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Indian Polity
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भारतीय संविधान के अंतर्गत राज्य की कार्यपालिका, विशेष रूप से राज्यपाल की अध्यादेश प्रख्यापित करने की शक्ति (अनुच्छेद 213) और मुख्यमंत्री तथा मंत्रिपरिषद के संवैधानिक संबंधों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 213 के अनुसार राज्यपाल को राज्य विधानमंडल के सत्र में न होने पर अध्यादेश प्रख्यापित करने की शक्ति प्राप्त है, और यह शक्ति राज्यपाल की एक पूर्णतः स्वतंत्र और अनियंत्रित विवेकीय शक्ति है, जिसके लिए उसे मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह की आवश्यकता नहीं होती है।
- 2. राज्यपाल द्वारा प्रख्यापित प्रत्येक अध्यादेश को राज्य विधानमंडल के पुनः समवेत होने पर उसके समक्ष प्रस्तुत किया जाना अनिवार्य है, और यदि विधानमंडल उस अध्यादेश को अस्वीकृत करने वाला संकल्प पारित कर देता है या उसकी अवधि (सामान्यतः छह सप्ताह) समाप्त हो जाती है, तो वह अध्यादेश निष्प्रभावी हो जाता है।
- 3. संविधान के अनुच्छेद 164 के अंतर्गत मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है और अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा मुख्यमंत्री की सलाह पर की जाती है, तथा राज्य के सभी मंत्री राज्यपाल के प्रसादपर्यंत पद धारण करते हैं, जिसका विधिक अर्थ यह है कि राज्यपाल किसी भी मंत्री को बिना मुख्यमंत्री की सलाह के व्यक्तिगत रूप से उसके पद से बर्खास्त कर सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 असत्य है क्योंकि राज्यपाल की अध्यादेश प्रख्यापित करने की शक्ति (अनुच्छेद 213) कोई स्वतंत्र या अनियंत्रित विवेकीय शक्ति नहीं है; इस शक्ति का प्रयोग राज्यपाल द्वारा राज्य के मुख्यमंत्री के नेतृत्व वाली मंत्रिपरिषद की सलाह पर ही किया जाता है, हालांकि कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में राष्ट्रपति के विचार के लिए विधेयक को आरक्षित करने का प्रावधान अलग है। कथन 2 सत्य है क्योंकि अनुच्छेद 213 के तहत जारी अध्यादेश को विधानमंडल के समक्ष रखना अनिवार्य होता है और सत्र आरंभ होने के 6 सप्ताह के भीतर या अस्वीकृत होने पर वह समाप्त हो जाता है। कथन 3 असत्य है क्योंकि यद्यपि सैद्धांतिक रूप से मंत्री राज्यपाल के प्रसादपर्यंत पद धारण करते हैं, किंतु संविधान की संसदीय प्रणाली की परंपराओं के अनुसार राज्यपाल किसी मंत्री को केवल तभी बर्खास्त कर सकता है जब मुख्यमंत्री इसकी अनुशंसा करे। मुख्यमंत्री की सलाह के बिना राज्यपाल की यह व्यक्तिगत बर्खास्तगी की शक्ति असंवैधानिक मानी जाती है। अधिक अध्ययन के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पोर्टल पर विजिट करें।
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भारतीय संविधान में 'मौलिक कर्तव्य' (Fundamental Duties) किस देश के संविधान से लिए गए हैं?
