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History of India
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सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930-34), गोलमेज सम्मेलनों और गांधी-इरविन समझौते (1931) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. मार्च 1931 में संपन्न गांधी-इरविन समझौते के तहत सरकार ने सभी राजनीतिक बंदियों को तुरंत रिहा करने पर सहमति व्यक्त की थी, किंतु जिन कैदियों पर हिंसा के गंभीर आरोप थे (जैसे भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु), उनकी फांसी की सजा को माफ करने की मांग को वायसराय इरविन ने स्पष्ट रूप से ठुकरा दिया था।
  2. 2. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने प्रथम गोलमेज सम्मेलन (1930) का बहिष्कार किया था, जबकि द्वितीय गोलमेज सम्मेलन (1931) में महात्मा गांधी ने कांग्रेस के एकमात्र आधिकारिक प्रतिनिधि के रूप में भाग लिया, जहाँ 'सांप्रदायिक पंचाट' (Communal Award) के मुद्दे पर गंभीर गतिरोध उत्पन्न हुआ।
  3. 3. वर्ष 1932 में जब महात्मा गांधी ने यरवदा जेल में रहते हुए 'कम्युनल अवार्ड' के विरुद्ध आमरण अनशन किया, तब डॉ. बी.आर. अंबेडकर और सवर्ण नेताओं के बीच हुए प्रसिद्ध 'पूना पैक्ट' के माध्यम से दलितों के लिए प्रांतीय विधानसभाओं में पृथक निर्वाचक मंडलों की व्यवस्था को समाप्त कर संयुक्त निर्वाचन प्रणाली के अंतर्गत आरक्षित सीटों की व्यवस्था को स्वीकार किया गया।
  4. 4. आंदोलन के द्वितीय चरण (1932-34) के दौरान वायसराय लॉर्ड विलिंग्डन ने दमनकारी अध्यादेशों (Ordinances) का सहारा लिया और कांग्रेस संगठन को गैर-कानूनी घोषित करते हुए व्यापक दमन चक्र चलाया, जिसके कारण मई 1934 में कांग्रेस ने औपचारिक रूप से सविनय अवज्ञा आंदोलन को स्थगित कर दिया।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?

Detailed Explanation

उपर्युक्त कथनों में से कथन 1, 3 और 4 सही हैं, जबकि कथन 2 असत्य है क्योंकि महात्मा गांधी ने द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लिया था, लेकिन 'सांप्रदायिक पंचाट' (Communal Award) का मुद्दा द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में नहीं बल्कि वर्ष 1932 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री रामसे मैकडोनाल्ड द्वारा घोषित किया गया था, जिस पर विवाद के बाद पूना पैक्ट हुआ था। सविनय अवज्ञा आंदोलन और संबंधित संधियों के विस्तृत इतिहास के लिए आप विकिपीडिया संदर्भ देख सकते हैं।
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