Indian Polity
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भारतीय संविधान के अंतर्गत राजभाषा, राजनीतिक दलों की मान्यता व नियमन तथा संविधान की अनुसूचियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के भाग XVII के अंतर्गत अनुच्छेद 345 के अनुसार प्रत्येक राज्य अपनी विधान-सभा द्वारा विधि द्वारा अपनाई जाने वाली एक या अधिक भाषाओं को या हिंदी को राज्य के सभी या किन्हीं राजकीय प्रयोजनों के लिए अपना सकता है, बशर्ते जब तक राज्य विधान-सभा विधि द्वारा अन्यथा उपबंध न करे, राज्य के भीतर राजनैतिक और प्रशासनिक कार्यों के लिए अंग्रेजी भाषा का प्रयोग अनिश्चितकाल तक जारी रहेगा।
- 2. लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (Representation of the People Act, 1951) की धारा 29A के प्रावधानों के तहत भारत में किसी राजनीतिक दल का पंजीकरण भारतीय निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) द्वारा किया जाता है, किंतु आयोग को किसी पंजीकृत राजनीतिक दल का पंजीकरण रद्द करने या वापस लेने की कोई वैधानिक शक्ति प्राप्त नहीं है।
- 3. संविधान की नौवीं अनुसूची को प्रथम संविधान संशोधन अधिनियम, 1951 द्वारा जोड़ा गया था, जिसका मुख्य उद्देश्य भूमि सुधार से संबंधित कानूनों को न्यायिक समीक्षा से बचाना था, और सर्वोच्च न्यायालय के 'केशवानंद भारती मामले' (1973) के पश्चात यह स्पष्ट कर दिया गया कि 24 अप्रैल 1973 के बाद नौवीं अनुसूची में शामिल किए गए किसी भी कानून की न्यायिक समीक्षा की जा सकती है यदि वह संविधान के मूल ढाचे (Basic Structure) का उल्लंघन करता हो।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 असत्य है क्योंकि अनुच्छेद 345 के तहत राज्य अपनी भाषा चुन सकते हैं, किंतु अंग्रेजी का प्रयोग केवल तब तक जारी रखने का प्रावधान था जब तक संसद कानून बनाकर कोई अन्य व्यवस्था न करे, न कि अनिश्चितकाल तक स्वतः जारी रहने का। कथन 2 असत्य है क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय ने 'अभिनंदन गुप्ता बनाम भारत निर्वाचन आयोग' या अन्य ऐतिहासिक निर्णयों और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम के दायरे में यह स्पष्ट किया है कि निर्वाचन आयोग को धोखाधड़ी या असंवैधानिक तरीकों से पंजीकृत दलों के मामलों में विधिक समीक्षा के तहत कार्रवाई करने की अंतर्निहित शक्तियां प्राप्त हैं (यद्यपि यह निरंतर वैدانिकी चर्चा का विषय रहा है, तथापि मूल अधिनियम की धारा 29A के तहत सीधे तौर पर आयोग को निरस्तीकरण की व्यापक शक्ति लिखित रूप से प्राप्त नहीं होने का तर्क दिया जाता है, किंतु सबसे बड़ा और निर्णायक त्रुटि बिंदु यह है कि निर्वाचन आयोग के पास अब सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के आलोक में कुछ सीमित मामलों में शक्ति है, हालांकि मुख्य त्रुटि कथन 1 की भाषा और संवैधानिक सीमाओं में है)। कथन 3 पूर्णतः सत्य है; नौवीं अनुसूची को 1951 में जोड़ा गया था और 'आई.आर. कोएल्हो मामला (2007)' तथा केशवानंद भारती (1973) के निर्णयों के अनुसार 24 अप्रैल 1973 के बाद नौवीं अनुसूची में डाले गए कानूनों की न्यायिक समीक्षा की जा सकती है। अधिक जानकारी के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था के विस्तृत अध्यायों का अध्ययन करें।
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भारतीय संविधान के अंतर्गत 'मूल कर्तव्यों' (Fundamental Duties) के प्रावधानों, उनके ऐतिहासिक विकास तथा उनकी विधिक प्रकृति के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मूल कर्तव्यों को स्वर्ण सिंह समिति (Swaran Singh Committee) की सिफारिशों के आधार पर 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा संविधान के भाग-IVक में अनुच्छेद 51क के तहत जोड़ा गया था, और मूल रूप से इनकी संख्या 10 थी, जबकि 11वां मूल कर्तव्य 86वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 द्वारा जोड़ा गया था।
2. संविधान के अनुच्छेद 51क में यह प्रावधान किया गया है कि प्रत्येक भारतीय नागरिक का यह कर्तव्य होगा कि वह संविधान का पालन करे और उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का आदर करे, तथा यह कर्तव्य केवल भारत के नागरिकों पर ही लागू होते हैं, विदेशी नागरिकों पर नहीं।
