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Indian Polity
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भारत के निर्वाचन आयोग और चुनाव सुधारों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. संविधान के अनुच्छेद 324 के प्रावधानों के अनुसार मुख्य चुनाव आयुक्त को उसके पद से हटाने की प्रक्रिया वही है जो सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने के लिए अपनाई जाती है, जबकि अन्य चुनाव आयुक्तों को मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश के बिना राष्ट्रपति द्वारा किसी भी समय हटाया जा सकता है।
  2. 2. दिनेश गोस्वामी समिति (1990) ने लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनावों के लिए सरकारी वित्तपोषण (State Funding of Elections) की सिफारिश की थी, तथा यह सुझाव दिया था कि चुनाव सुधारों के तहत उम्मीदवारों के आपराधिक रिकॉर्ड का सार्वजनिक प्रचार अनिवार्य किया जाना चाहिए।
  3. 3. जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 में किए गए संशोधनों के अनुसार अब किसी निर्वाचन क्षेत्र में चुनाव प्रचार के दौरान मतदान समाप्त होने के लिए नियत समय से ठीक पहले के 48 घंटों की अवधि में किसी भी जनसभा या जुलूस निकालने पर पूर्ण प्रतिबंध होता है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 असत्य है क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 324(5) के अनुसार मुख्य चुनाव आयुक्त को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया (संसद के दोनों सदनों द्वारा विशेष बहुमत से पारित समावेदन) के आधार पर ही हटाया जा सकता है, किंतु अन्य चुनाव आयुक्तों या क्षेत्रीय आयुक्तों को मुख्य चुनाव आयुक्त की **सिफारिश पर ही** राष्ट्रपति द्वारा हटाया जा सकता है, न कि उसकी सिफारिश के बिना। कथन 2 सत्य है; दिनेश गोस्वामी समिति ने चुनाव के सरकारी वित्तपोषण और चुनावी सुधारों से संबंधित कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए थे। कथन 3 सत्य है, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 126 के तहत मतदान समाप्त होने के समय से 48 घंटे पहले की अवधि (Silence Period) में सार्वजनिक सभाओं और चुनाव प्रचार पर प्रतिबंध होता है। अधिक जानकारी के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पोर्टल का अध्ययन करें।
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'अनुच्छेद 21' के अंतर्गत दिए गए 'प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के संरक्षण' के अधिकार के दायरे में 'निजता का अधिकार' (Right to Privacy) को उच्चतम न्यायालय की नौ-सदस्यीय संविधान पीठ द्वारा 'के. एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (2017)' मामले में सर्वसम्मति से एक मौलिक अधिकार घोषित किया गया था, जो अनुच्छेद 21 के साथ-साथ भाग-III के अन्य अनुच्छेदों के अंतर्गत भी अंतर्निहित है। 3. संविधान के अनुच्छेद 22 के उपबंधों के अनुसार निवारक नजरबंदी (Preventive Detention) के अधीन किसी भी व्यक्ति को, चाहे वह विदेशी हो या भारत का नागरिक, किसी भी परिस्थिति में बिना सलाहकार बोर्ड (Advisory Board) की राय प्राप्त किए तीन महीने से अधिक की अवधि के लिए निरुद्ध नहीं रखा जा सकता, और संसद के पास यह शक्ति नहीं है कि वह इस तीन महीने की अवधि को बिना बोर्ड की संस्तुति के बढ़ा सके। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → भारतीय संविधान के अंतर्गत राज्यों के उच्च न्यायालयों (High Courts) और अधीनस्थ न्यायालयों की संरचना, शक्तियों तथा क्षेत्राधिकार के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 217 के अनुसार उच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश को उसके पद से राष्ट्रपति द्वारा केवल सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने के लिए निर्धारित प्रक्रिया (संसद के दोनों सदनों द्वारा विशेष बहुमत से पारित समावेदन) के आधार पर ही हटाया जा सकता है, किंतु इसके लिए संबंधित राज्य के राज्यपाल की पूर्व सहमति अनिवार्य होती है। 2. संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय को रिट (Writ) जारी करने की जो शक्ति प्राप्त है, वह न केवल मूल अधिकारों के प्रवर्तन के लिए बल्कि 'अन्य प्रयोजनों' (जैसे कि साधारण विधिक अधिकारों के उल्लंघन पर) के लिए भी प्रयोग की जा सकती है, और इस दृष्टि से उच्च न्यायालय का रिट क्षेत्राधिकार उच्चतम न्यायालय के अनुच्छेद 32 के अंतर्गत प्रदत्त रिट क्षेत्राधिकार की तुलना में अधिक विस्तृत है। 3. संविधान के अनुच्छेद 233 के प्रावधानों के अंतर्गत किसी राज्य में जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति, पोस्टिंग और पदोन्नति संबंधित राज्य के राज्यपाल द्वारा उस राज्य के उच्च न्यायालय से परामर्श करने के पश्चात ही की जाती है, और न्यायिक सेवा के अन्य सदस्यों की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा राज्य लोक सेवा आयोग तथा उच्च न्यायालय से परामर्श के आधार पर नियमों के तहत की जाती है। 4. संविधान के अनुच्छेद 235 के तहत राज्य के सभी अधीनस्थ न्यायालयों पर नियंत्रण, जिसमें जिला न्यायालयों के नीचे के न्यायालयों के अधिकारियों की पोस्टिंग, प्रमोशन, पदस्थापन और अनुशासनिक नियंत्रण शामिल है, पूर्णतः संबंधित राज्य सरकार (राज्यपाल) के प्रशासनिक क्षेत्राधिकार में निहित होता है, और इसमें उच्च न्यायालय की कोई प्रशासनिक भूमिका नहीं होती है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → भारतीय संविधान के भाग-IV के अंतर्गत वर्णित राज्य के नीति निर्देशक तत्वों (DPSP) और उनके विशिष्ट अनुच्छेदों के प्रावधानों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 40 के तहत राज्य को ग्राम पंचायतों के संगठन के लिए कदम उठाने का निर्देश दिया गया है, जिसे 73वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 से पूर्व केवल एक नीति निर्देशक तत्व के रूप में मान्यता प्राप्त थी, किंतु इस संशोधन के पश्चात इसे एक संवैधानिक और अनिवार्य संस्थागत स्वरूप प्रदान कर दिया गया। 2. अनुच्छेद 44 के अंतर्गत राज्य पूरे भारत के राज्यक्षेत्र में नागरिकों के लिए एक 'समान नागरिक संहिता' (Uniform Civil Code) को सुरक्षित करने का प्रयास करेगा, और वर्तमान में देश के सभी राज्यों के लिए इसे विधिवत रूप से पूर्ण रूप से लागू करना संवैधानिक रूप से अनिवार्य कर दिया गया है। 3. अनुच्छेद 48A के अनुसार राज्य देश के पर्यावरण के संरक्षण तथा संवर्धन का और वन तथा वन्य जीवों की रक्षा करने का प्रयास करेगा, जिसे मूल संविधान में शामिल नहीं किया गया था, बल्कि इसे वर्ष 1976 के 42वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा अंतःस्थापित किया गया था। 4. संविधान के अनुच्छेद 50 के अंतर्गत राज्य की लोक सेवाओं में न्यायपालिका को कार्यपालिका से पृथक् करने के लिए राज्य कदम उठाएगा, और यह प्रावधान केवल सैद्धांतिक है क्योंकि इसका व्यावहारिक रूप से न्यायिक निर्णयों से कोई संबंध नहीं है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? 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