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Indian Polity
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भारतीय संविधान के अंतर्गत भारत के राष्ट्रपति की विधायी, कार्यकारी और वीटो शक्तियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 111 के तहत जब संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित कोई विधेयक राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है, तो राष्ट्रपति के पास यह शक्ति होती है कि वह अपनी 'निलंबकारी वीटो' (Suspensive Veto) शक्ति का प्रयोग करते हुए विधेयक को संसद के पुनर्विचार के लिए लौटा सकता है, किंतु यदि संसद उस विधेयक को संशोधनों के साथ या बिना संशोधनों के पुनः पारित कर राष्ट्रपति के पास भेज देती है, तो राष्ट्रपति को उस पर अपनी अनुमति देना अनिवार्य होता है, सिवाय उस स्थिति के जब वह धन विधेयक (Money Bill) हो।
- 2. राष्ट्रपति को संविधान के अनुच्छेद 123 के अंतर्गत अध्यादेश प्रख्यापित करने की शक्ति प्राप्त है, और यह शक्ति संसद के दोनों सदनों के सत्र में न होने पर ही प्रयोग की जा सकती है, तथा राष्ट्रपति द्वारा जारी किया गया अध्यादेश संसद की पुनर्बैठक के छह सप्ताह के भीतर अनुमोदित न होने पर स्वतः निष्प्रभावी हो जाता है, भले ही इस अध्यादेश की अधिकतम अवधि छह महीने से कम क्यों न हो।
- 3. राष्ट्रपति की क्षमादान शक्तियों (Pardoning Power) के अंतर्गत अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति को सैन्य न्यायालय (Court Martial) द्वारा दिए गए दंड के मामलों में भी क्षमा, प्रविलंबन, विराम या परिहार करने की शक्ति प्राप्त है, और मृत्युदंड के मामलों में केवल राष्ट्रपति के पास ही पूर्ण क्षमादान (Pardon) की शक्ति होती है, राज्यपाल के पास नहीं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 गलत है क्योंकि अनुच्छेद 111 के अनुसार राष्ट्रपति धन विधेयक (Money Bill) पर निलंबकारी वीटो का प्रयोग नहीं कर सकता है, क्योंकि धन विधेयक राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति से ही संसद में प्रस्तुत किया जाता है; अतः राष्ट्रपति धन विधेयक को पुनर्विचार के लिए वापस नहीं लौटा सकता, उसे या तो अनुमति देनी होगी या अनुमति रोकनी होगी। कथन 2 बिल्कुल सही है क्योंकि अनुच्छेद 123 के तहत अध्यादेश निर्माण की शक्ति तभी प्रयोग होती है जब संसद सत्र में न हो और इसकी वैधता संसद के पुनः समवेत होने के 6 सप्ताह तक होती है। कथन 3 भी बिल्कुल सही है क्योंकि अनुच्छेद 72 के अंतर्गत राष्ट्रपति को सैन्य न्यायालयों के दंड और मृत्युदंड के मामलों में पूर्ण क्षमादान देने की अनन्य शक्ति प्राप्त है। इस विषय की विस्तृत जानकारी के लिए आप भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पर जा सकते हैं।
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संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) और राज्य लोक सेवा आयोगों (SPSC) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 315 के अंतर्गत प्रत्येक राज्य के लिए एक राज्य लोक सेवा आयोग का प्रावधान किया गया है, तथा दो या अधिक राज्यों के लिए एक 'संयुक्त राज्य लोक सेवा आयोग' (JSPSC) का गठन संबंधित राज्यों के अनुरोध पर संसद द्वारा एक अधिनियम के माध्यम से किया जाता है, जिसके अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
2. संविधान के अनुच्छेद 317 के अनुसार, संघ लोक सेवा आयोग या किसी राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष या किसी अन्य सदस्य को केवल राष्ट्रपति द्वारा ही उनके पद से हटाया जा सकता है, भले ही राज्य लोक सेवा आयोग के सदस्यों की नियुक्ति संबंधित राज्य के राज्यपाल द्वारा की जाती है।
3. संघ लोक सेवा आयोग के व्यय, जिनमें उसके सदस्यों या कर्मचारियों को देय या उनके संबंध में कोई वेतन, भत्ते और पेंशन शामिल हैं, संबंधित राज्य की संचित निधि पर भारित (Charged) होते हैं, जबकि राज्य लोक सेवा आयोग के ऐसे सभी व्यय भारत की संचित निधि पर भारित होते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के प्रथम भाग के अंतर्गत 'संघ एवं उसके राज्य क्षेत्र' (अनुच्छेद 1-4) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 2 के तहत संसद को यह शक्ति प्राप्त है कि वह विधि द्वारा ऐसे निबंधनों और शर्तों को ठीक समझे, संघ में नए राज्यों का प्रवेश या उनकी स्थापना कर सकेगी, जबकि अनुच्छेद 3 संसद को किसी राज्य के क्षेत्र को घटाने, बढ़ाने या उसके नाम में परिवर्तन करने का अधिकार देता है, और इसके लिए संबंधित राज्य के विधानमंडल की पूर्व सहमति होना अनिवार्य है।
2. अनुच्छेद 3 के अंतर्गत किसी नए राज्य के निर्माण या मौजूदा राज्य की सीमाओं में परिवर्तन से संबंधित विधेयक को राष्ट्रपति की सिफारिश के बिना संसद के किसी भी सदन में पुनः स्थापित नहीं किया जा सकता है, तथा राष्ट्रपति इस विधेयक को संबंधित राज्य के विधानमंडल के पास उसके विचार जानने के लिए भेजते हैं, और राज्य विधानमंडल द्वारा निर्धारित समय सीमा के भीतर दी गई राय राष्ट्रपति या संसद पर आबद्धकर (Binding) होती है।
