Indian Polity
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भारतीय संविधान के 73वें संशोधन अधिनियम, 1992 और पंचायती राज व्यवस्था के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 243-E के अनुसार प्रत्येक पंचायत की अवधि उसके पहली बैठक के लिए नियत तारीख से पाँच वर्ष की होगी, और यदि किसी राज्य में समय से पूर्व पंचायत का विघटन हो जाता है, तो विघटन की तारीख से छह मास की अवधि के भीतर चुनाव कराना अनिवार्य है, तथा विघटन के पश्चात् गठित नई पंचायत अपने पूर्ववर्ती निकाय के शेष कार्यकाल के लिए ही कार्य करती है।
- 2. 73वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा यह अनिवार्य किया गया है कि प्रत्येक राज्य में पंचायतों के खातों की लेखापरीक्षा (Audit) के लिए एक स्वतंत्र 'राज्य पंचायत लेखा परीक्षक' (State Panchayat Auditor) की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा सीधे की जाएगी, और राज्य विधानमंडल को इस संबंध में कानून बनाने की कोई शक्ति नहीं दी गई है।
- 3. अनुच्छेद 243-K के अंतर्गत पंचायतों के सभी निर्वाचनों के लिए मतदाता सूचियों तैयार करने और उन चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की शक्ति एक 'राज्य निर्वाचन आयोग' (State Election Commission) में निहित होगी, जिसके राज्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाएगी तथा उसे उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने के लिए निर्धारित रीति और आधारों के अलावा अन्य किसी प्रकार से उसके पद से नहीं हटाया जा सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: संविधान के अनुच्छेद 243-E के तहत प्रत्येक पंचायत की सामान्य अवधि अपनी पहली बैठक के लिए नियत तारीख से 5 वर्ष होती है। समय से पूर्व विघटन होने पर 6 महीने के भीतर चुनाव कराना अनिवार्य है और शेष अवधि के लिए ही नई पंचायत गठित होती है। कथन 2 गलत है: संविधान के अनुच्छेद 243-J के अनुसार राज्य का विधानमंडल, विधि द्वारा, पंचायतों द्वारा लेखे रखे जाने और ऐसे लेखों की लेखापरीक्षा (Audit) के संबंध में उपबंध कर सकता है, न कि राज्यपाल द्वारा सीधे किसी विशेष लेखा परीक्षक की नियुक्ति का कोई ऐसा केंद्रीय आदेश संविधान में बाध्यकारी रूप से दिया गया है। कथन 3 सही है: अनुच्छेद 243-K के अंतर्गत पंचायतों के चुनाव के लिए राज्य निर्वाचन आयोग के गठन का प्रावधान है, जिसकी नियुक्ति राज्यपाल करते हैं तथा राज्य निर्वाचन आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जैसी ही होती है। अधिक जानकारी के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पढ़ें।
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भारतीय संविधान के अंतर्गत राज्य की कार्यपालिका, विशेष रूप से राज्यपाल की…
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भारतीय संविधान के 74वें संशोधन अधिनियम, 1992 और शहरी…
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भारतीय संविधान के ऐतिहासिक विकास के अंतर्गत ब्रिटिश संसद द्वारा पारित विभिन्न अधिनियमों (Acts) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. रेगुलेटिंग एक्ट, 1773 के माध्यम से बंगाल के गवर्नर को 'बंगाल का गवर्नर-जनरल' पदनाम दिया गया और उसकी सहायता के लिए चार सदस्यीय कार्यकारी परिषद का गठन किया गया, तथा इस अधिनियम के तहत ही वर्ष 1774 में कलकत्ता में एक उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) की स्थापना की गई।
2. पिट्स इंडिया एक्ट, 1784 द्वारा कंपनी के राजनीतिक और वाणिज्यिक कार्यों के बीच अंतर किया गया तथा राजनीतिक मामलों के प्रबंधन के लिए 'बोर्ड ऑफ़ कंट्रोल' (नियंत्रण बोर्ड) की स्थापना की गई, जिससे ब्रिटिश सरकार का कंपनी के मामलों पर प्रत्यक्ष नियंत्रण स्थापित हो गया।
