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History of India
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गुप्तकालीन प्रशासन, अर्थव्यवस्था और सांस्कृतिक विकास के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. गुप्त सम्राटों ने कुषाणों की तुलना में सर्वाधिक स्वर्ण मुद्राएँ (दीनार) जारी कीं, किंतु उनके प्रारंभिक काल की स्वर्ण मुद्राओं में सोने की शुद्धता (प्रतिशतता) अधिक थी, जबकि बाद के शासकों के काल में सोने की शुद्धता में निरंतर कमी आई और तांबे व अन्य धातुओं की मिलावट बढ़ने लगी।
  2. 2. गुप्त प्रशासन में प्रांतीय प्रशासन को 'भुक्ति' कहा जाता था, जिसके प्रमुख को 'उपरिक' कहा जाता था, तथा भुक्तियों का विभाजन 'विषय' (ज़िलों) में होता था, जिनका प्रशासन 'विषयापति' संभालते थे और इस प्रशासनिक व्यवस्था में स्थानीय नगर श्रेष्ठी और सार्थवाहों का भी महत्वपूर्ण सहयोग लिया जाता था।
  3. 3. गुप्त राजवंश के शासक मूल रूप से वैष्णव धर्म के अनुयायी थे और उन्होंने 'परमभागवत' की उपाधि धारण की थी, किंतु उनके साम्राज्य में धार्मिक सहिष्णुता की नीति प्रचलित थी, जिसका प्रमाण मेहरौली लौह स्तंभ और नालंदा महाविहार को दिए गए राजकीय अनुदानों से मिलता है।
  4. 4. गुप्त काल में भूमि राजस्व सामान्यतः कुल उपज का 1/6 से 1/4 भाग तक वसूला जाता था, जिसे 'भाग' या 'भोग' कहा जाता था, किंतु किसानों से बिना पारिश्रमिक के कराई जाने वाली बेगार (forced labor) को अवैध घोषित कर दिया गया था और इसका कोई भी उल्लेख गुप्तकालीन अभिलेखों में नहीं मिलता है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?

Detailed Explanation

कथन 1, 2 और 3 सही हैं। गुप्त काल को भारतीय इतिहास का 'स्वर्ण युग' (विकिपीडिया संदर्भ) कहा जाता है। गुप्त शासकों ने भारी मात्रा में स्वर्ण मुद्राएँ (दीनार) जारी कीं, लेकिन स्कंदगुप्त और परवर्ती शासकों के समय आर्थिक संकट या अन्य कारणों से सिक्कों में सोने की शुद्धता घटने लगी। गुप्त प्रशासन में प्रांत को 'भुक्ति' (प्रमुख 'उपरिक') और जिले को 'विषय' (प्रमुख 'विषयापति') कहा जाता था। गुप्त शासक वैष्णव अनुयायी थे ('परमभागवत' उपाधि) और उन्होंने बौद्ध धर्म व अन्य धर्मों के प्रति भी उदारता दिखाई। किंतु कथन 4 असत्य है; गुप्त काल में 'विष्टिक' (बेगार या जबरन श्रम) अत्यधिक प्रचलित था, और इसका उल्लेख मन्दसौर अभिलेख सहित कई गुप्तकालीन अभिलेखों में मिलता है।
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