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भारत के महान्यायवादी (Attorney General) और नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 76 के अंतर्गत नियुक्त भारत का महान्यायवादी देश का सर्वोच्च विधि अधिकारी होता है, जिसे अपने कर्तव्यों के पालन में भारत के राज्यक्षेत्र के सभी न्यायालयों में सुनवाई का अधिकार प्राप्त है, तथा उसे संसद के दोनों सदनों या उनकी समितियों की बैठकों में बोलने और भाग लेने का अधिकार तो है, किंतु उसे संसद की किसी भी प्रक्रिया में मतदान (Voting) करने का कोई संवैधानिक अधिकार प्राप्त नहीं है।
2. नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है और उसे उसके पद से उसी रीति से और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है जिस रीति से उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है, किंतु अपनी पदमुक्ति के पश्चात् वह भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन किसी भी प्रकार का अन्य शासकीय पद धारण कर सकता है, क्योंकि संविधान में उसके पुनर्नियुक्ति पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया गया है।
3. नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) संसद की लोक लेखा समिति (Public Accounts Committee) के 'मित्र, दार्शनिक और मार्गदर्शक' के रूप में कार्य करता है, और CAG द्वारा तैयार किए गए केंद्र के लेखा-परीक्षा प्रतिवेदनों को राष्ट्रपति को प्रस्तुत किया जाता है, जो उन्हें संसद के दोनों सदनों के पटल पर रखवाते हैं।
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भारतीय संविधान की अनुसूचियों, भागों और राजभाषा से संबंधित प्रावधानों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान की ग्यारहवीं अनुसूची, जिसे 73वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 द्वारा जोड़ा गया था, में पंचायतों के प्रशासनिक नियंत्रण के लिए कुल 29 कार्यात्मक विषयों का उल्लेख किया गया है, जबकि बारहवीं अनुसूची में नगरपालिकाओं के लिए 18 कार्यात्मक विषय शामिल हैं।
2. भारतीय संविधान के भाग XVII के अंतर्गत अनुच्छेद 343 से 351 तक संघ की राजभाषा का उल्लेख किया गया है, और अनुच्छेद 348 के अनुसार उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों की सभी कार्यवाही तथा संसद एवं राज्य विधानमंडलों द्वारा पारित विधेयकों की भाषा अनिवार्य रूप से केवल हिंदी ही होगी, सिવાય इसके कि राष्ट्रपति अंग्रेजी के प्रयोग की अनुमति दें।
3. लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29A के तहत भारत निर्वाचन आयोग में राजनीतिक दलों का पंजीकरण किया जाता है, किंतु निर्वाचन आयोग के पास किसी भी पंजीकृत राजनीतिक दल का आंतरिक लोकतंत्र के उल्लंघन या अन्य कारणों से उसका पंजीकरण रद्द (De-register) करने की कोई शक्ति मूल अधिनियम में नहीं दी गई थी।
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भारत के महान्यायवादी (Attorney General) और नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 76 के तहत नियुक्त महान्यायवादी को देश के सभी न्यायालयों में सुनवाई (Audience) का अधिकार प्राप्त है, किंतु उसे संसद के किसी भी सदन में या उसकी संयुक्त बैठक में मतदान करने का कोई संवैधानिक अधिकार नहीं है।
2. भारत का नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) न केवल केंद्र और राज्य सरकारों के लेखों की संपरीक्षा (Audit) करता है, बल्कि उसे भारत की संचित निधि से धन निकालने पर पूर्व-नियंत्रण (Pre-audit) का भी पूर्ण संवैधानिक अधिकार प्राप्त है।
3. नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) अपना कार्यकाल समाप्त होने के बाद भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन किसी भी अन्य पद या नियोजन का पात्र नहीं होता है, जबकि महान्यायवादी के लिए ऐसा कोई विधिक प्रतिबंध नहीं है कि वह अपनी निजी प्रैक्टिस या वकालत नहीं कर सकता।
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भारतीय संविधान के प्रथम भाग के अंतर्गत 'संघ एवं उसके राज्य क्षेत्र' (अनुच्छेद 1-4) और राज्यों के पुनर्गठन से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 2 के अनुसार संसद, विधि द्वारा, ऐसे निबंधनों और शर्तों पर, जो वह ठीक समझे, संघ में नए राज्यों का प्रवेश या उनकी स्थापना कर सकती है, तथा यह शक्ति मुख्य रूप से उन क्षेत्रों के संबंध में प्रयोग की जाती है जो पहले से भारतीय संघ का हिस्सा नहीं हैं (बाहरी क्षेत्रों का अर्जन या प्रवेश)।
2. अनुच्छेद 3 के तहत संसद किसी राज्य के क्षेत्रफल में वृद्धि, कमी या उसकी सीमाओं में परिवर्तन कर सकती है, और इसके लिए राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति से संसद में प्रस्तुत किए जाने वाले विधेयक पर संबंधित राज्य विधानमंडल द्वारा व्यक्त किया गया मत या उसकी सिफारिशें संसद के लिए पूर्ण रूप से बाध्यकारी होती हैं।
3. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 'बेरूबारी यूनियन वाद' (1960) में दिए गए परामर्श के अनुसार, किसी भारतीय भू-भाग को किसी विदेशी राज्य को सौंपने (Cession of territory) के लिए केवल साधारण बहुमत द्वारा अनुच्छेद 3 के अंतर्गत संशोधन पर्याप्त नहीं है, बल्कि इसके लिए संविधान संशोधन अधिनियम (अनुच्छेद 368 के अंतर्गत) पारित करना अनिवार्य होता है।
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