Indian Polity
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भारतीय संविधान के अंतर्गत राज्य की कार्यपालिका, विशेष रूप से राज्यपाल की विधाई शक्तियों (अनुच्छेद 200 और 201) और मुख्यमंत्री की संवैधानिक स्थिति के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 200 के अनुसार, जब राज्य के विधानमंडल द्वारा कोई विधेयक पारित कर राज्यपाल के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है, तो राज्यपाल के पास यह शक्ति होती है कि वह विधेयक को अनुमति दे सकता है, अनुमति रोक सकता है, अथवा राष्ट्रपति के विचार के लिए उस विधेयक को आरक्षित रख सकता है, और यदि कोई विधेयक उच्च न्यायालय की शक्तियों को इस प्रकार कम करता है कि उसकी संवैधानिक स्थिति खतरे में पड़े, तो ऐसे विधेयक को राष्ट्रपति के लिए आरक्षित रखना राज्यपाल के लिए संवैधानिक रूप से अनिवार्य है।
- 2. अनुच्छेद 163 के तहत राज्यपाल को सहायता और सलाह देने के लिए एक मंत्रिपरिषद होती है जिसका मुखिया मुख्यमंत्री होता है, तथा राज्यपाल के स्वविवेक (Discretionary powers) से लिए गए निर्णयों की वैधता को किसी भी न्यायालय में इस आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती कि उसे ऐसा निर्णय स्वविवेक से नहीं लेना चाहिए था।
- 3. राज्य के महाधिवक्ता (Advocate General) की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है और वह राज्यपाल के प्रसादपर्यंत पद धारण करता है, किंतु मुख्यमंत्री द्वारा अपने पद से त्यागपत्र दिए जाने पर राज्य का मंत्रिपरिषद स्वतः विघटित हो जाता है, जिसके कारण महाधिवक्ता को भी अपना पद छोड़ना अनिवार्य होता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 गलत है क्योंकि अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल के पास कुछ मामलों में राष्ट्रपति के विचारार्थ विधेयक आरक्षित रखना अनिवार्य होता है (जैसे- उच्च न्यायालय की शक्तियों को derogate करने वाले विधेयक), किंतु यह पूर्णतः विवेकाधीन भी हो सकता है; हालाँकि, उच्च न्यायालय के संदर्भ में इसे अनिवार्य माना गया है, लेकिन कथन में दी गई समग्र भाषा और अन्य विकल्पों के संयोजन के अनुसार कथन 1 में तकनीकी सूक्ष्मता है। अधिक स्पष्टता के लिए, राज्यपाल के स्वविवेक और मुख्यमंत्री की शक्तियों से जुड़े विस्तृत अध्ययन हेतु आप भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पर जा सकते हैं। कथन 2 बिल्कुल सही है क्योंकि अनुच्छेद 163(3) के अनुसार राज्यपाल के स्वविवेक के निर्णय को किसी भी न्यायालय में इस आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती कि मामला स्वविवेक का था या नहीं। कथन 3 गलत है क्योंकि महाधिवक्ता का पद मुख्यमंत्री के त्यागपत्र देने से स्वतः समाप्त नहीं होता, हालाँकि परंपरा के अनुसार नई सरकार बनने पर महाधिवक्ता नया त्यागपत्र देते हैं या नए मंत्रिमंडल की सलाह से निर्णय होता है, किंतु 'स्वतः विघटित' होना विधिक रूप से पूर्ण सत्य नहीं है। अतः केवल कथन 2 सही है।
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भारतीय संविधान की अनुसूचियों, राजभाषाओं और राजनीतिक दलों की मान्यता से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान की आठवीं अनुसूची में मूल रूप से 14 भाषाएँ शामिल थीं, जिन्हें विभिन्न संवैधानिक संशोधनों के माध्यम से बढ़ाकर वर्तमान में 22 कर दिया गया है, और इस अनुसूची में 'अंग्रेजी' भाषा को आधिकारिक राजभाषा के रूप में सम्मिलित किया गया है, जबकि 'राजस्थानी' को अभी तक इसमें स्थान नहीं मिला है।
2. भारतीय संविधान के भाग XVII के अंतर्गत अनुच्छेद 351 में यह प्रावधान किया गया है कि संघ का यह कर्तव्य होगा कि वह हिंदी भाषा का प्रसार बढ़ाए, उसका विकास करे ताकि वह भारत की सामासिक संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके।
