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History of India
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उन्नीसवीं शताब्दी के सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों और उनके संस्थापकों के वैचारिक दृष्टिकोण के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. राजा राममोहन राय द्वारा स्थापित 'ब्रह्म समाज' ने मूर्तिपूजा, बहुदेववाद और पुरोहितवाद की कड़ी आलोचना करते हुए एकेश्वरवाद और वेदों की अचूकता (अपौरुषेयता) को अपने धर्म का एकमात्र आधार बनाया था।
- 2. स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा स्थापित 'आर्य समाज' ने 'वेदों की ओर लौटो' का नारा दिया और मध्यकालीन पुराणों तथा पौराणिक हिंदू धर्म की रूढ़ियों को खारिज करते हुए शुद्धि आंदोलन के माध्यम से हिंदू धर्म से धर्मांतरित व्यक्तियों की वापसी का समर्थन किया।
- 3. केशव चंद्र सेन के ब्रह्म समाज से अलग होने के पश्चात आनंद मोहन बोस और शिवनाथ शास्त्री ने वर्ष 1878 में 'साधारण ब्रह्म समाज' की स्थापना की, जो ब्रह्म समाज के भीतर बाल विवाह और जातिगत भेदभाव जैसी सामाजिक कुरीतियों के प्रति अधिक कठोर और प्रगतिशील दृष्टिकोण रखता था।
- 4. प्रार्थना समाज की स्थापना वर्ष 1867 में बंबई में आत्माराम पांडुरंग द्वारा महादेव गोविंद रानाडे और आर.जी. भंडारकर के सहयोग से की गई थी, जिसका मुख्य उद्देश्य अंतर-जातीय विवाह, विधवा पुनर्विवाह और महिलाओं की शिक्षा को बढ़ावा देना था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 असत्य है क्योंकि राजा राममोहन राय और उनके द्वारा स्थापित विकिपीडिया संदर्भ (ब्रह्म समाज) ने वेदों की अचूकता (अपौरुषेयता) को कभी स्वीकार नहीं किया था, जबकि आर्य समाज वेदों को स्वतः प्रमाण और अपौरुषेय मानता है। कथन 2, 3 और 4 पूर्णतः सत्य हैं; स्वामी दयानंद सरस्वती ने वेदों की सर्वोच्चता पर बल दिया, साधारण ब्रह्म समाज की स्थापना 1878 में हुई, और प्रार्थना समाज ने पश्चिमी भारत में सामाजिक सुधारों के लिए महत्वपूर्ण कार्य किया।
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वर्ष 1857 के महान विद्रोह के दौरान दिल्ली में सत्ता के विकेंद्रीकरण और मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर की वास्तविक राजनीतिक स्थिति के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. दिल्ली के विद्रोही सिपाहियों और नवाबों द्वारा प्रशासन के सुचारू संचालन के लिए दस सदस्यों (छह सैन्य और चार नागरिक) वाली एक 'कोर्ट ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन' (प्रशासनिक न्यायालय) का गठन किया गया था, जिसके सभी महत्वपूर्ण निर्णय सम्राट की व्यक्तिगत अनुमति के बिना लिए जाते थे।
2. बहादुर शाह जफर इस विद्रोह के नाममात्र के प्रतीक और 'शहंशाह-ए-हिन्दुस्तान' अवश्य बनाए गए थे, किंतु उनकी स्थिति इतनी विवश थी कि वे अपने ही राजमहल के भीतर विद्रोही सैनिकों की अनुशासनहीनता, आर्थिक तंगी और मनमानी कार्यप्रणाली पर कोई प्रभावी नियंत्रण स्थापित नहीं कर सके थे।
3. सितंबर 1857 में ब्रिटिश सेना द्वारा दिल्ली पर पुनradhikar (पुनः अधिकार) करने के पश्चात, बहादुर शाह जफर को अंग्रेजों ने गिरफ्तार कर रंगून (बर्मा) निर्वासित कर दिया था, जहाँ वर्ष 1862 में उनका निधन हो गया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
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वर्ष 1857 के महान विद्रोह के दौरान फैजाबाद, बरेली और इलाहाबाद (प्रयागराज) में ब्रिटिश सत्ता द्वारा विद्रोह के दमन और इसके प्रमुख नेतृत्वकर्ताओं से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. फैजाबाद में विद्रोह की बागडोर संभालने वाले 'मौलवी अहमदुल्लाह शाह' को अंग्रेजों ने जीवित या मृत पकड़ने के लिए पचास हजार रुपये का भारी इनाम घोषित किया था, जिन्हें अंततः पुवायाँ के राजा के साथ हुए विश्वासघात के बाद ब्रिटिश सेना द्वारा मार दिया गया था।
