History of India
Asked 2 months ago · Viewed 20 times
मध्यकालीन भक्ति और सूफी आंदोलनों के वैचारिक विकास, प्रमुख संतों तथा उनके दार्शनिक सिद्धांतों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. मध्वाचार्य ने 'द्वैतवाद' (Dualism) के दर्शन का प्रतिपादन किया, जिसके अनुसार जीव और ब्रह्म (ईश्वर) पूर्णतः पृथक् और स्वतंत्र अस्तित्व रखते हैं, तथा मुक्ति का एकमात्र मार्ग केवल भगवान विष्णु की अनन्य भक्ति और उनकी कृपा प्राप्ति है।
- 2. सूफी सिलसिलों में 'सुह्रवर्दी सिलसिला' चिश्ती सिलसिले के विपरीत राज्य के संरक्षण और राजकीय अनुदानों को स्वीकार करने में विश्वास रखता था, तथा उनके संत शाही दरबारों के साथ घनिष्ठ संबंध बनाए रखते थे।
- 3. महाराष्ट्र के वारकरी संप्रदाय के प्रमुख संत ज्ञानेश्वर (ज्ञानेश्वरी के रचयिता) और नामदेव ने ऊंच-नीच के भेदभाव का विरोध करते हुए पंढरपुर के विट्ठल (विठोबा) की भक्ति पर विशेष बल दिया, किंतु उन्होंने कठोर ब्राह्मणवादी कर्मकांडों का पूर्ण समर्थन किया और कभी भी जातिगत समानता का उपदेश नहीं दिया।
- 4. कबीर और नानक जैसे निर्गुण संत ने जाति व्यवस्था, मूर्तिपूजा और बाहरी आडंबरों का खंडन करते हुए एक निराकार, सर्वव्यापी और अजस्र ईश्वर की उपासना पर जोर दिया, तथा उनकी वाणी को गुरु ग्रंथ साहिब में भी संकलित किया गया है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
उपर्युक्त कथनों में कथन 1, 2 और 4 सही हैं, जबकि कथन 3 असत्य है। महाराष्ट्र के वारकरी संप्रदाय के संतों (जैसे ज्ञानेश्वर, नामदेव, एकनाथ, तुकाराम आदि) ने जाति व्यवस्था, ऊंच-नीच के भेदभाव और ब्राह्मणवादी कर्मकांडों का कड़ा विरोध किया था तथा सभी जातियों के लोगों को भक्ति का अधिकार दिया था। भक्ति और सूफी परंपराओं के व्यापक प्रभाव और ऐतिहासिक विकास को समझने के लिए आप विकिपीडिया संदर्भ देख सकते हैं।
अगला प्रश्न →
मध्यकालीन भक्ति और सूफी आंदोलनों के वैचारिक विकास, संतों के दार्शनिक…
← पिछला प्रश्न
बंगाल विभाजन (1905) और इसके विरोध में संचालित स्वदेशी एवं…
Related Questions
→
1857 के महान विद्रोह के उदय के लिए उत्तरदायी राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक कारणों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. लॉर्ड डलहौजी की 'हपड़ नीति' (Doctrine of Lapse) के तहत सतारा, नागपुर और झांसी जैसे राज्यों का ब्रिटिश साम्राज्य में विलय कर दिया गया, जिससे भारतीय शासक वर्ग और पारंपरिक अभिजात वर्ग में गंभीर राजनीतिक असंतोष उत्पन्न हुआ।
2. ब्रिटिश सरकार द्वारा लाए गए 'धार्मिक निर्योग्यता अधिनियम, 1850' (Religious Disabilities Act) के तहत ईसाई बनने वाले व्यक्ति को पैतृक संपत्ति से वंचित करने के पुराने हिंदू कानून को बदल दिया गया, जिसे रूढ़िवादी भारतीयों ने ईसाई धर्म में जबरन मतांतरण को बढ़ावा देने वाला षड्यंत्र माना।
3. भू-राजस्व की कठोर प्रणालियों (जैसे स्थायी बंदोबस्त और रयतवारी व्यवस्था) के कारण पारंपरिक जमींदारों और कृषकों का बड़े पैमाने पर आर्थिक शोषण हुआ, तथा ब्रिटिश निर्मित सस्ते कारखानों के कपड़ों के आयात ने भारत के पारंपरिक हस्तशिल्प और कुटीर उद्योगों को पूरी तरह तबाह कर दिया।
4. समाज सुधार के नाम पर लागू किए गए कानूनों—जैसे सती प्रथा निषेध कानून (1829) और हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम (1856)—को पारंपरिक भारतीय समाज ने अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं में सीधा और असहनीय हस्तक्षेप माना।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