3. निर्वाचन आयोग के नियमानुसार किसी पंजीकृत दल को 'राष्ट्रीय दल' (National Party) के रूप में मान्यता प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक है कि वह कम से कम चार राज्यों में लोकसभा चुनाव या विधानसभा चुनावों में वैध मतों का कम से कम 6 प्रतिशत मत प्राप्त करे और इसके अतिरिक्त कम से कम चार राज्यों से लोकसभा में कुल 4 सीटें भी जीते।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के भाग II (अनुच्छेद 5-11) के अंतर्गत नागरिकता के प्रावधानों और 'भारतीय नागरिकता अधिनियम, 1955' के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 9 के स्पष्ट प्रावधान के अनुसार, यदि कोई भारतीय नागरिक स्वेच्छा से किसी विदेशी राज्य की नागरिकता अर्जित कर लेता है, तो उसकी भारतीय नागरिकता स्वतः समाप्त हो जाएगी, तथा इस विषय पर अंतिम निर्णय लेने की अनन्य शक्ति भारत के उच्चतम न्यायालय के पास निहित है।
2. भारतीय नागरिकता अधिनियम, 1955 के तहत जन्म से नागरिकता (Citizenship by Birth) प्राप्त करने के नियम में संशोधन करते हुए यह अनिवार्य किया गया है कि 3 दिसंबर 2004 के पश्चात भारत में जन्मा वही व्यक्ति भारत का नागरिक होगा जिसके माता-पिता दोनों जन्म के समय भारत के नागरिक हों अथवा उनमें से एक भारत का नागरिक हो और दूसरा जन्म के समय अवैध प्रवासी (Illegal Migrant) न हो।
3. नागरिकता संशोधन अधिनियम, 2019 (CAA) के अंतर्गत अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से 31 दिसंबर 2014 को या उससे पहले भारत में प्रवेश करने वाले हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदायों के प्रवासियों को अवैध प्रवासी नहीं माना जाएगा और उन्हें देशीयकरण (Naturalization) के माध्यम से नागरिकता प्राप्त करने के लिए निर्धारित निवास की सामान्य अवधि को 11 वर्ष से घटाकर 5 वर्ष कर दिया गया है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संसद की विधाई प्रक्रिया और लोकसभा व राज्यसभा की शक्तियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 109 के अंतर्गत धन विधेयक (Money Bill) केवल लोकसभा में ही पुनःस्थापित किया जा सकता है और राज्यसभा इसे अस्वीकार या संशोधित नहीं कर सकती है, तथा राज्यसभा को इस पर अपनी सिफारिशें देने के लिए अधिकतम 14 दिनों का समय मिलता है, जिसे यदि राज्यसभा उस अवधि में नहीं लौटाती है, तो उस विधेयक को दोनों सदनों द्वारा उस रूप में पारित मान लिया जाता है जिस रूप में वह लोकसभा द्वारा पारित किया गया था।
2. अनुच्छेद 108 के तहत राष्ट्रपति द्वारा आहूत की जाने वाली दोनों सदनों की संयुक्त बैठक (Joint Sitting) की अध्यक्षता लोकसभा अध्यक्ष द्वारा की जाती है, और यदि लोकसभा अध्यक्ष अनुपस्थित हैं, तो लोकसभा का उपाध्यक्ष या राज्यसभा का उपसभापति (उस क्रम में) इस बैठक की अध्यक्षता करता है, किंतु यदि ये सभी अनुपस्थित हों, तो उपस्थित सदस्यों द्वारा अपने में से चुने गए किसी अन्य व्यक्ति द्वारा इसकी अध्यक्षता की जा सकती है।
3. संविधान संशोधन विधेयक (Constitutional Amendment Bill), जो अनुच्छेद 368 के तहत लाया जाता है, के संबंध में लोकसभा और राज्यसभा दोनों को समान शक्तियाँ प्राप्त हैं, और ऐसे किसी विधेयक पर दोनों सदनों के बीच गतिरोध उत्पन्न होने पर अनुच्छेद 108 के अंतर्गत संयुक्त बैठक बुलाए जाने का प्रावधान स्पष्ट रूप से संविधान में किया गया है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के भाग-III (मूल अधिकार) के अंतर्गत प्रदत्त निवारक निरोध (Preventive Detention) और संवैधानिक उपचारों के अधिकारों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 22 के अंतर्गत निवारक निरोध के अधीन गिरफ्तार किए गए किसी भी व्यक्ति (चाहे वह नागरिक हो या विदेशी) को अधिकतम तीन महीने तक ही निरुद्ध रखा जा सकता है, और यदि इस अवधि से अधिक समय तक निरोध को जारी रखना हो, तो उसके लिए उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की योग्यता रखने वाले व्यक्तियों से गठित एक सलाहकार बोर्ड (Advisory Board) की संस्तुति आवश्यक होती है।
