Indian Polity
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भारतीय संविधान के भाग II (अनुच्छेद 5-11) के अंतर्गत नागरिकता के प्रावधानों और नागरिकता अधिनियम, 1955 के संशोधनों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान का अनुच्छेद 9 यह प्रावधान करता है कि यदि कोई भारतीय नागरिक स्वेच्छा से किसी विदेशी राज्य की नागरिकता प्राप्त कर लेता है, तो उसकी भारतीय नागरिकता स्वतः समाप्त हो जाएगी, किंतु यह नियम केवल शांति काल में लागू होता है, युद्ध काल या राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान संसद की पूर्व अनुमति से विदेशी नागरिकता ग्रहण करने पर नागरिकता समाप्त नहीं होती है।
- 2. नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2019 के माध्यम से अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से आने वाले हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदायों के प्रवासियों को नागरिकता प्रदान करने के लिए एक विशेष प्रावधान किया गया है, जिसके तहत 31 दिसंबर 2014 या उससे पहले भारत में प्रवेश करने वाले इन व्यक्तियों को अवैध प्रवासी (Illegal Migrant) नहीं माना जाएगा।
- 3. संविधान का अनुच्छेद 11 संसद को यह पूर्ण शक्ति प्रदान करता है कि वह नागरिकता के अर्जन और उसकी समाप्ति तथा नागरिकता से संबंधित अन्य सभी विषयों के संबंध में कोई भी उपबंध कर सके, और इस शक्ति के प्रयोग के अंतर्गत संसद द्वारा बनाए गए किसी भी कानून को केवल इस आधार पर न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती कि वह संविधान के भाग-III (मूल अधिकार) का उल्लंघन करता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 असत्य है क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 9 के अनुसार यदि कोई भारतीय नागरिक स्वेच्छा से किसी विदेशी राज्य की नागरिकता अर्जित कर लेता है, तो उसकी भारतीय नागरिकता स्वतः समाप्त हो जाती है। इसमें युद्ध काल या राष्ट्रीय आपातकाल जैसी किसी भी स्थिति के लिए कोई अपवाद या छूट का प्रावधान नहीं किया गया है। कथन 2 सत्य है; नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2019 (CAA) के तहत अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान के उन अल्पसंख्यक समुदायों (हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई) को अवैध प्रवासी की परिभाषा से छूट दी गई है जो 31 दिसंबर 2014 से पहले भारत में आए थे। कथन 3 असत्य है क्योंकि संसद द्वारा अनुच्छेद 11 के तहत बनाई गई कोई भी विधि संविधान के अन्य प्रावधानों, विशेषकर भाग-III (मूल अधिकारों जैसे अनुच्छेद 14 और 21) के अधीन होती है, और यदि नागरिकता से संबंधित कोई कानून मूल अधिकारों का उल्लंघन करता है, तो न्यायपालिका उसकी न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) कर सकती है। अधिक जानकारी के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पोर्टल पर विजिट करें।
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भारतीय संविधान के 73वें संशोधन अधिनियम, 1992 के अंतर्गत पंचायती राज संस्थाओं के प्रावधानों और उनकी संरचना के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के भाग-IX के अनुच्छेद 243घ (Article 243D) के अनुसार पंचायतों के सभी स्तरों पर महिलाओं के लिए कुल सीटों के कम से कम एक-तिहाई (33%) सीटें आरक्षित होना अनिवार्य है, तथा यह आरक्षण प्रत्यक्ष रूप से चुने जाने वाले अध्यक्षों (Chairpersons) के पदों पर भी लागू होता है।
2. 73वें संविधान संशोधन के द्वारा प्रत्येक राज्य में पंचायतों के वित्तीय स्वास्थ्य की समीक्षा के लिए एक 'राज्य वित्त आयोग' (State Finance Commission) के गठन का प्रावधान अनुच्छेद 243झ (Article 243I) के तहत किया गया है, जिसके सदस्यों की योग्यता और उनके चयन की पद्धति का निर्धारण राज्य के राज्यपाल द्वारा किया जाता है।
