History of India
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हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) और गदर पार्टी के क्रांतिकारी स्वरूप तथा उनके वैचारिक एवं संगठनात्मक विकास के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. सितंबर 1928 में दिल्ली के फिरोजशाह कोटला मैदान में चंद्रशेखर आजाद के नेतृत्व में 'हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन' का नाम बदलकर 'हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन' (HSRA) किया गया, जिसके घोषणापत्र 'द फिलॉसफी ऑफ द बॉम्ब' का प्रारूप भगवती चरण बोहरा ने तैयार किया था।
- 2. वर्ष 1913 में अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को में स्थापित 'ग़दर पार्टी' का प्रारंभिक नाम 'पैसेफिक कोस्ट हिंद एसोसिएशन' था, तथा इसके द्वारा प्रकाशित 'ग़दर' अखबार के पहले अंक से ही यह क्रांतिकारी दल पूरी तरह मार्क्सवादी और साम्यवादी विचारधारा पर आधारित था।
- 3. दिसंबर 1928 में लाहौर में जॉन सॉंडर्स की हत्या का मुख्य उद्देश्य लाला लाजपत राय की लाठीचार्ज से हुई मृत्यु का बदला लेना था, जिसमें भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के साथ-साथ चंद्रशेखर आजाद ने भी प्रत्यक्ष रूप से भाग लिया था।
- 4. प्रथम विश्व युद्ध के दौरान गदर पार्टी के नेताओं ने 'ग़दर षड्यंत्र' के तहत ब्रिटिश सेना में कार्यरत भारतीय सैनिकों को बगावत करने के लिए प्रेरित किया था, किंतु मुखबिरी और सुरक्षा उपायों के कारण यह योजना समय से पूर्व ही विफल हो गई थी।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है क्योंकि सितंबर 1928 में दिल्ली के फिरोजशाह कोटला में चंद्रशेखर आजाद के नेतृत्व में एचआरए (HRA) का समाजवादी पुनर्गठन कर 'हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन' बनाया गया था और भगवती चरण बोहरा ने 'द फिलॉसफी ऑफ द बॉम्ब' लिखा था। कथन 2 गलत है क्योंकि 1913 में स्थापित गदर पार्टी की प्रारंभिक विचारधारा मुख्य रूप से लोकतांत्रिक, राष्ट्रवादी और धर्मनिरपेक्ष थी, न कि अपनी स्थापना के पहले दिन से विशुद्ध मार्क्सवादी या साम्यवादी। कथन 3 सही है; लाला लाजपत राय की मृत्यु के प्रतिशोध में 17 दिसंबर 1928 को सॉंडर्स की हत्या भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव और चंद्रशेखर आजाद द्वारा की गई थी। कथन 4 सही है, प्रथम विश्व युद्ध के दौरान गदर क्रांतिकारियों ने भारत आकर सैन्य विद्रोह कराने की योजना बनाई थी जो असफल रही थी। अधिक जानकारी के लिए विकिपीडिया संदर्भ देख सकते हैं।
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मौर्य साम्राज्य के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. चंद्रगुप्त…
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छठी शताब्दी ईसा पूर्व के 'सोलह महाजनपदों' की राजनीतिक…
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सिंधु घाटी सभ्यता (Harappan Civilization) की नगरीय योजना, वास्तुकला और अर्थव्यवस्था के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. इस सभ्यता के लगभग सभी प्रमुख नगरों में मकानों के दरवाजे मुख्य सड़क की ओर खुलते थे, जो जल निकासी और वायु संचार की उत्कृष्ट व्यवस्था को दर्शाते हैं।
2. लोथल और चान्हूदरो दोनों ही स्थलों से मनके (Beads) बनाने के कारखानों के अवशेष प्राप्त हुए हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि ये स्थल शिल्प उत्पादन के प्रमुख केंद्र थे।
3. सिंधु सभ्यता के लोग विदेशों के साथ सक्रिय व्यापार करते थे, जिसके साक्ष्य के रूप में मेसोपोटामिया के अभिलेखों में 'मेलुहा' (Meluhha) शब्द का प्रयोग सिंधु क्षेत्र के लिए किया गया है।
4. हड़प्पा सभ्यता की लिपि चित्रात्मक (Pictographic) थी, जो आमतौर पर दाईं से बाईं ओर (Boustrophedon शैली) लिखी जाती थी, और इसे अभी तक सफलतापर्वक पढ़ा नहीं जा सका है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930-34), गांधी-इरविन समझौते और गोलमेज सम्मेलनों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मार्च 1931 में संपन्न गांधी-इरविन समझौते के तहत सरकार ने हिंसा के आरोपियों को छोड़कर अन्य सभी राजनीतिक बंदियों को तुरंत रिहा करने और समुद्र तट के समीपवर्ती क्षेत्रों में बिना कर के नमक बनाने (व्यक्तिगत या घरेलू उपयोग हेतु) की अनुमति देने पर सहमति व्यक्त की थी।