2. अनुच्छेद 32 के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय जाने का अधिकार स्वयं में एक मूल अधिकार है, और 'अधिकार पृच्छा' (Quo-Warranto) को छोड़कर अन्य चारों रिटों (बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, उत्प्रेषण और प्रतिषेध) को जारी करने की शक्ति संसद द्वारा विधि बनाकर केवल उच्च न्यायालयों को दी जा सकती है, किंतु सर्वोच्च न्यायालय केवल अनुच्छेद 32 के तहत ही रिट जारी कर सकता है।
3. अनुच्छेद 33 के अंतर्गत संसद को यह शक्ति प्राप्त है कि वह सशस्त्र बलों, अर्ध-सैनिक बलों, पुलिस बलों और खुफिया एजेंसियों के सदस्यों के मूल अधिकारों पर प्रतिबंध लगा सकती है या उन्हें समाप्त कर सकती है ताकि उनके कर्तव्यों का उचित निर्वहन और अनुशासन सुनिश्चित किया जा सके, तथा इस प्रकार के कानून बनाने की शक्ति केवल संसद के पास है, राज्य के विधानमंडलों के पास नहीं।
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भारतीय संविधान के भाग-IV के अंतर्गत वर्णित 'राज्य के नीति निर्देशक तत्वों' (DPSP - अनुच्छेद 36-51) की प्रकृति, संशोधनों और न्यायिक व्याख्या के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 39(b) और 39(c) के अंतर्गत निहित नीति निर्देशक सिद्धांतों को प्रभावी बनाने के लिए संसद या राज्य विधानमंडलों द्वारा बनाई गई किसी विधि को इस आधार पर असंवैधानिक घोषित नहीं किया जा सकता कि वह अनुच्छेद 14 या अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों को छीनती या न्यून करती है, और यह संरक्षण मूल संविधान में ही निहित था जिसे बाद में 42वें संविधान संशोधन द्वारा विस्तारित किया गया था।
2. निर्देशक तत्वों को न्यायपालिका द्वारा अपरिवर्तनीय (Non-justiciable) घोषित किया गया है, किंतु सर्वोच्च न्यायालय ने अपने कई ऐतिहासिक निर्णयों (जैसे मिनर्वा मिल्स वाद, 1980) में यह स्पष्ट किया है कि मूल अधिकार और नीति निर्देशक तत्व एक-दूसरे के पूरक हैं और इनके बीच का संतुलन संविधान के 'मूल ढाँचे' (Basic Structure) का एक अनिवार्य हिस्सा है।
3. अनुच्छेद 48 के तहत राज्य कृषि और पशुपालन को आधुनिक और वैज्ञानिक प्रणालियों से संगठित करने के प्रयास करेगा, और विशेष रूप से गायों और बछड़ों तथा अन्य दुधारू और वाहक पशुओं की नस्लों के परीक्षण और सुधार के लिए तथा उनके वध का प्रतिषेध करने के लिए कदम उठाएगा, और यह एक समाजवादी विचारधारा पर आधारित नीति निर्देशक तत्व है।
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भारतीय संविधान के भाग I के अंतर्गत 'संघ एवं उसके राज्य क्षेत्र' (अनुच्छेद 1-4) और नए राज्यों के निर्माण या सीमा परिवर्तन की विधायी प्रक्रिया के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 2 के अंतर्गत संसद को यह शक्ति प्राप्त है कि वह संघ में नए राज्यों का प्रवेश या उनकी स्थापना ऐसे निबंधनों और शर्तों पर कर सके जो वह ठीक समझे, जबकि अनुच्छेद 3 के तहत संसद को मौजूदा राज्यों के क्षेत्रों, सीमाओं या नामों में परिवर्तन करने की शक्ति प्रदान की गई है।
2. अनुच्छेद 3 के तहत नए राज्यों के निर्माण या किसी राज्य के क्षेत्र, सीमा या नाम में परिवर्तन करने वाला कोई भी विधेयक संसद के किसी भी सदन में केवल तभी प्रस्तुत किया जा सकता है जब राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश प्राप्त हो, और राष्ट्रपति द्वारा ऐसा विधेयक संबंधित राज्य के विधानमंडल के पास उसकी राय जानने के लिए भेजा जाना संवैधानिक रूप से अनिवार्य है, भले ही राज्य विधानमंडल द्वारा दी गई राय को मानना संसद के लिए बाध्यकारी न हो।
3. अनुच्छेद 4 के स्पष्ट प्रावधान के अनुसार, अनुच्छेद 2 या अनुच्छेद 3 के तहत नए राज्यों के प्रवेश, स्थापना, या राज्यों के पुनर्गठन से संबंधित किए गए कानून संविधान के अनुच्छेद 368 के प्रयोजन के लिए 'संविधान संशोधन' माने जाएंगे, जिसके लिए संसद के विशेष बहुमत तथा आधे राज्यों के विधानमंडलों के अनुसमर्थन की अनिवार्य आवश्यकता होती है।
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