3. चार्टर अधिनियम, 1833 ने भारत में ब्रिटिश अधिकृत क्षेत्रों के प्रशासन को केंद्रीकृत करने की दिशा में अंतिम कदम उठाया, जिसके तहत बंगाल के गवर्नर-जनरल को 'भारत का गवर्नर-जनरल' बना दिया गया और पहली बार देश की संपूर्ण नागरिक एवं सैन्य शक्तियाँ उसमें निहित कर दी गईं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के चतुर्थ भाग के अंतर्गत वर्णित राज्य के नीति निर्देशक तत्वों (DPSP) और उनसे संबंधित संवैधानिक संशोधनों या विधिक प्रावधानों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 39A के अंतर्गत यह प्रावधान किया गया है कि राज्य यह सुनिश्चित करेगा कि आर्थिक या अन्य किसी असमर्थता के कारण कोई भी नागरिक न्याय पाने के अवसर से वंचित न रहे, और इसके क्रियान्वयन के लिए संसद ने वर्ष 1987 में 'विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम' (Legal Services Authorities Act) पारित किया था।
2. 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा नीति निर्देशक तत्वों में कुछ नए निदेशक तत्व जोड़े गए, जिनमें उद्योगों के प्रबंधन में कामगारों की भागीदारी सुनिश्चित करना (अनुच्छेद 43A) भी शामिल है, किंतु सहकारी समितियों के संवर्धन से संबंधित अनुच्छेद 43B को 97वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2011 द्वारा जोड़ा गया था।
3. अनुच्छेद 45 के मूल पाठ में 6 वर्ष से कम आयु के बालकों के लिए प्रारंभिक बाल्यावस्था देखरेख और शिक्षा का उपबंध किया गया था, जिसे 86वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2002 द्वारा प्रतिस्थापित करके 14 वर्ष तक की आयु के सभी बच्चों के लिए शिक्षा का मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 21A) बना दिया गया।
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भारतीय संविधान की राजभाषा, राजनीतिक दलों (दल-बदल) और संविधान की अनुसूचियों व भागों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के भाग XVII के अनुच्छेद 348 के अनुसार, जब तक संसद विधि द्वारा अन्यथा उपबंध न करे, उच्चतम न्यायालय और प्रत्येक उच्च न्यायालय में सभी कार्यवाहियाँ केवल अंग्रेजी भाषा में ही होंगी, तथा संसद या राज्य विधानमंडल द्वारा प्रस्तुत प्रत्येक विधेयक या अधिनियम का आधिकारिक पाठ भी अंग्रेजी में ही होगा।
2. संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत यदि किसी राजनीतिक दल के निर्वाचित सदस्यों में से कम से कम एक-तिहाई सदस्य उस दल से अलग होकर एक नया राजनीतिक दल बनाते हैं या किसी अन्य दल में विलय करते हैं, तो उन्हें दल-बदल के आधार पर अयोग्य नहीं ठहराया जाएगा।
3. संविधान की ग्यारहवीं अनुसूची, जिसे 73वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा जोड़ा गया है, में पंचायतों की शक्तियों और उत्तरदायित्वों से संबंधित कुल 29 कार्यकारी विषयों का उल्लेख किया गया है, जबकि बारहवीं अनुसूची में नगरपालिकाओं से संबंधित 18 विषय शामिल हैं।
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भारतीय संविधान की राजभाषा, राजनीतिक दलों (दल-बदल) और संविधान की विभिन्न अनुसूचियों व भागों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के भाग XVII के अंतर्गत अनुच्छेद 343 से 351 तक संघ की राजभाषा का उपबंध किया गया है, और इसी भाग के अनुच्छेद 345 के अनुसार किसी राज्य का विधानमंडल, विधि द्वारा, उस राज्य में प्रयुक्त होने वाली भाषाओं में से किसी एक या अधिक भाषाओं को या हिंदी को उस राज्य के सभी या किन्हीं राजकीय प्रयोजनों के लिए अपना सकेगा।
