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Indian Polity
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भारतीय संविधान की अनुसूचियों, राजभाषाओं और राजनीतिक दलों की मान्यता से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान की आठवीं अनुसूची में मूल रूप से 14 भाषाएँ शामिल थीं, जिन्हें विभिन्न संवैधानिक संशोधनों के माध्यम से जोड़कर वर्तमान में 22 कर दिया गया है, और इस अनुसूची में 'अंग्रेजी' और 'राजस्थानी' दोनों भाषाओं को अभी तक संवैधानिक दर्जा प्राप्त नहीं हुआ है।
- 2. भारतीय संविधान के भाग XVII के अंतर्गत अनुच्छेद 348 में उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों में तथा अधिनियमों, विधेयकों आदि के लिए प्रयोग की जाने वाली भाषा का विशेष प्रावधान किया गया है, जिसके अनुसार संसद द्वारा विधि बनाकर जब तक अन्य उपबंध न किया जाए, तब तक सभी कार्यवाहियां केवल अंग्रेजी में ही होंगी।
- 3. निर्वाचन आयोग द्वारा किसी पंजीकृत राजनीतिक दल को 'राष्ट्रीय दल' (National Party) के रूप में मान्यता प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक है कि वह कम से कम चार राज्यों में लोकसभा चुनावों या आम विधानसभा चुनावों में कुल वैध मतों का कम से कम 6 प्रतिशत मत प्राप्त करे और इसके अतिरिक्त कम से कम चार अलग-अलग राज्यों से लोकसभा में कुल 4 सीटें भी जीते।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 गलत है क्योंकि संविधान की आठवीं अनुसूची में 'अंग्रेजी' भाषा को शामिल नहीं किया गया है, जबकि 'राजस्थानी' को भी अभी तक इस अनुसूची में स्थान नहीं मिला है, हालांकि मूल रूप से इसमें 14 भाषाएँ थीं जो अब बढ़कर 22 हो चुकी हैं। कथन 2 सही है; संविधान के अनुच्छेद 348 के अनुसार जब तक संसद विधि द्वारा कोई अन्य उपबंध न करे, उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों की सभी कार्यवाहियां तथा अधिनियमों के पाठ अंग्रेजी में ही होते हैं। कथन 3 सही है; भारत के निर्वाचन आयोग के नियमों के अनुसार किसी राजनीतिक दल को राष्ट्रीय दल की मान्यता के लिए आवश्यक है कि वह चार राज्यों में लोकसभा या विधानसभा चुनाव में 6% वैध मत प्राप्त करे और चार अलग-अलग राज्यों से लोकसभा में कम से कम 4 सीटें जीते। अधिक जानकारी के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पढ़ें।
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भारतीय संविधान के भाग III के अंतर्गत प्रदत्त मूल अधिकारों (Fundamental Rights) और उनके न्यायिक पुनरावलोकन (Judicial Review) के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 13 के खंड (2) के अंतर्गत राज्य ऐसा कोई कानून नहीं बना सकता जो भाग III द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों को छीनता हो या न्यून करता हो, और इस प्रकार का कोई भी कानून उल्लंघन की मात्रा तक शून्य (Void) होगा, तथा सर्वोच्च न्यायालय को अनुच्छेद 32 के तहत और उच्च न्यायालयों को अनुच्छेद 226 के तहत यह न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति प्रदान की गई है।
2. 'शक्तिकरण का सिद्धांत' (Doctrine of Severability) यह सुनिश्चित करता है कि यदि किसी अधिनियम का कोई भाग या उपबंध मूल अधिकारों के असंगत है, तो केवल वही असंगत भाग शून्य घोषित किया जाएगा, न कि पूरा अधिनियम, बशर्ते वह असंगत भाग शेष अधिनियम से इस प्रकार जुड़ा न हो कि उसे अलग करने पर पूरा कानून ही निरर्थक या निष्प्रभावी हो जाए।
