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Indian Polity
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भारतीय संविधान की अनुसूचियों, भागों और राजभाषा से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के भाग XVII के अंतर्गत अनुच्छेद 343 से 351 तक संघ की राजभाषा का प्रावधान किया गया है, जिसके तहत अनुच्छेद 344 में यह उपबंध है कि राष्ट्रपति संविधान के प्रारंभ से पाँच वर्ष की अवधि समाप्त होने पर और उसके पश्चात प्रत्येक दस वर्ष की समाप्ति पर एक राजभाषा आयोग का गठन करेगा, जिसमें भारत की आठवीं अनुसूची में विनिर्दिष्ट सभी भाषाओं के प्रतिनिधियों का होना अनिवार्य रूप से सुनिश्चित किया जाएगा।
- 2. भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में मूल रूप से 14 भाषाएँ थीं, जिन्हें विभिन्न संशोधनों (जैसे 21वें, 71वें, 92वें और 92वें संशोधनों के माध्यम से सिंधी, कोंकणी, मणिपुरी, नेपाली, बोडो, डोगरी, मैथिली और संथाली) के पश्चात बढ़ाकर वर्तमान में 22 कर दिया गया है, किंतु इस अनुसूची में 'अंग्रेजी' भाषा को अभी तक आधिकारिक रूप से शामिल नहीं किया गया है।
- 3. राजनीतिक दलों के पंजीकरण से संबंधित प्रावधान मूल संविधान के किसी भी भाग या अनुसूची में नहीं दिए गए थे, बल्कि इन्हें जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29A के तहत सांविधिक रूप से जोड़ा गया, जबकि राजनीतिक दलों के सदस्यों द्वारा दल-बदल के आधार पर अयोग्यता के संवैधानिक प्रावधान को 52वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1985 द्वारा दसवीं अनुसूची के रूप में संविधान में जोड़ा गया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 असत्य है क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 344 के अंतर्गत राष्ट्रपति द्वारा गठित किए जाने वाले राजभाषा आयोग में एक अध्यक्ष और आठवीं अनुसूची में विनिर्दिष्ट विभिन्न भाषाओं का प्रतिनिधित्व करने वाले ऐसे सदस्य होंगे जिन्हें राष्ट्रपति नियुक्त करे, किंतु यह आवश्यक नहीं है कि आठवीं अनुसूची में शामिल सभी 22 भाषाओं के प्रतिनिधि उसमें अनिवार्य रूप से हों ही। कथन 2 सत्य है क्योंकि आठवीं अनुसूची में मूल रूप से 14 भाषाएँ थीं और वर्तमान में 22 भाषाएँ हैं, जिसमें 'अंग्रेजी' भाषा शामिल नहीं है। कथन 3 सत्य है; राजनीतिक दलों का पंजीकरण जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29A के तहत निर्वाचन आयोग द्वारा किया जाता है और दल-बदल विरोधी कानून को 52वें संविधान संशोधन 1985 द्वारा दसवीं अनुसूची में जोड़ा गया था। अधिक जानकारी के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था का अध्ययन करें।
Related Questions
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भारतीय संविधान के अंतर्गत महत्वपूर्ण संवैधानिक संशोधनों और आपातकालीन उपबंधों के परस्पर संबंधों तथा उनके प्रभावों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा संविधान के अनुच्छेद 352 में संशोधन करके यह प्रावधान किया गया कि राष्ट्रीय आपातकाल संपूर्ण देश में या उसके किसी विशिष्ट भाग पर एक साथ उद्घोषित किया जा सकता है, तथा आपातकाल के दौरान अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकार केवल तभी स्वतः निलंबित होंगे जब आपातकाल का आधार 'युद्ध या बाह्य आक्रमण' (External Aggression) हो, न कि 'सशस्त्र विद्रोह' (Armed Rebellion)।
2. 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 द्वारा आपातकाल के दुरुपयोग को रोकने के लिए अनुच्छेद 352 में 'आंतरिक अशांति' (Internal Disturbance) शब्द को हटाकर इसके स्थान पर 'सशस्त्र विद्रोह' शब्द को जोड़ा गया, और यह अनिवार्य किया गया कि राष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणा तभी की जा सकती है जब मंत्रिमंडल (Cabinet) द्वारा इसका निर्णय लिखित रूप में संसूचित किया गया हो।
3. 44वें संशोधन के माध्यम से ही यह प्रावधान किया गया कि राष्ट्रीय आपातकाल के प्रवर्तन के दौरान भी संविधान के अनुच्छेद 20 और 21 द्वारा प्रदत्त प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार को किसी भी परिस्थिति में निलंबित नहीं किया जा सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के अंतर्गत मूल कर्तव्यों (Fundamental Duties) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मूल कर्तव्यों को स्वर्ण सिंह समिति (Swaran Singh Committee) की संस्तुति के आधार पर 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा संविधान के भाग-IVक के अनुच्छेद 51क में जोड़ा गया था, और मूलतः इसमें 10 मूल कर्तव्य शामिल किए गए थे, जबकि 11वां मूल कर्तव्य 86वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2002 द्वारा जोड़ा गया।
