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History of India
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19वीं शताब्दी के सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों के संदर्भ में 'प्रार्थना समाज' और 'सत्यशोधक समाज' के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. वर्ष 1867 में बंबई में आत्माराम पांडुरंग द्वारा स्थापित 'प्रार्थना समाज' का मुख्य उद्देश्य जातिगत बंधनों को समाप्त करना, बाल विवाह का विरोध करना, विधवा पुनर्विवाह का समर्थन करना और स्त्री शिक्षा को बढ़ावा देना था, जिसके प्रमुख बौद्धिक नेता महादेव गोविंद रानाडे थे।
  2. 2. ज्योतिराव फुले द्वारा वर्ष 1873 में स्थापित 'सत्यशोधक समाज' ने ब्राह्मणवादी वर्चस्व और पारंपरिक धार्मिक कर्मकांडों का कड़ा विरोध करते हुए शूद्रों और अति-शूद्रों के अधिकारों तथा सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष किया, तथा उनकी प्रसिद्ध पुस्तक 'गुलामगिरी' में इस विचारधारा का विस्तृत विवरण मिलता है।
  3. 3. प्रार्थना समाज के संस्थापकों ने बंगाल के ब्रह्म समाज के विपरीत वेदों की अचूकता और दिव्यता में पूर्ण विश्वास व्यक्त किया तथा हिंदू धर्म के पारंपरिक पौराणिक देवी-देवताओं की पूजा को अनिवार्य बताया।
  4. 4. सत्यशोधक समाज ने रूढ़िवादी धार्मिक ग्रंथों और पुरोहितवाद को नकारते हुए विवाह संस्कारों और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों में ब्राह्मण पुरोहितों की मध्यस्थता को पूरी तरह समाप्त करने के लिए वैकल्पिक विवाह पद्धतियों की शुरुआत की थी।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?

Detailed Explanation

19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में पश्चिम भारत में हुए सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों में प्रार्थना समाज और सत्यशोधक समाज की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। केशवचंद्र सेन की प्रेरणा से 1867 में बंबई में स्थापित विकिपीडिया संदर्भ (प्रार्थना समाज) का मुख्य जोर धार्मिक सुधार के साथ-साथ सामाजिक सुधार जैसे जाति व्यवस्था का खंडन, विधवा विवाह और महिला शिक्षा पर था। इसके विपरीत, कथन 3 असत्य है क्योंकि प्रार्थना समाज ने भी ब्रह्म समाज की तरह किसी एक ईश्वर की उपासना पर बल दिया और वेदों को अचूक या दिव्य ग्रंथ नहीं माना। ज्योतिराव फुले द्वारा 1873 में स्थापित सत्यशोधक समाज ने ब्राह्मणवादी प्रभुत्व और पुरोहितवाद को चुनौती देते हुए शूद्रों तथा दलितों के उत्थान के लिए कार्य किया और अपनी पुस्तक 'गुलामगिरी' के माध्यम से सामाजिक असमानता की कड़ी आलोचना की।
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