3. अनुच्छेद 4 यह स्पष्ट करता है कि अनुच्छेद 2 या अनुच्छेद 3 के अधीन बनाए गए नए राज्यों के प्रवेश या गठन तथा राज्यों की सीमाओं या नामों में परिवर्तन से संबंधित विधियों को संविधान के अनुच्छेद 368 के प्रयोजन के लिए 'संविधान संशोधन' नहीं माना जाएगा, अर्थात ऐसी विधियाँ साधारण बहुमत से पारित की जा सकती हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारत के निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) और चुनाव सुधारों से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 324 के अंतर्गत निर्वाचन आयोग संसद, राज्य विधानमंडलों, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के पदों के निर्वाचनों के साथ-साथ राज्यों में पंचायतों और नगरपालिकाओं के चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की संपूर्ण शक्ति रखता है।
2. वर्ष 1989 के 61वें संविधान संशोधन अधिनियम के माध्यम से मतदान की आयु को 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष कर दिया गया, और इसी वर्ष निर्वाचन आयोग को एक बहु-सदस्यीय (Multi-member) निकाय में परिवर्तित कर दिया गया जिसमें एक मुख्य निर्वाचन आयुक्त और दो अन्य निर्वाचन आयुक्त शामिल किए गए।
3. जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 8 (3) के अनुसार, यदि किसी सांसद या विधायक को किसी अपराध में दोषी ठहराया जाता है और उसे कम से कम 2 वर्ष या उससे अधिक की कारावास की सजा सुनाई जाती है, तो वह सजा की तिथि से अयोग्य हो जाता है और सजा की अवधि समाप्त होने के पश्चात भी अगले 6 वर्षों तक चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य बना रहता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के अंतर्गत उपराष्ट्रपति की निर्वाचन पद्धति, प्रधानमंत्री के विशेषाधिकार तथा मंत्रिपरिषद के कार्यसंचालन से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 66(1) के अनुसार उपराष्ट्रपति का निर्वाचन संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) के सभी सदस्यों से मिलकर बनने वाले निर्वाचकगण द्वारा होता है, जिसमें संसद के मनोनीत सदस्य भी भाग लेते हैं, किंतु राज्य विधानमंडलों के निर्वाचित और मनोनीत दोनों प्रकार के सदस्य इस निर्वाचकगण का हिस्सा नहीं होते हैं।
2. संविधान के अनुच्छेद 77 के प्रावधानों के तहत भारत सरकार के समस्त कार्यपालिका कृत्य राष्ट्रपति के नाम से हुए व्यक्त किए जाते हैं, किंतु प्रधानमंत्री द्वारा मंत्रिपरिषद के बैठकों के एजेंडे और निर्णयों से राष्ट्रपति को अवगत कराने की प्रक्रिया का प्रत्यक्ष उल्लेख अनुच्छेद 78 में किया गया है।
3. राष्ट्रीय सुरक्षा या आपातकालीन परिस्थितियों में, राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की सलाह पर मंत्रिपरिषद के किसी भी एक मंत्री को उसके पद से सीधे बर्खास्त कर सकता है, जिसके लिए प्रधानमंत्री की पूर्व लिखित अनुशंसा संवैधानिक रूप से अनिवार्य नहीं होती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के भाग-IV के अंतर्गत वर्णित राज्य के नीति निर्देशक तत्वों (DPSP - अनुच्छेद 36-51) की प्रकृति, संशोधनों और उनके विधिक प्रभावों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 31ग (Article 31C), जिसे 25वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1971 द्वारा अंतःस्थापित किया गया था, के अनुसार यदि राज्य अनुच्छेद 39(ख) और 39(ग) में वर्णित सामाजिक-आर्थिक न्याय संबंधी नीति निर्देशक तत्वों को प्रभावी करने के लिए कोई कानून बनाता है, तो इस आधार पर उसे इस न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती कि वह अनुच्छेद 14 या अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों का उल्लंघन करता है।
2. 'मिनर्वा मिल्स वाद' (1980) में उच्चतम न्यायालय ने यह स्पष्ट रूप से निर्धारित किया कि भाग-III (मूल अधिकार) और भाग-IV (नीति निर्देशक तत्व) एक-दूसरे के पूरक हैं, और यदि नीति निर्देशक तत्वों को लागू करने के लिए मूल अधिकारों (विशेषकर अनुच्छेद 14 और 19) में संशोधन किया जाता है, तो ऐसा कोई भी कानून संविधान के मूल ढांचा (Basic Structure) का उल्लंघन नहीं माना जाएगा।
3. यद्यपि नीति निर्देशक तत्व देश के शासन में मूलभूत हैं और न्यायपालिका द्वारा प्रवर्तनीय (Non-justiciable) नहीं हैं, तथापि उच्चतम न्यायालय ने अपने विभिन्न ऐतिहासिक निर्णयों में यह प्रतिपादित किया है कि संविधान के अनुच्छेद 21 (प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार) की व्यापक व्याख्या करते समय नीति निर्देशक तत्वों में निहित कल्याणकारी संकल्पनाओं को इसके अंतर्गत शामिल किया जा सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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