3. यद्यपि मूल कर्तव्य प्रकृति में 'अन्यायिक' (Non-justiciable) हैं और इनके उल्लंघन पर संविधान में प्रत्यक्ष रूप से किसी कारावास या जुर्माने का प्रावधान नहीं किया गया है, किंतु संसद को यह विधिक शक्ति प्राप्त है कि वह विधि बनाकर इनके क्रियान्वयन को अनिवार्य कर सकती है और उल्लंघन की स्थिति में दंड का प्रावधान कर सकती है जैसा कि 'वर्मी समिति' (Verma Committee, 1999) ने अपने प्रतिवेदन में संस्तुति की थी।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के 73वें संशोधन अधिनियम, 1992 के अंतर्गत पंचायती राज संस्थाओं के प्रावधानों और उनकी संरचना के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के भाग-IX के अनुच्छेद 243घ (Article 243D) के अनुसार पंचायतों के सभी स्तरों पर महिलाओं के लिए कुल सीटों के कम से कम एक-तिहाई (33%) सीटें आरक्षित होना अनिवार्य है, तथा यह आरक्षण प्रत्यक्ष रूप से चुने जाने वाले अध्यक्षों (Chairpersons) के पदों पर भी लागू होता है।
2. 73वें संविधान संशोधन के द्वारा प्रत्येक राज्य में पंचायतों के वित्तीय स्वास्थ्य की समीक्षा के लिए एक 'राज्य वित्त आयोग' (State Finance Commission) के गठन का प्रावधान अनुच्छेद 243झ (Article 243I) के तहत किया गया है, जिसके सदस्यों की योग्यता और उनके चयन की पद्धति का निर्धारण राज्य के राज्यपाल द्वारा किया जाता है।
3. इस संशोधन अधिनियम के लागू होने के पश्चात गठित ग्यारहवीं अनुसूची में पंचायतों की कार्यक्षमता के लिए कुल 29 विषयों को सूचीबद्ध किया गया है, और इन सभी 29 विषयों पर विधि बनाकर कार्य करने का अधिकार राज्यों के लिए अनिवार्य (Mandatory) कर दिया गया है, जिसे राज्य सरकारें अपनी इच्छा से अस्वीकार नहीं कर सकतीं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के भाग-III के अंतर्गत प्रदत्त मूल अधिकारों (अनुच्छेद 12-35) और उनसे संबंधित न्यायिक निर्णयों एवं अपवादों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 13 के अंतर्गत 'विधि' (Law) शब्द की व्यापक परिभाषा दी गई है, जिसके तहत संसद या राज्य विधानमंडल के अधिनियमों के अलावा अध्यादेश, आदेश, उप-विधि, नियम और रूढ़ि या प्रथा को भी शामिल किया गया है, किंतु सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के अनुसार संविधान संशोधन अधिनियम (Constitutional Amendment Act) को अनुच्छेद 13 के अधीन 'विधि' नहीं माना जा सकता।
2. अनुच्छेद 31A के अंतर्गत जमींदारी उन्मूलन और कृषि सुधारों से संबंधित कानूनों को न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) से संरक्षित करने के लिए नौवीं अनुसूची का प्रावधान मूल संविधान में ही किया गया था, जिसे प्रथम संविधान संशोधन अधिनियम, 1951 द्वारा जोड़ा गया था, तथा इस अनुसूची में शामिल किए गए प्रत्येक कानून को न्यायिक समीक्षा के दायरे से पूर्णतः बाहर रखा गया है।
3. अनुच्छेद 33 संसद को यह शक्ति प्रदान करता है कि वह सशस्त्र बलों, अर्धसैनिक बलों, पुलिस बलों और खुफिया एजेंसियों के सदस्यों के मूल अधिकारों को प्रतिबंधित या निराकृत कर सके ताकि उनके द्वारा अपने कर्तव्यों का उचित निर्वहन और अनुशासन बना रहे, तथा इस प्रकार के प्रतिबंध लगाने के लिए केवल संसद को ही कानून बनाने की शक्ति प्राप्त है, किसी राज्य के विधानमंडल को नहीं।
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संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) और राज्य लोक सेवा आयोगों (SPSC) की संरचना, स्वतंत्रता और शक्तियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 316 के अनुसार संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और अन्य सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, जबकि राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है, किंतु दोनों ही मामलों में आयोग के किसी सदस्य को उसके कार्यकाल की समाप्ति से पूर्व केवल राष्ट्रपति द्वारा ही अनुच्छेद 317 में वर्णित आधारों (जैसे दिवालिया होना, कदाचार या शारीरिक/मानसिक अक्षमता) पर हटाया जा सकता है, भले ही उसकी नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की गई हो।
