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History of India
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पल्लव और चालुक्य राजवंशों के संघर्ष तथा दक्षिण भारत के राजनीतिक इतिहास के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. पल्लव नरेश महेन्द्रवर्मन् प्रथम ने अपने प्रारंभिक जीवन में जैन धर्म का अनुयायी होने के बावजूद शैव संत अप्पर (तिरुनावुक्करासर) के प्रभाव में आकर शैव धर्म स्वीकार कर लिया था, और उसने महाबलीपुरम में प्रसिद्ध एकश्म (मोनोलिथिक) रथ मंदिरों के निर्माण की शुरुआत कराई थी।
  2. 2. चालुक्य सम्राट पुलकेशिन द्वितीय ने नर्मदा नदी के तट पर हर्षवर्धन की विशाल सेना को पराजित किया था, जिसका सजीव और ऐतिहासिक विवरण कालिदास द्वारा रचित 'ऐहोले प्रशस्ति' में प्राप्त होता है, जिसके रचयिता कवि रवि कीर्ति थे।
  3. 3. पल्लव शासक नरसिंहवर्मन् प्रथम (महामल्ल) ने चालुक्य राजधानी वतापी (बागलकोट) पर अधिकार कर लिया था और इस विजय के उपरांत उसने 'वातापिकोंड' की उपाधि धारण की थी।
  4. 4. राष्ट्रकूट वंश के संस्थापक दन्तिदुर्ग ने चालुक्य वंश के अंतिम शासक कीर्तिवर्मन् द्वितीय को पराजित कर अपनी राजनीतिक सत्ता स्थापित की थी, जिससे चालुक्यों की मुख्य राजनीतिक शक्ति का अंत हो गया था।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?

Detailed Explanation

उपर्युक्त कथनों में से कथन 1, 3 और 4 सही हैं, जबकि कथन 2 गलत है। महाबलीपुरम के प्रसिद्ध एकश्म (मोनोलिथिक) रथ मंदिरों का निर्माण पल्लव शासक नरसिंहवर्मन् प्रथम (महामल्ल) के काल में करवाया गया था, न कि महेन्द्रवर्मन् प्रथम के काल में, हालांकि महेन्द्रवर्मन् ने रॉक-कट (चट्टान काटकर) गुफा मंदिरों की परंपरा शुरू की थी। पुलकेशिन द्वितीय और हर्षवर्धन के बीच युद्ध का विवरण ऐहोले प्रशस्ति में मिलता है, लेकिन इस प्रशस्ति के रचयिता कवि रवि कीर्ति थे, न कि कालिदास। चालुक्य और पल्लव राजवंशों के राजनीतिक संघर्ष और कला-संस्कृति के बारे में अधिक जानने के लिए आप विकिपीडिया संदर्भ देख सकते हैं।
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