3. इस संशोधन अधिनियम के लागू होने के पश्चात गठित ग्यारहवीं अनुसूची में पंचायतों की कार्यक्षमता के लिए कुल 29 विषयों को सूचीबद्ध किया गया है, और इन सभी 29 विषयों पर विधि बनाकर कार्य करने का अधिकार राज्यों के लिए अनिवार्य (Mandatory) कर दिया गया है, जिसे राज्य सरकारें अपनी इच्छा से अस्वीकार नहीं कर सकतीं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के निर्माण और संविधान सभा की कार्यप्रणाली के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान सभा के लिए जुलाई-अगस्त 1946 में हुए चुनावों में कुल 296 सीटों के लिए ब्रिटिश भारत के प्रांतों से चुनाव हुए थे, जिसमें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को 208 सीटें और मुस्लिम लीग को 73 सीटें प्राप्त हुई थीं, जबकि रियासतें (Princely States) अपनी स्वेच्छा से संविधान सभा में शामिल होने के कारण शुरुआती दौर में इस निर्वाचन प्रक्रिया का हिस्सा थीं।
2. संविधान सभा के प्रथम सत्र (9 दिसंबर 1946) का मुस्लिम लीग द्वारा बहिष्कार किया गया था, जिसके कारण सभा के अस्थायी अध्यक्ष के रूप में डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा को चुना गया, जो सभा के सबसे वरिष्ठ सदस्य थे, और यह फ्रांसीसी प्रथा पर आधारित था।
3. संविधान सभा द्वारा संविधान के निर्माण हेतु कुल 22 प्रमुख समितियों का गठन किया गया था, जिसमें संचालन समिति के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद थे, जबकि प्रारूप समिति (Drafting Committee) के अध्यक्ष डॉ. बी. आर. अम्बेडकर थे, जिसमें कुल सदस्यों की संख्या अध्यक्ष सहित सात थी।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) की विभिन्न शक्तियों, विशेषकर उसकी अंतर्निहित शक्तियों (Inherent Powers), समीक्षा क्षेत्राधिकार और राष्ट्रपति की सलाहकारिता अधिकारिता (अनुच्छेद 143) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत उच्चतम न्यायालय को अपनी अधिकारिता का प्रयोग करते हुए ऐसा 'पूर्ण न्याय' (Complete Justice) करने का विशेष विवेक अधिकार प्राप्त है, जिसके आदेश या डिक्री का प्रवर्तन पूरे भारत में होगा, और संसद द्वारा बनाई गई किसी विधि के प्रावधान इस शक्ति के प्रयोग में किसी भी प्रकार की बाधा उत्पन्न नहीं कर सकते हैं।
2. अनुच्छेद 143 के अंतर्गत राष्ट्रपति द्वारा मांगे गए परामर्श पर विचार करने के लिए उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ (Constitutional Bench) का गठन करना अनिवार्य होता है, जिसमें कम से कम पांच न्यायाधीश होने चाहिए, तथा न्यायालय द्वारा दी गई सलाहकार राय राष्ट्रपति के लिए पूर्णतः बाध्यकारी होती है।
3. उच्चतम न्यायालय के 'पुनरावलोकन क्षेत्राधिकार' (Review Jurisdiction) के तहत संविधान के अनुच्छेद 137 के अधीन वह अपने द्वारा सुनाए गए किसी निर्णय या आदेश का पुनरावलोकन कर सकता है, किंतु इस प्रकार का पुनरावलोकन आवेदन केवल तभी स्वीकार किया जा सकता है जब संसद द्वारा इस निमित्त कोई नया अधिनियम पारित किया गया हो।
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भारतीय संविधान के भाग-III के अंतर्गत प्रदत्त मूल अधिकारों (अनुच्छेद 12-35) और उनसे संबंधित न्यायिक निर्णयों एवं अपवादों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 13 के अंतर्गत 'विधि' (Law) शब्द की व्यापक परिभाषा दी गई है, जिसके तहत संसद या राज्य विधानमंडल के अधिनियमों के अलावा अध्यादेश, आदेश, उप-विधि, नियम और रूढ़ि या प्रथा को भी शामिल किया गया है, किंतु सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के अनुसार संविधान संशोधन अधिनियम (Constitutional Amendment Act) को अनुच्छेद 13 के अधीन 'विधि' नहीं माना जा सकता।
