतीय संविधान का कौन सा अनुच्छेद 'विधि के समक्ष समानता' का अधिकार देता है? भारतीय संविधान के अंतर्गत राष्ट्रपति की समाधान शक्तियों (अनुच्छेद 72) और कूटनीतिक तथा सैन्य शक्तियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति को सैन्य न्यायालय (Court Martial) द्वारा दिए गए दंड के विरुद्ध भी क्षमादान देने की पूर्ण संवैधानिक शक्ति प्राप्त है, और इस शक्ति का प्रयोग करते समय राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद की सलाह मानने के लिए पूर्णतः बाध्य होता है, भले ही दया याचिका पर पुनर्विचार करने का अनुरोध किया गया हो। 2. राज्यपाल की क्षमादान शक्ति (अनुच्छेद 161) की तुलना में राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति का दायरा अधिक विस्तृत है, क्योंकि राष्ट्रपति मृत्युदंड (Death Sentence) को पूरी तरह से क्षमा कर सकता है तथा सैन्य न्यायालयों के दंड के मामलों में भी हस्तक्षेप कर सकता है, जबकि राज्यपाल को मृत्युदंड को क्षमा करने और सैन्य न्यायालय के निर्णय पर निर्णय लेने की शक्ति प्राप्त नहीं है। 3. राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति एक न्यायिक शक्ति न होकर कार्यपालिका की विवेकपूर्ण शक्ति का हिस्सा है, और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों के अनुसार राष्ट्रपति द्वारा दया याचिका के निपटान में अत्यधिक देरी किए जाने पर कैदी की मृत्युदंड की सजा को आजीवन कारावास में बदला जा सकता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) और राज्य लोक सेवा आयोग (SPSC) के संवैधानिक प्रावधानों, क्षेत्राधिकार और प्रतिवेदनों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 320 के अनुसार संघ लोक सेवा आयोग से अखिल भारतीय सेवाओं, केंद्रीय सेवाओं और राज्य सेवाओं के सभी भर्ती मामलों में परामर्श किया जाना अनिवार्य है, और यदि सरकार आयोग के परामर्श के बिना कोई निर्णय लेती है, तो प्रभावित अभ्यर्थी इस आधार पर न्यायालय में रिट याचिका दायर कर सकता है। 2. संविधान के अनुच्छेद 323 के तहत संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) अपना वार्षिक प्रतिवेदन भारत के राष्ट्रपति को प्रस्तुत करता है, जिसे राष्ट्रपति संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाता है, जबकि राज्य लोक सेवा आयोग (SPSC) अपना प्रतिवेदन संबंधित राज्य के राज्यपाल को प्रस्तुत करता है, जिसे राज्यपाल राज्य के विधानमंडल के समक्ष रखवाता है। 3. अनुच्छेद 321 के अंतर्गत संसद या राज्य विधानमंडल (यथास्थिति) विधि द्वारा संघ लोक सेवा आयोग या राज्य लोक सेवा आयोग को उस आयोग के कृत्यों के अतिरिक्त लोक सेवाओं से संबंधित अन्य विषयों पर भी अतिरिक्त कार्य सौंपने के लिए अधिकृत कर सकता है, बशर्ते वह निगम या स्थानीय प्राधिकरण किसी सार्वजनिक संस्थान से संबंधित हो। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Log in to add to quiz, bookmark, or report issues.