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Indian Polity
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भारतीय संविधान के अंतर्गत नागरिकता के प्रावधानों और उनसे संबंधित विधायी शक्तियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 11 के तहत संसद को नागरिकता के अर्जन और समाप्ति तथा नागरिकता से संबंधित अन्य सभी विषयों के संबंध में उपबंध करने की संपूर्ण शक्ति प्रदान की गई है, और इस शक्ति के प्रयोग में संसद द्वारा पारित 'भारतीय नागरिकता अधिनियम, 1955' में अब तक केवल एक बार ही संशोधन किया गया है।
- 2. अनुच्छेद 9 के अनुसार यदि भारत का कोई नागरिक स्वेच्छा से किसी विदेशी राज्य की नागरिकता अर्जित कर लेता है, तो भारत की नागरिकता स्वतः समाप्त (Termination of Citizenship) हो जाएगी, किंतु यह नियम उन मामलों में लागू नहीं होता जब देश में आपातकाल (Emergency) की घोषणा की गई हो।
- 3. जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 के पश्चात केंद्र सरकार द्वारा प्रदत्त शक्तियों के अंतर्गत गृह मंत्रालय ने 'डोमिसाइल' (Domicile) से जुड़े नियमों को अधिसूचित किया है, जिसके तहत केंद्र शासित प्रदेश में एक निश्चित अवधि तक निवास करने वाले व्यक्तियों को वहां का मूल निवासी माना जाता है, किंतु नागरिकता देने या छीनने की अंतिम संप्रभु शक्ति केवल और केवल संसद के पास ही सुरक्षित है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 असत्य है क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 11 के तहत संसद को नागरिकता के संबंध में कानून बनाने की व्यापक शक्ति दी गई है, जिसके तहत 'भारतीय नागरिकता अधिनियम, 1955' पारित किया गया था; किंतु इस अधिनियम में अब तक कई बार (जैसे 1986, 1992, 2003, 2005, 2015 और 2019 में) संशोधन किए जा चुके हैं, न कि केवल एक बार। कथन 2 असत्य है क्योंकि अनुच्छेद 9 के अनुसार यदि कोई भारतीय नागरिक स्वेच्छा से किसी विदेशी राज्य की नागरिकता ग्रहण कर लेता है, तो उसकी भारतीय नागरिकता स्वतः समाप्त हो जाती है और आपातकाल (Emergency) जैसी किसी भी स्थिति का इस प्रावधान से कोई संबंध या अपवाद नहीं है। कथन 3 पूरी तरह से सत्य है; यद्यपि क्षेत्रीय निवास (Domicile) या अधिवास के नियम राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के विशेष संदर्भ में निर्धारित हो सकते हैं, किंतु संविधान के अनुच्छेद 11 और सातवीं अनुसूची की संघ सूची (सूची-I) की प्रविष्टि 17 के तहत 'नागरिकता, प्राकृतिकरण और विदेशी' विषय पर कानून बनाने की एकमात्र शक्ति संसद के पास ही निहित है। अधिक जानकारी के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था के विस्तृत अध्यायों का अध्ययन करें।
Related Questions
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भारतीय निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) की स्वतंत्रता, कार्यप्रणाली और चुनाव सुधारों से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 324 के अंतर्गत निर्वाचन आयोग एक स्थायी निकाय है, और मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) तथा अन्य निर्वाचन आयुक्तों (ECs) की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, किंतु 1993 के पश्चात से चुनाव आयोग द्वारा लिए जाने वाले निर्णय बहुमत के आधार पर लिए जाते हैं, जिसमें CEC और अन्य ECs के पास समान शक्तियां होती हैं।
2. निर्वाचन आयोग के सदस्यों की सेवा शर्तें और पदावधि राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित की जाती हैं, और मुख्य निर्वाचन आयुक्त को उसके पद से हटाने की प्रक्रिया वही है जो उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने की होती है, जबकि अन्य निर्वाचन आयुक्तों को मुख्य निर्वाचन आयुक्त की लिखित सिफारिश के बिना राष्ट्रपति द्वारा किसी भी परिस्थिति में नहीं हटाया जा सकता।
3. चुनाव सुधारों से संबंधित 'इंद्रजीत गुप्त समिति' (1998) ने लोकसभा और विधानसभा चुनावों के लिए राज्य द्वारा वित्तीय सहायता (State Funding of Elections) के सिद्धांत का समर्थन किया था, बशर्ते यह सहायता केवल पंजीकृत राजनीतिक दलों को उनके चुनाव प्रदर्शन के आधार पर वस्तु के रूप में (in kind) दी जाए, न कि नगद रूप में।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के भाग IV के अंतर्गत वर्णित राज्य के नीति निर्देशक तत्वों (DPSP) और उनसे संबंधित संवैधानिक संशोधनों तथा न्यायिक निर्णयों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 39A के तहत 'समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता' का प्रावधान मूल संविधान में नहीं था, बल्कि इसे 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा जोड़ा गया था, तथा इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि आर्थिक या अन्य असमर्थता के कारण कोई भी नागरिक न्याय पाने से वंचित न रहे।