2. संविधान की दसवीं अनुसूची के प्रावधानों के तहत यदि किसी राजनीतिक दल का कोई मनोनीत (Nominated) सदस्य सदन में शपथ ग्रहण करने के छह महीने के भीतर किसी अन्य राजनीतिक दल की सदस्यता ग्रहण कर लेता है, तो उसे दल-बदल के आधार पर अयोग्य नहीं ठहराया जाएगा।
3. संविधान की सातवीं अनुसूची के अंतर्गत संघ सूची (List I) में मूल रूप से 97 विषय थे, जिन्हें वर्तमान में बढ़ाकर 100 कर दिया गया है, जबकि राज्य सूची (List II) से कुछ विषयों को निकालकर समवर्ती सूची (List III) में स्थानांतरित करने का कार्य 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा किया गया था।
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भारतीय संविधान के भाग-IV के अंतर्गत वर्णित 'राज्य के नीति निर्देशक तत्वों' (DPSP - अनुच्छेद 36-51) की प्रकृति, संशोधनों और न्यायिक व्याख्या के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 39(b) और 39(c) के अंतर्गत निहित नीति निर्देशक सिद्धांतों को प्रभावी बनाने के लिए संसद या राज्य विधानमंडलों द्वारा बनाई गई किसी विधि को इस आधार पर असंवैधानिक घोषित नहीं किया जा सकता कि वह अनुच्छेद 14 या अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों को छीनती या न्यून करती है, और यह संरक्षण मूल संविधान में ही निहित था जिसे बाद में 42वें संविधान संशोधन द्वारा विस्तारित किया गया था।
2. निर्देशक तत्वों को न्यायपालिका द्वारा अपरिवर्तनीय (Non-justiciable) घोषित किया गया है, किंतु सर्वोच्च न्यायालय ने अपने कई ऐतिहासिक निर्णयों (जैसे मिनर्वा मिल्स वाद, 1980) में यह स्पष्ट किया है कि मूल अधिकार और नीति निर्देशक तत्व एक-दूसरे के पूरक हैं और इनके बीच का संतुलन संविधान के 'मूल ढाँचे' (Basic Structure) का एक अनिवार्य हिस्सा है।
3. अनुच्छेद 48 के तहत राज्य कृषि और पशुपालन को आधुनिक और वैज्ञानिक प्रणालियों से संगठित करने के प्रयास करेगा, और विशेष रूप से गायों और बछड़ों तथा अन्य दुधारू और वाहक पशुओं की नस्लों के परीक्षण और सुधार के लिए तथा उनके वध का प्रतिषेध करने के लिए कदम उठाएगा, और यह एक समाजवादी विचारधारा पर आधारित नीति निर्देशक तत्व है।
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भारतीय संविधान के भाग I के अंतर्गत 'संघ एवं उसके राज्य क्षेत्र' (अनुच्छेद 1-4) और नए राज्यों के निर्माण या सीमा परिवर्तन की विधायी प्रक्रिया के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 2 के अंतर्गत संसद को यह शक्ति प्राप्त है कि वह संघ में नए राज्यों का प्रवेश या उनकी स्थापना ऐसे निबंधनों और शर्तों पर कर सके जो वह ठीक समझे, जबकि अनुच्छेद 3 के तहत संसद को मौजूदा राज्यों के क्षेत्रों, सीमाओं या नामों में परिवर्तन करने की शक्ति प्रदान की गई है।
2. अनुच्छेद 3 के तहत नए राज्यों के निर्माण या किसी राज्य के क्षेत्र, सीमा या नाम में परिवर्तन करने वाला कोई भी विधेयक संसद के किसी भी सदन में केवल तभी प्रस्तुत किया जा सकता है जब राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश प्राप्त हो, और राष्ट्रपति द्वारा ऐसा विधेयक संबंधित राज्य के विधानमंडल के पास उसकी राय जानने के लिए भेजा जाना संवैधानिक रूप से अनिवार्य है, भले ही राज्य विधानमंडल द्वारा दी गई राय को मानना संसद के लिए बाध्यकारी न हो।
3. अनुच्छेद 4 के स्पष्ट प्रावधान के अनुसार, अनुच्छेद 2 या अनुच्छेद 3 के तहत नए राज्यों के प्रवेश, स्थापना, या राज्यों के पुनर्गठन से संबंधित किए गए कानून संविधान के अनुच्छेद 368 के प्रयोजन के लिए 'संविधान संशोधन' माने जाएंगे, जिसके लिए संसद के विशेष बहुमत तथा आधे राज्यों के विधानमंडलों के अनुसमर्थन की अनिवार्य आवश्यकता होती है।
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