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History of India
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भक्ति और सूफी आंदोलन की विभिन्न धाराओं, उनके दार्शनिक सिद्धांतों और प्रमुख संतों के योगदान के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संत ज्ञानेश्वर (ज्ञानदेव) ने मराठी भाषा में 'भावार्थदीपिका' (ज्ञानेश्वरी) की रचना की, जो भगवद्गीता पर एक अत्यंत प्रसिद्ध और दार्शनिक टीका है, तथा उन्होंने महाराष्ट्र के 'वारकरी संप्रदाय' को मुख्यधारा की धार्मिक चेतना से जोड़ा था।
- 2. सूफी संत शेख शहाबुद्दीन सुहरावर्दी द्वारा स्थापित 'सुहरावर्दी सिलसिला' ने राजकीय सत्ता और सुल्तानों के दरबार से पूर्ण दूरी बनाए रखने की नीति का कठोरता से पालन किया था, और इसके संतों ने कभी भी राज्य से किसी प्रकार की जागीर या वित्तीय सहायता स्वीकार नहीं की।
- 3. वल्लभाचार्य ने 'शुद्धद्वैत वेदांत' के दर्शन का प्रतिपादन किया और कृष्ण भक्ति के 'पुष्टिमार्ग' की स्थापना की, जिसके अनुसार ब्रह्म और जगत में कोई भेद नहीं है, बल्कि जगत ब्रह्म का ही शुद्ध और वास्तविक रूप है।
- 4. सूफी मत के अंतर्गत 'बेशरा' वे संत थे जो इस्लामिक शरीयत (कानून) के नियमों और आदेशों से बंधे नहीं थे और अपनी स्वतंत्र आध्यात्मिक अवस्था में जीवन व्यतीत करते थे, जबकि 'बाशरा' वे संत थे जो शरीयत के कानूनों का कठोरता से पालन करते थे।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
भक्ति और सूफी आंदोलन भारतीय इतिहास के मध्यकाल के अत्यंत महत्वपूर्ण धार्मिक और सांस्कृतिक आंदोलन थे। इस प्रश्न के संदर्भ में: कथन 1 सही है क्योंकि संत ज्ञानेश्वर (ज्ञानदेव) ने वारकरी संप्रदाय से संबंधित रहते हुए मराठी में 'ज्ञानेश्वरी' की रचना की। कथन 2 गलत है क्योंकि सुहरावर्दी सिलसिले के संतों ने चिश्ती संतों के विपरीत राजकीय सत्ता और शाही दरबार के साथ घनिष्ठ संबंध रखे तथा सुल्तानों से जागीरें एवं वित्तीय सहायता स्वीकार की थी (राज्य से दूरी बनाए रखने की कठोर नीति चिश्ती संतों की विशेषता थी)। कथन 3 सही है, वल्लभाचार्य ने शुद्धद्वैत वेदांत का प्रतिपादन किया और पुष्टिमार्ग के माध्यम से कृष्ण भक्ति का प्रचार किया। कथन 4 सही है, बेशरा संत शरीयत के नियमों से मुक्त थे (जिन्हें मस्तों या कलंदर भी कहा जाता था) जबकि बाशरा संत शरीयत का पालन करते थे। विस्तृत अध्ययन के लिए आप विकिपीडिया संदर्भ देख सकते हैं।
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किस अधिकारी को "सद्र-उस-सुदूर" के अधीन धार्मिक विवादों को निपटाने की जिम्मेदारी दी गई थी?
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इतिहासकार बरनी के अनुसार, अलाउद्दीन के सुधारों के कारण दिल्ली के आसपास के क्षेत्रों में किसका अभाव हो गया था?