2. संविधान के अनुच्छेद 51क के अंतर्गत प्रदत्त मूल कर्तव्य केवल भारतीय नागरिकों पर ही लागू होते हैं, विदेशी नागरिकों पर नहीं, तथा ये सभी कर्तव्य प्रकृति में न्यायोचित (Justiciable) हैं, अर्थात् इनके उल्लंघन या अनुपालन न होने पर संसद द्वारा बनाए गए किसी कानून के तहत सीधे उच्चतम न्यायालय में रिट याचिका दायर की जा सकती है।
3. वर्मा समिति (Verma Committee on Teaching of Fundamental Duties, 1999) ने अपने प्रतिवेदन में कुछ मूल कर्तव्यों के कानूनी क्रियान्वयन के लिए विभिन्न विधियों (जैसे- राष्ट्र गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971 और वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972) की पहचान की थी।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के अंतर्गत उपराष्ट्रपति की निर्वाचन पद्धति, पद की शक्तियों और प्रधानमंत्री तथा मंत्रिपरिषद के संवैधानिक उपबंधों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 66 के अनुसार उपराष्ट्रपति का निर्वाचन संसद के दोनों सदनों (निर्वाचित और मनोनीत दोनों सदस्यों) के सदस्यों से मिलकर बनने वाले निर्वाचक गण के सदस्यों द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा होता है, जिसमें राज्य विधानसभाओं के सदस्यों को कोई भूमिका नहीं होती है।
2. संविधान के अनुच्छेद 75(1A) के अनुसार प्रधानमंत्री सहित मंत्रिपरिषद के सदस्यों की कुल संख्या लोकसभा की कुल सदस्य संख्या के पंद्रह प्रतिशत से अधिक नहीं होगी, और यह प्रतिबंध केवल केंद्र सरकार पर लागू होता है, राज्य सरकारों के मंत्रिपरिषद की संख्या पर इसका कोई संवैधानिक प्रभाव नहीं है।
3. केंद्रीय मंत्रिपरिषद के सामूहिक उत्तरदायित्व के सिद्धांत (Collective Responsibility) के तहत यदि लोकसभा द्वारा किसी एक कैबिनेट मंत्री के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पारित कर दिया जाता है, तो पूरी मंत्रिपरिषद को त्यागपत्र देना पड़ता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के 73वें संशोधन अधिनियम, 1992 के अंतर्गत पंचायती राज संस्थाओं (PRIs) के गठन, संरचना और उनके कामकाज के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 243-B के अनुसार प्रत्येक राज्य में ग्राम, मध्यवर्ती और जिला स्तर पर पंचायतों का गठन किया जाना अनिवार्य है, किंतु 20 लाख से कम आबादी वाले छोटे राज्यों के लिए यह छूट दी गई है कि वे मध्यवर्ती स्तर पर पंचायत का गठन न करें।
2. अनुच्छेद 243-C के प्रावधानों के तहत पंचायतों के सभी स्तरों के सदस्यों का प्रत्यक्ष निर्वाचन सीधे जनता द्वारा किया जाता है, जबकि मध्यवर्ती और जिला स्तरों पर पंचायतों के अध्यक्षों का निर्वाचन उन स्तरों के निर्वाचित सदस्यों द्वारा अपने में से ही अप्रत्यक्ष रूप से किया जाता है।
3. राज्य वित्त आयोग (State Finance Commission) का गठन अनुच्छेद 243-I के तहत प्रत्येक पाँच वर्ष की समाप्ति पर राज्यपाल द्वारा किया जाता है, जो पंचायतों की वित्तीय स्थिति की समीक्षा करता है और करों, शुल्कों तथा टोल के निर्धारण के संबंध में राज्यपाल को अपनी संस्तुतियाँ देता है।
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भारतीय संविधान के भाग III (मूल अधिकार) के अंतर्गत 'समानता के अधिकार' (अनुच्छेद 14-18) और उससे संबंधित न्यायिक निर्णयों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 14 में प्रयुक्त 'विधि के समक्ष समता' (Equality before Law) के विचार को ब्रिटिश संविधान से लिया गया है जो एक नकारात्मक अवधारणा है, जिसका तात्पर्य किसी भी व्यक्ति के पक्ष में विशिष्ट विशेषाधिकारों के अभाव से है, जबकि 'विधियों का समान संरक्षण' (Equal protection of the laws) के अमेरिकी अवधारणा को सकारात्मक माना जाता है जिसके अंतर्गत समान परिस्थितियों वाले व्यक्तियों के साथ समान व्यवहार किया जाना चाहिए।
2. सर्वोच्च न्यायालय ने 'इंदिरा साहनी वाद' (1992) में यह स्पष्ट किया था कि पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण की व्यवस्था केवल प्रारंभिक नियुक्तियों (Initial Appointments) तक ही सीमित है और इसे संविधान के अनुच्छेद 16(4) के तहत पदोन्नति (Promotion) में लागू नहीं किया जा सकता है, जिसे बाद में संसद ने संविधान संशोधन के माध्यम से अप्रभावी कर दिया।
3. अनुच्छेद 18 के अंतर्गत उपाधि (Titles) के अंत का प्रावधान किया गया है, जिसके तहत राज्य सेना या विद्या संबंधी सम्मान के अलावा अन्य कोई उपाधि प्रदान नहीं कर सकता है, और भारत का कोई भी नागरिक किसी विदेशी राज्य से राष्ट्रपति की पूर्व सहमति के बिना कोई भी उपाधि या भेंट स्वीकार नहीं कर सकता है।
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