2. अनुच्छेद 44 में वर्णित 'समान नागरिक संहिता' (Uniform Civil Code) का उद्देश्य पूरे देश में समस्त नागरिकों के लिए एक समान नागरिक कानून लागू करना है, और यह निर्देशक तत्व देश के न्यायालयों द्वारा स्वतः प्रवर्तनीय (Self-executing) है जिसके लिए किसी विधायी अधिनियमन की आवश्यकता नहीं होती है।
3. सर्वोच्च न्यायालय ने 'मिनर्वा मिल्स वाद' (1980) में यह स्पष्ट किया था कि मौलिक अधिकारों और नीति निर्देशक तत्वों के बीच संतुलन संविधान की मूल संरचना (Basic Structure) का एक अनिवार्य हिस्सा है, और राज्य के नीति निर्देशक तत्वों को मौलिक अधिकारों पर संपूर्ण रूप से प्राथमिकता नहीं दी जा सकती।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 200' और 'अनुच्छेद 201' के अंतर्गत राज्य के राज्यपाल द्वारा विधेयकों पर अनुमति देने की शक्ति (Assent to Bills) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राज्यपाल राज्य विधानमंडल द्वारा पारित किसी विधेयक को राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित (Reserve) कर सकता है, और यह राज्यपाल का एक स्वविवेककारी (Discretionary) कर्तव्य है जो उसकी संवैधानिक शक्तियों के अंतर्गत आता है।
2. यदि राज्यपाल किसी विधेयक को राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित कर लेता है, तो उस विधेयक पर राज्य विधानमंडल का दोबारा विचार करने का अधिकार समाप्त हो जाता है, भले ही राष्ट्रपति उस विधेयक को अस्वीकार कर दे।
3. अनुच्छेद 201 के अनुसार, जब कोई विधेयक राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित रखा जाता है, तो राष्ट्रपति के लिए यह अनिवार्य होता है कि वह उस पर अपनी स्वीकृति दे ही दे, और वह राज्य विधानमंडल को विधेयक पर पुनर्विचार करने का निर्देश नहीं दे सकता।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान की प्रस्तावना (उद्देशिका) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान की प्रस्तावना में अब तक केवल एक बार वर्ष 1976 में 42वें संविधान संशोधन अधिनियम के माध्यम से संशोधन किया गया है, जिसके अंतर्गत इसमें 'समाजवादी', 'पंथनिरपेक्ष' और 'अखंडता' शब्दों को अंतःस्थापित किया गया था।
2. 'बेरूबारी यूनियन वाद' (1960) के ऐतिहासिक मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह स्पष्ट रूप से अभिनिर्धारित किया था कि प्रस्तावना संविधान का एक अभिन्न अंग (Integral Part) है और संसद इसमें अनुच्छेद 368 के तहत संशोधन कर सकती है।
3. 'केशवानंद भारती वाद' (1973) के निर्णय में उच्चतम न्यायालय ने अपने पूर्व के मत को बदलते हुए यह स्वीकार किया कि प्रस्तावना संविधान का भाग है, किंतु संसद इसकी मूल संरचना (Basic Structure) को प्रभावित किए बिना इसमें संशोधन कर सकती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के अंतर्गत राज्य की कार्यपालिका, विशेष रूप से राज्यपाल की शक्तियों, अध्यादेश निर्माण और मुख्यमंत्री की नियुक्ति के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 213 के तहत राज्यपाल को राज्य विधानमंडल के सत्र में न होने पर अध्यादेश प्रख्यापित करने की शक्ति प्राप्त है, और राज्यपाल द्वारा जारी ऐसा अध्यादेश विधानमंडल के पुनः समवेत होने पर छह सप्ताह के भीतर विधानमंडल द्वारा अनुमोदित होना अनिवार्य है, अन्यथा यह स्वतः निष्प्रभावी हो जाता है।
2. राज्यपाल द्वारा प्रख्यापित अध्यादेश के लिए राज्य मंत्रिपरिषद की पूर्व सलाह या संस्तुति आवश्यक होती है, किंतु कुछ विशिष्ट मामलों में (जैसे कि ऐसा अध्यादेश जिसके प्रावधानों को यदि राज्य विधानसभा का विधेयक बनाया जाए तो राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित रखना अनिवार्य हो) राज्यपाल राष्ट्रपति के निर्देशों के बिना अध्यादेश प्रख्यापित नहीं कर सकता है।
3. राज्य के मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है, और अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा मुख्यमंत्री की सलाह पर की जाती है, तथा संविधान के अनुच्छेद 164 के अनुसार झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और ओडिशा राज्यों में जनजातीय कल्याण के लिए एक पृथक् मंत्री का होना अनिवार्य किया गया है, जिसके पास गृह विभाग का प्रभार होना संविधान की अनिवार्य शर्त है।
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