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मुगलकालीन प्रशासनिक व्यवस्था और राजस्व सुधारों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राजा टोडरमल द्वारा अकबर के शासनकाल में लागू की गई 'दहशाला' (या आयन-ए-दहशाला) व्यवस्था में पिछले दस वर्षों के औसत उत्पादन और कृषि जिंसों के औसत प्रचलित मूल्यों के आधार पर मालगुजारी का निर्धारण किया जाता था।
2. जहांगीर के शासनकाल में मनसबदारी व्यवस्था में 'दुस्पा-सिंहस्पा' (दो और तीन घोड़े वाले) प्रणाली की शुरुआत की गई थी, जिसके अंतर्गत मनसबदारों को अपने मूल सवार पद से अतिरिक्त घोड़े रखने की अनुमति दी जाती थी, जिसके लिए उन्हें कोई अतिरिक्त वेतन नहीं मिलता था।
3. शाहजहां के काल में भू-राजस्व निर्धारण के लिए 'जमा' (आकलित राजस्व) और 'हासिल' (वास्तविक वसूल किया गया राजस्व) के बीच का अंतर काफी बढ़ गया था, जिसके कारण जागीरों की कमी की समस्या ('जागीर संकट') और गंभीर हो गई।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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ब्रिटिश भारत में लागू की गई विभिन्न भू-राजस्व प्रणालियों — स्थाई बंदोबस्त, रयतवारी और महालवारी — के आर्थिक प्रभावों और उनकी प्रशासनिक विशेषताओं के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. स्थाई बंदोबस्त (Permanent Settlement) के अंतर्गत भू-राजस्व की दर को स्थायी रूप से निश्चित कर दिया गया था, जिससे ब्रिटिश सरकार को तो वित्तीय स्थिरता प्राप्त हुई, किंतु जमींदारों द्वारा अत्यधिक उत्पीड़न और 'सूर्यास्त कानून' के कारण पारंपरिक कृषक वर्ग भूमिहीन श्रमिकों में बदल गया।
2. थॉमस मुनरो द्वारा दक्षिणी और पश्चिमी भारत में लागू की गई रयतवारी व्यवस्था में सरकार और कृषक (रयत) के मध्य सीधा संबंध स्थापित हुआ, जिसमें भूमि का स्वामित्व किसानों को दिया गया, परंतु अत्यधिक राजस्व माँग और सूखा या अकाल के समय भी कर में कोई छूट न मिलने के कारण किसान महाजनों के ऋण जाल में फंस गए।
3. महालवारी व्यवस्था, जिसे उत्तर-पश्चिम प्रांत, मध्य भारत और पंजाब में लागू किया गया था, के अंतर्गत भू-राजस्व के निर्धारण के लिए व्यक्तिगत किसान को इकाई न मानकर पूरे ग्राम या ग्राम समूह (महाल) को इकाई माना गया तथा राजस्व भुगतान की सामूहिक जिम्मेदारी पूरे ग्राम समुदाय पर डाली गई।
4. इन तीनों भू-राजस्व प्रणालियों के परिणामस्वरूप भारतीय कृषि का बड़े पैमाने पर वाणिज्यीकरण (Commercialization) हुआ, जिसके कारण किसानों ने स्वेच्छा से अपनी खाद्यान्न फसलों को छोड़कर कपास, नील और जूट जैसी नकदी फसलों का उत्पादन शुरू किया और इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था अत्यधिक समृद्ध हो गई।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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वर्धन राजवंश तथा दक्षिण भारत के राजवंशों (चोल, पल्लव, चालुक्य) की प्रशासनिक, सांस्कृतिक एवं सैन्य प्रणालियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. पल्लव शासक नरसिंहवर्मन प्रथम (महामल्ल) के शासनकाल में महाबलीपुरम में एकश्म रथ मंदिरों (सप्त पगोडा) का निर्माण करवाया गया था, तथा इसी काल में चीनी यात्री ह्वेनसांग ने पल्लव की राजधानी कांचीपुरम की यात्रा की थी।
2. बादामी के चालुक्य वंश के सम्राट पुलकेशिन द्वितीय ने नर्मदा नदी के तट पर हर्षवर्धन को पराजित किया था, जिसका सजीव और विस्तृत ऐतिहासिक विवरण रविचर्ति द्वारा रचित ऐहोल शिलालेख में प्राप्त होता है।
3. चोल राजवंश की स्थानीय स्वशासन प्रणाली, जिसका स्पष्ट उल्लेख उत्तरमेरूर अभिलेखों में मिलता है, के अंतर्गत ग्राम सभाओं (सभा या महासभा) के सदस्यों के चयन के लिए 'कुडवोलाई' (घड़े की पर्ची) नामक अनूठी लोकतांत्रिक एवं पारदर्शी लॉटरी प्रणाली का प्रयोग किया जाता था।
4. हर्ष के कन्नौज सभा के दौरान महायान बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए चीनी यात्री ह्वेनसांग को अध्यक्ष बनाया गया था, किंतु ह्वेनसांग की इस सर्वोच्च धार्मिक स्थिति से ईर्ष्यावश हीनयानियों और ब्राह्मणों ने सभा के पंडाल में आग लगाने का असफल षड्यंत्र रचा था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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