2. संविधान के अनुच्छेद 319 के तहत राज्य लोक सेवा आयोग का अध्यक्ष अपने कार्यकाल की समाप्ति के पश्चात संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष या सदस्य के रूप में अथवा किसी अन्य राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त होने का पात्र होता है, किंतु वह भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन किसी अन्य रोजगार का पात्र नहीं होता है।
3. संघ लोक सेवा आयोग अपनी वार्षिक प्रगति रिपोर्ट राष्ट्रपति को प्रस्तुत करता है, जिसे राष्ट्रपति संसद के दोनों सदनों के समक्ष रखवाता है, जबकि राज्य लोक सेवा आयोग अपनी रिपोर्ट राज्यपाल को सौंपता है, जिसे राज्यपाल राज्य के विधानमंडल के समक्ष रखवाता है, और इस रिपोर्ट में आयोग द्वारा उन मामलों का भी विशेष उल्लेख किया जाता है जिनमें आयोग की सलाह को सरकार द्वारा अस्वीकार कर दिया गया था।
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भारतीय संविधान के भाग-IV के अंतर्गत वर्णित 'राज्य के नीति निर्देशक तत्वों' (DPSP - अनुच्छेद 36-51) की प्रकृति, संशोधनों और न्यायिक व्याख्या के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 39(b) और 39(c) के अंतर्गत निहित नीति निर्देशक सिद्धांतों को प्रभावी बनाने के लिए संसद या राज्य विधानमंडलों द्वारा बनाई गई किसी विधि को इस आधार पर असंवैधानिक घोषित नहीं किया जा सकता कि वह अनुच्छेद 14 या अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों को छीनती या न्यून करती है, और यह संरक्षण मूल संविधान में ही निहित था जिसे बाद में 42वें संविधान संशोधन द्वारा विस्तारित किया गया था।
2. निर्देशक तत्वों को न्यायपालिका द्वारा अपरिवर्तनीय (Non-justiciable) घोषित किया गया है, किंतु सर्वोच्च न्यायालय ने अपने कई ऐतिहासिक निर्णयों (जैसे मिनर्वा मिल्स वाद, 1980) में यह स्पष्ट किया है कि मूल अधिकार और नीति निर्देशक तत्व एक-दूसरे के पूरक हैं और इनके बीच का संतुलन संविधान के 'मूल ढाँचे' (Basic Structure) का एक अनिवार्य हिस्सा है।
3. अनुच्छेद 48 के तहत राज्य कृषि और पशुपालन को आधुनिक और वैज्ञानिक प्रणालियों से संगठित करने के प्रयास करेगा, और विशेष रूप से गायों और बछड़ों तथा अन्य दुधारू और वाहक पशुओं की नस्लों के परीक्षण और सुधार के लिए तथा उनके वध का प्रतिषेध करने के लिए कदम उठाएगा, और यह एक समाजवादी विचारधारा पर आधारित नीति निर्देशक तत्व है।
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भारतीय संविधान के भाग I के अंतर्गत 'संघ एवं उसके राज्य क्षेत्र' (अनुच्छेद 1-4) और नए राज्यों के निर्माण या सीमा परिवर्तन की विधायी प्रक्रिया के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 2 के अंतर्गत संसद को यह शक्ति प्राप्त है कि वह संघ में नए राज्यों का प्रवेश या उनकी स्थापना ऐसे निबंधनों और शर्तों पर कर सके जो वह ठीक समझे, जबकि अनुच्छेद 3 के तहत संसद को मौजूदा राज्यों के क्षेत्रों, सीमाओं या नामों में परिवर्तन करने की शक्ति प्रदान की गई है।
2. अनुच्छेद 3 के तहत नए राज्यों के निर्माण या किसी राज्य के क्षेत्र, सीमा या नाम में परिवर्तन करने वाला कोई भी विधेयक संसद के किसी भी सदन में केवल तभी प्रस्तुत किया जा सकता है जब राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश प्राप्त हो, और राष्ट्रपति द्वारा ऐसा विधेयक संबंधित राज्य के विधानमंडल के पास उसकी राय जानने के लिए भेजा जाना संवैधानिक रूप से अनिवार्य है, भले ही राज्य विधानमंडल द्वारा दी गई राय को मानना संसद के लिए बाध्यकारी न हो।
3. अनुच्छेद 4 के स्पष्ट प्रावधान के अनुसार, अनुच्छेद 2 या अनुच्छेद 3 के तहत नए राज्यों के प्रवेश, स्थापना, या राज्यों के पुनर्गठन से संबंधित किए गए कानून संविधान के अनुच्छेद 368 के प्रयोजन के लिए 'संविधान संशोधन' माने जाएंगे, जिसके लिए संसद के विशेष बहुमत तथा आधे राज्यों के विधानमंडलों के अनुसमर्थन की अनिवार्य आवश्यकता होती है।
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