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History of India
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ब्रिटिश भारत में लागू की गई विभिन्न भू-राजस्व प्रणालियों (स्थाई बंदोबस्त, रयतवारी और महालवारी) के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. स्थाई बंदोबस्त (Permanent Settlement) के तहत ज़मींदारों को भूमि का स्थाई मालिक बना दिया गया, जिसमें राज्य का हिस्सा 10/11वां भाग और ज़मींदारों का हिस्सा 1/11वां भाग निर्धारित किया गया था, तथा 'सूर्است अधिनियम' (Sunset Law) के अंतर्गत निश्चित तिथि को सूर्यास्त तक लगान न चुकाने पर ज़मींदारों की नीलामी कर दी जाती थी।
  2. 2. रयतवारी व्यवस्था (Ryotwari System), जिसे मुख्य रूप से मद्रास और बॉम्बे प्रेसीडेंसी में लागू किया गया था, में सरकार और किसान (रयत) के बीच सीधा अनुबंध था, तथा भूमि कर निर्धारण करते समय केवल मिट्टी की उर्वरता का ध्यान रखा गया था, सिंचाई सुविधाओं या वास्तविक उपज में होने वाले उतार-चढ़ाव को बिल्कुल नजरंदाज कर दिया गया था।
  3. 3. महालवारी व्यवस्था (Mahalwari System) के अंतर्गत भू-राजस्व का बंदोबस्त व्यक्तिगत किसानों या ज़मींदारों के साथ न करके संपूर्ण ग्राम या महाल (गाँवों के समूह) के साथ किया गया था, जिसमें गाँव के मुखिया या लंबरदार को सामूहिक रूप से लगान चुकाने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई थी।
  4. 4. इन तीनों भू-राजस्व प्रणालियों के परिणामस्वरूप पारंपरिक भारतीय कृषि का भारी वाणिज्यीकरण (Commercialization of Agriculture) हुआ, जिससे किसानों को वैश्विक बाज़ार का भारी लाभ मिला और ग्रामीण क्षेत्रों में ऋणग्रस्तता पूरी तरह समाप्त हो गई।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?

Detailed Explanation

कथन 1, 2 और 3 सही हैं। स्थाई बंदोबस्त (जिसे ज़मींदारी व्यवस्था भी कहा जाता है) को 1793 में लॉर्ड कार्नवालिस द्वारा बंगाल, बिहार और उड़ीसा में लागू किया गया था, जिसमें ज़मींदारों को भूस्वामी बनाया गया और 'सूर्यास्त कानून' का कड़ाई से पालन होता था। रयतवारी व्यवस्था के तहत मद्रास (अलेक्जेंडर रीड और थॉमस मुनरो द्वारा) तथा बॉम्बे में किसानों के साथ सीधा बंदोबस्त किया गया था, लेकिन अत्यधिक और कठोर कर दरों के कारण किसानों का भारी शोषण हुआ। महालवारी व्यवस्था उत्तर-पश्चिम प्रांत, मध्य भारत और पंजाब में लागू की गई थी, जिसमें पूरे 'महाल' (गाँव) को इकाई मानकर सामूहिक कर निर्धारण किया गया था। कथन 4 गलत है क्योंकि कृषि के वाणिज्यीकरण से किसानों को कोई विशेष लाभ नहीं मिला, बल्कि वे ब्रिटिश औद्योगिक हितों के कच्चे माल के प्रदाता बनकर रह गए और महाजनों के चंगुल में फंसकर अत्यधिक ऋणग्रस्त हो गए। अधिक जानकारी के लिए विकिपीडिया संदर्भ देख सकते हैं।
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