2. अनुच्छेद 31A के अंतर्गत जमींदारी उन्मूलन और कृषि सुधारों से संबंधित कानूनों को न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) से संरक्षित करने के लिए नौवीं अनुसूची का प्रावधान मूल संविधान में ही किया गया था, जिसे प्रथम संविधान संशोधन अधिनियम, 1951 द्वारा जोड़ा गया था, तथा इस अनुसूची में शामिल किए गए प्रत्येक कानून को न्यायिक समीक्षा के दायरे से पूर्णतः बाहर रखा गया है।
3. अनुच्छेद 33 संसद को यह शक्ति प्रदान करता है कि वह सशस्त्र बलों, अर्धसैनिक बलों, पुलिस बलों और खुफिया एजेंसियों के सदस्यों के मूल अधिकारों को प्रतिबंधित या निराकृत कर सके ताकि उनके द्वारा अपने कर्तव्यों का उचित निर्वहन और अनुशासन बना रहे, तथा इस प्रकार के प्रतिबंध लगाने के लिए केवल संसद को ही कानून बनाने की शक्ति प्राप्त है, किसी राज्य के विधानमंडल को नहीं।
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भारतीय संविधान के भाग-IV के अंतर्गत वर्णित 'राज्य के नीति निर्देशक तत्वों' (DPSP - अनुच्छेद 36-51) की प्रकृति, संशोधनों और न्यायिक व्याख्या के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 39(b) और 39(c) के अंतर्गत निहित नीति निर्देशक सिद्धांतों को प्रभावी बनाने के लिए संसद या राज्य विधानमंडलों द्वारा बनाई गई किसी विधि को इस आधार पर असंवैधानिक घोषित नहीं किया जा सकता कि वह अनुच्छेद 14 या अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों को छीनती या न्यून करती है, और यह संरक्षण मूल संविधान में ही निहित था जिसे बाद में 42वें संविधान संशोधन द्वारा विस्तारित किया गया था।
2. निर्देशक तत्वों को न्यायपालिका द्वारा अपरिवर्तनीय (Non-justiciable) घोषित किया गया है, किंतु सर्वोच्च न्यायालय ने अपने कई ऐतिहासिक निर्णयों (जैसे मिनर्वा मिल्स वाद, 1980) में यह स्पष्ट किया है कि मूल अधिकार और नीति निर्देशक तत्व एक-दूसरे के पूरक हैं और इनके बीच का संतुलन संविधान के 'मूल ढाँचे' (Basic Structure) का एक अनिवार्य हिस्सा है।
3. अनुच्छेद 48 के तहत राज्य कृषि और पशुपालन को आधुनिक और वैज्ञानिक प्रणालियों से संगठित करने के प्रयास करेगा, और विशेष रूप से गायों और बछड़ों तथा अन्य दुधारू और वाहक पशुओं की नस्लों के परीक्षण और सुधार के लिए तथा उनके वध का प्रतिषेध करने के लिए कदम उठाएगा, और यह एक समाजवादी विचारधारा पर आधारित नीति निर्देशक तत्व है।
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भारतीय संविधान के भाग I के अंतर्गत 'संघ एवं उसके राज्य क्षेत्र' (अनुच्छेद 1-4) और नए राज्यों के निर्माण या सीमा परिवर्तन की विधायी प्रक्रिया के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 2 के अंतर्गत संसद को यह शक्ति प्राप्त है कि वह संघ में नए राज्यों का प्रवेश या उनकी स्थापना ऐसे निबंधनों और शर्तों पर कर सके जो वह ठीक समझे, जबकि अनुच्छेद 3 के तहत संसद को मौजूदा राज्यों के क्षेत्रों, सीमाओं या नामों में परिवर्तन करने की शक्ति प्रदान की गई है।
2. अनुच्छेद 3 के तहत नए राज्यों के निर्माण या किसी राज्य के क्षेत्र, सीमा या नाम में परिवर्तन करने वाला कोई भी विधेयक संसद के किसी भी सदन में केवल तभी प्रस्तुत किया जा सकता है जब राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश प्राप्त हो, और राष्ट्रपति द्वारा ऐसा विधेयक संबंधित राज्य के विधानमंडल के पास उसकी राय जानने के लिए भेजा जाना संवैधानिक रूप से अनिवार्य है, भले ही राज्य विधानमंडल द्वारा दी गई राय को मानना संसद के लिए बाध्यकारी न हो।
3. अनुच्छेद 4 के स्पष्ट प्रावधान के अनुसार, अनुच्छेद 2 या अनुच्छेद 3 के तहत नए राज्यों के प्रवेश, स्थापना, या राज्यों के पुनर्गठन से संबंधित किए गए कानून संविधान के अनुच्छेद 368 के प्रयोजन के लिए 'संविधान संशोधन' माने जाएंगे, जिसके लिए संसद के विशेष बहुमत तथा आधे राज्यों के विधानमंडलों के अनुसमर्थन की अनिवार्य आवश्यकता होती है।
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