→
1857 के महान विद्रोह के दौरान लखनऊ और अवध क्षेत्र में हुए संघर्ष तथा बेगम हजरत महल एवं मौलवी अहमदुल्लाह शाह की भूमिका के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. बेगम हजरत महल ने अपने अल्पवयस्क पुत्र बिरjis कादिर को अवध का नवाब घोषित कर लखनऊ में विद्रोह का नेतृत्व किया और ब्रिटिश रेजिडेंसी की घेराबंदी के दौरान सैन्य रणनीतियों का प्रभावी संचालन किया।
2. मौलवी अहमदुल्लाह शाह, जिन्हें 'डंका शाह' के नाम से भी जाना जाता है, ने फैजाबाद और रोहिलखंड क्षेत्र में अंग्रेजों के विरुद्ध जिहाद का आह्वान किया और ब्रिटिश सेनापतियों को अपनी गुरिल्ला युद्ध शैली से कड़ी चुनौती दी।
3. लखनऊ की अंतिम रक्षा और ब्रिटिश नियंत्रण स्थापित करने के दौरान सर कॉलिन कैंपबेल और सर जेम्स आउट्राम ने मुख्य भूमिका निभाई, तथा बेगम हजरत महल ने अंग्रेजों के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया और पेंशन स्वीकार कर ली।
4. मौलवी अहमदुल्लाह शाह पर अंग्रेजों ने अत्यधिक इनाम घोषित किया था, और अंततः पुवियाँ (पवैन) के राजा के विश्वासघात के कारण उन्हें अंग्रेजों द्वारा घेर लिया गया तथा युद्ध में उनकी मृत्यु हो गई।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
→
1857 के महान विद्रोह के विभिन्न क्षेत्रों में ब्रिटिश सेना द्वारा विद्रोह के दमन के संदर्भ में, निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए:
1. दिल्ली - जॉन निकलसन
2. लखनऊ - सर कॉलिन कैंपबेल
3. कानपुर - मेजर जनरल हैवलॉक
4. झाँसी - जेम्स आउट्राम
उपर्युक्त युग्मों में से कौन-से सही सुमेलित हैं?
→
1857 के महान विद्रोह के दौरान दिल्ली में विद्रोहियों द्वारा मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर को भारत का सम्राट घोषित किए जाने और उनके नेतृत्व की वास्तविक राजनीतिक तथा सैन्य वास्तविकताओं के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. बहादुर शाह जफर ने स्वेच्छा से और अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के तहत इस विद्रोह की संपूर्ण सैन्य कमान और सर्वोच्च राजनीतिक नेतृत्व अपने हाथों में लिया था, तथा वे अंग्रेजों के खिलाफ सक्रिय रूप से युद्ध रणनीतियों की योजना बनाते थे।
2. यद्यपि बहादुर शाह जफर को प्रतीकात्मक और औपचारिक रूप से विद्रोहियों द्वारा 'शहनशाह-ए-हिंदुस्तान' घोषित किया गया था, किंतु वास्तविक सत्ता का नियंत्रण दिल्ली में गठित 'कोर्ट ऑफ सोल्जर्स' (सैनिकों की अदालत) के पास था, जिसमें विद्रोही सिपाहियों के प्रतिनिधि शामिल थे।
3. दिल्ली में विद्रोहियों के पास न तो सुसंगत आर्थिक संसाधन थे और न ही कुशल सैन्य समन्वय, जिसके कारण जनरल जॉन निकलसन के नेतृत्व में ब्रिटिश सेना द्वारा दिल्ली की पुनः घेराबंदी और आक्रमण के पश्चात जफर को हुमायूं के मकबरे से गिरफ्तार कर लिया गया था।
4. दिल्ली पर अंग्रेजों के अधिकार के बाद बहादुर शाह जफर पर मुकदमा चलाया गया और उन्हें निर्वासित कर रंगून भेज दिया गया, जहाँ उनकी मृत्यु हो गई, जिससे भारत में औपचारिक रूप से मुगल राजवंश का अंत हो गया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
→
मुगल काल में "खुलासत-उत-तवारीख" के लेखक कौन हैं?
→
महाभारत का फारसी अनुवाद "रज़्मनामा" किसके निर्देशन में किया गया था?
Log in
to add to quiz, bookmark, or report issues.