2. रोहिलखंड क्षेत्र के बरेली में खान बहादुर खान ने 1857 के विद्रोह का सफलतापूर्वक नेतृत्व किया था, किंतु जनरल कैंपबेल के नेतृत्व में ब्रिटिश सेना द्वारा बरेली पर पुनः अधिकार करने के पश्चात खान बहादुर खान को नेपाल भागने पर विवश होना पड़ा और वे कभी पकड़े नहीं गए।
3. इलाहाबाद में लियाकत अली ने विद्रोह का नेतृत्व करते हुए शानदार प्रतिरोध किया, लेकिन कर्नल नील की क्रूर सैन्य कार्रवाई के बाद इस विद्रोह का पूरी तरह दमन कर दिया गया तथा लियाकत अली को गिरफ्तार कर आजीवन काले पानी (अंडमान) की सजा दी गई।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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वर्ष 1857 के महान विद्रोह के दौरान लखनऊ और अवध क्षेत्र में बेगम हजरत महल और मौलवी अहमदुल्लाह शाह की भूमिका के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. बेगम हजरत महल ने अपने अल्पवयस्क पुत्र बिरjis कदर को अवध का नवाब घोषित कर लखनऊ में विद्रोह का नेतृत्व संभाला तथा ब्रिटिश सेना के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष का संचालन करते हुए अंततः नेपाल की तराई में शरण ली, जहाँ उनकी मृत्यु हुई।
2. मौलवी अहमदुल्लाह शाह (जिन्हें 'डंका शाह' के नाम से भी जाना जाता था) ने रोहिलखंड और अवध क्षेत्र में ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध जिहाद का आह्वान किया तथा अंग्रेजों द्वारा उनके पकड़े जाने पर उन्हें लखनऊ में सार्वजनिक रूप से फांसी दे दी गई थी।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
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1857 के महान विद्रोह के स्वरूप और प्रकृति के संबंध में विभिन्न इतिहासकारों के प्रसिद्ध कथनों और पुस्तकों के संदर्भ में निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए:
1. एस.एन. सेन (Surendranath Sen) - "यह तथाकथित प्रथम राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम न तो पहला, न ही राष्ट्रीय और न ही स्वतंत्रता संग्राम था।"
2. बेंजामिन डिजरायली (Benjamin Disraeli) - "यह केवल एक सिपाही विद्रोह नहीं था, बल्कि यह राष्ट्रीय विद्रोह था।"
3. वी.डी. सावरकर (V.D. Savarkar) - "यह 1857 का विद्रोह एक सुनियोजित राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम था।"
4. टी.आर. होम्स (T.R. Holmes) - "यह बर्बरता और सभ्यता के बीच का युद्ध था।"
उपर्युक्त युग्मों में से कौन-से युग्म सही सुमेलित हैं?
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सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930-34), गोलमेज सम्मेलनों और गांधी-इरविन समझौते के ऐतिहासिक घटनाक्रम के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. कांग्रेस के कराची अधिवेशन (1931) में गांधी-इरविन समझौते को औपचारिक रूप से अनुमोदित किया गया था तथा इसी अधिवेशन में पहली बार कांग्रेस ने 'मौलिक अधिकार और राष्ट्रीय आर्थिक कार्यक्रम' से संबंधित प्रस्ताव पारित किए थे।
2. वर्ष 1931 में आयोजित द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में महात्मा गांधी ने कांग्रेस के एकमात्र आधिकारिक प्रतिनिधि के रूप में भाग लिया था, जहाँ कम्यूनल अवार्ड (सांप्रदायिक पंचाट) के मुद्दे पर दलितों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल की मांग को लेकर उनका डॉ. बी.आर. अंबेडकर के साथ तीव्र मतभेद हुआ था।
3. प्रथम गोलमेज सम्मेलन के दौरान ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैमसे मैकडोनाल्ड ने भारत के लिए 'डोमिनियन स्टेट्स' (औपनिवेशिक स्वराज्य) की पूर्ण घोषणा कर दी थी, जिससे संतुष्ट होकर मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा ने इस सम्मेलन के सभी निर्णयों का पूर्ण समर्थन किया था।
4. सविनय अवज्ञा आंदोलन के दूसरे चरण (1932-34) के दौरान जब गांधीजी ने आंदोलन पुनर्जीवित किया, तब ब्रिटिश सरकार ने दमन चक्र तेज करते हुए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को एक 'गैर-कानूनी संगठन' घोषित कर दिया था और इसके अधिकांश नेताओं को गिरफ्तार कर लिया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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