2. लंदन में आयोजित द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एकमात्र आधिकारिक प्रतिनिधि के रूप में महात्मा गांधी ने भाग लिया था, जहाँ सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व और दलितों के पृथक निर्वाचक मंडल के मुद्दे पर डॉ. बी.आर. अंबेडकर के साथ तीव्र गतिरोध उत्पन्न हुआ था।
3. वर्ष 1932 में लंदन में आयोजित तृतीय गोलमेज सम्मेलन में कांग्रेस ने भाग नहीं लिया था, किंतु इसी सम्मेलन के समापन के पश्चात ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैमसे मैकडोनाल्ड ने 'कम्युनल अवार्ड' (सांप्रदायिक पंचाट) की घोषणा की थी, जिसके विरोध में गांधीजी ने यरवदा जेल में आमरण अनशन किया था।
4. प्रथम गोलमेज सम्मेलन के दौरान भारत के वायसराय लॉर्ड इरविन थे, और कांग्रेस ने इस सम्मेलन में पूर्णतः भाग लिया था क्योंकि सरकार ने सविनय अवज्ञा आंदोलन से जुड़े सभी राजनीतिक कैदियों को सम्मेलन से पूर्व ही बिना किसी शर्त के रिहा कर दिया था।
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मौर्योत्तर काल और गुप्त साम्राज्य के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मौर्योत्तर काल में सातवाहन राजवंश ने 'शीशा' (Lead) के सिक्कों का सबसे बड़े पैमाने पर प्रचलन किया था, तथा उनके अभिलेखों में भूमि अनुदान देने की प्रथा के प्रारंभिक साक्ष्य मिलते हैं जिसका धार्मिक और प्रशासनिक दोनों दृष्टियों से महत्व था।
2. गुप्त साम्राज्य के दौरान 'अग्रहार' व्यवस्था के अंतर्गत ब्राह्मणों को कर-मुक्त कृषि भूमि दान दी जाती थी, और इस काल में व्यापारिक गतिविधियों में अत्यधिक वृद्धि होने के कारण तांबे के सिक्कों (दीनार) का सबसे अधिक संचलन हुआ था।
3. गुप्तकालीन प्रशासनिक व्यवस्था में प्रांतीय शासकों या राज्यपालों को 'उपरिक' कहा जाता था, जो सीधे सम्राट के प्रति उत्तरदायी होते थे, तथा प्रांतों को 'भुक्ति' और भुक्तियों को 'विषय' (ज़िलों) में विभाजित किया जाता था।
4. कालिदास और आर्यभट्ट जैसे महान विद्वानों को गुप्त सम्राट चंद्रगुप्त द्वितीय (विक्रमादित्य) के नवरत्नों में विशेष स्थान प्राप्त था, जिन्होंने विज्ञान, ज्योतिष और संस्कृत साहित्य के क्षेत्र में अद्वितीय योगदान दिया था।
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मौर्य साम्राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था, केंद्रीय अधिकारियों (तीर्थों) और न्याय प्रणाली के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मौर्य प्रशासन में सर्वोच्च स्तर के मंत्रियों और अधिकारियों को 'तीर्थ' कहा जाता था, जिनकी कुल संख्या अर्थशास्त्र के अनुसार अठारह थी, जिसमें 'समाहर्ता' का मुख्य कार्य पूरे साम्राज्य में करों का निर्धारण और आय-व्यय का वार्षिक लेखा-जोखा तैयार करना था।
2. मेगस्थनीज की 'इंडिका' के अनुसार पाटलिपुत्र नगर का प्रशासन छह समितियों द्वारा संचालित किया जाता था, जिनमें से प्रत्येक समिति में पाँच सदस्य होते थे जो शिल्पकारों के निरीक्षण, विदेशियों की देखभाल और जन्म-मृत्यु का पंजीकरण जैसे कार्य करते थे।
3. मौर्यकालीन न्याय व्यवस्था में दीवानी न्यायालयों को 'धर्मस्थीय' और फौजदारी न्यायालयों को 'कंटकशोधन' कहा जाता था, जहाँ 'कंटकशोधन' अदालतों का मुख्य उद्देश्य समाज के असामाजिक तत्वों और अपराधियों से नागरिकों की रक्षा करना था।
4. अशोक के धम्म महामात्रों की नियुक्ति केवल धार्मिक प्रचार-प्रसार तक सीमित थी, और उन्हें साम्राज्य के विभिन्न प्रशासनिक क्षेत्रों या न्यायिक मामलों में हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं दिया गया था।
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मुगल काल में "खुलासत-उत-तवारीख" के लेखक कौन हैं?
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महाभारत का फारसी अनुवाद "रज़्मनामा" किसके निर्देशन में किया गया था?
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