3. 'अधिग्रहण का सिद्धांत' (Doctrine of Eclipse) उन पूर्व-संवैधानिक (Pre-Constitutional) विधियों पर पूर्ण रूप से लागू होता है जो संविधान लागू होने से पहले बनाई गई थीं और मूल अधिकारों से असंगत थीं, और ऐसी विधियाँ पूरी तरह से समाप्त (Dead) हो जाती हैं तथा भविष्य में किसी भी संवैधानिक संशोधन के माध्यम से उन्हें कभी भी पुनर्जीवित नहीं किया जा सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) और राज्य लोक सेवा आयोग (SPSC) के संवैधानिक प्रावधानों, क्षेत्राधिकार और प्रतिवेदनों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 320 के अनुसार संघ लोक सेवा आयोग से अखिल भारतीय सेवाओं, केंद्रीय सेवाओं और राज्य सेवाओं के सभी भर्ती मामलों में परामर्श किया जाना अनिवार्य है, और यदि सरकार आयोग के परामर्श के बिना कोई निर्णय लेती है, तो प्रभावित अभ्यर्थी इस आधार पर न्यायालय में रिट याचिका दायर कर सकता है।
2. संविधान के अनुच्छेद 323 के तहत संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) अपना वार्षिक प्रतिवेदन भारत के राष्ट्रपति को प्रस्तुत करता है, जिसे राष्ट्रपति संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाता है, जबकि राज्य लोक सेवा आयोग (SPSC) अपना प्रतिवेदन संबंधित राज्य के राज्यपाल को प्रस्तुत करता है, जिसे राज्यपाल राज्य के विधानमंडल के समक्ष रखवाता है।
3. अनुच्छेद 321 के अंतर्गत संसद या राज्य विधानमंडल (यथास्थिति) विधि द्वारा संघ लोक सेवा आयोग या राज्य लोक सेवा आयोग को उस आयोग के कृत्यों के अतिरिक्त लोक सेवाओं से संबंधित अन्य विषयों पर भी अतिरिक्त कार्य सौंपने के लिए अधिकृत कर सकता है, बशर्ते वह निगम या स्थानीय प्राधिकरण किसी सार्वजनिक संस्थान से संबंधित हो।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के प्रथम भाग के अंतर्गत 'संघ एवं उसके राज्य क्षेत्र' (अनुच्छेद 1-4) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 2 के तहत संसद को यह शक्ति प्राप्त है कि वह विधि द्वारा ऐसे निबंधनों और शर्तों पर, जो वह ठीक समझे, संघ में नए राज्यों का प्रवेश या उनकी स्थापना कर सकती है, जबकि अनुच्छेद 3 के अंतर्गत संसद को किसी राज्य के क्षेत्र को घटाने, बढ़ाने, उसके नाम या सीमा में परिवर्तन करने की शक्ति दी गई है और इस प्रकार के किसी भी विधेयक को राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश के बिना संसद के किसी भी सदन में पुनः स्थापित नहीं किया जा सकता।
2. अनुच्छेद 3 के अंतर्गत किसी राज्य के नाम, सीमा या क्षेत्र में परिवर्तन करने वाले विधेयक को राष्ट्रपति द्वारा संबंधित राज्य के विधानमंडल के पास उसके विचार जानने के लिए भेजा जाता है, और राज्य विधानमंडल द्वारा निर्धारित या अनुमत समय के भीतर व्यक्त किया गया विचार (मत) राष्ट्रपति या संसद के लिए पूर्णतः बाध्यकारी होता है, जिससे यदि राज्य विधानमंडल विधेयक के विरुद्ध प्रस्ताव पारित कर दे तो संसद उस राज्य की सीमा में परिवर्तन नहीं कर सकती।
3. अनुच्छेद 4 यह स्पष्ट करता है कि अनुच्छेद 2 और अनुच्छेद 3 के अधीन नए राज्यों का प्रवेश, स्थापना, या राज्यों के क्षेत्रों, सीमाओं या नामों में परिवर्तन करने के लिए बनाई गई विधियों को संविधान के अनुच्छेद 368 के प्रयोजन के लिए 'संविधान संशोधन' नहीं माना जाएगा, जिसका अर्थ है कि ऐसे कानून साधारण बहुमत (Simple Majority) द्वारा पारित किए जा सकते हैं।
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