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Indian Polity
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भारत के महान्यायवादी (Attorney General for India) और नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) के संवैधानिक प्रावधानों, अधिकारों और उनकी कार्यप्रणाली के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. संविधान के अनुच्छेद 76 के अनुसार भारत के महान्यायवादी की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है और वह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करता है, तथा महान्यायवादी बनने के लिए वही योग्यता होनी चाहिए जो उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की होती है, किंतु संविधान में महानยายवादी के पारिश्रमिक (Remuneration) का निर्धारण संसद द्वारा विधि बनाकर किया जाता है, न कि राष्ट्रपति द्वारा।
  2. 2. भारत का महान्यायवादी भारत सरकार का मुख्य कानूनी सलाहकार होता है और उसे देश के सभी न्यायालयों में सुनवाई का अधिकार प्राप्त है, साथ ही उसे संसद के दोनों सदनों या उनकी संयुक्त बैठकों में बोलने और भाग लेने का अधिकार तो है, किंतु वह संसद के किसी भी सदन में मतदान (Voting) के अधिकार का प्रयोग नहीं कर सकता है।
  3. 3. संविधान के अनुच्छेद 148 के अंतर्गत नियुक्त नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) को उसके पद से उसी रीति और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है जिस रीति और जिन आधारों पर उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है, तथा सीएजी अपनी पदवधि की समाप्ति के पश्चात भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन किसी अन्य कार्यालय (Employment) के पात्र नहीं होते हैं।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 असत्य है क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 76(4) के अनुसार महान्यायवादी को ऐसा पारिश्रमिक प्राप्त होगा जो **राष्ट्रपति** अवधारित करे, न कि संसद द्वारा विधि बनाकर निर्धारित किया जाता है। कथन 2 सत्य है; महान्यायवादी को संसद के सदनों में बोलने और कार्यवाही में भाग लेने का अधिकार है (अनुच्छेद 88), लेकिन उसे मतदान का अधिकार नहीं है। कथन 3 सत्य है; सीएजी को उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की तरह केवल संसद के दोनों सदनों द्वारा विशेष बहुमत से पारित समादेश (Impeachment जैसी प्रक्रिया) द्वारा ही हटाया जा सकता है, और वह सेवानिवृत्ति के बाद सरकार के अधीन किसी पद के अयोग्य होते हैं। अधिक जानकारी के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था को पढ़ें।
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