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History of India
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महात्मा गांधी के प्रारंभिक आंदोलनों (चंपारण सत्याग्रह, खेड़ा सत्याग्रह और असहयोग आंदोलन) के वैचारिक और व्यावहारिक स्वरूप के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. चंपारण सत्याग्रह (1917) के दौरान, यूरोपीय नील बागान मालिकों द्वारा किसानों पर थोपी गई 'तीनकथा प्रणाली' के अंतर्गत किसानों को अपनी भूमि के 3/20 वें हिस्से पर नील की खेती करना अनिवार्य था, जिसे समाप्त करने के लिए गांधीजी द्वारा भारत में किया गया यह पहला सविनय अवज्ञा का सफल प्रयोग था।
- 2. वर्ष 1918 के खेड़ा सत्याग्रह में फसल खराब होने के बावजूद ब्रिटिश सरकार द्वारा राजस्व माफी से इंकार करने पर, गांधीजी ने किसानों को भू-राजस्व का पूर्ण बहिष्कार करने का निर्देश दिया और वल्लभभाई पटेल के साथ मिलकर इस आंदोलन का नेतृत्व किया।
- 3. वर्ष 1920 में प्रारंभ हुए 'असहयोग आंदोलन' के दौरान नागपुर अधिवेशन (दिसंबर 1920) में कांग्रेस के संविधान में परिवर्तन किया गया, जिसके तहत शांतिपूर्ण और वैध तरीकों से 'स्वराज' की प्राप्ति को कांग्रेस का आधिकारिक लक्ष्य बनाया गया।
- 4. असहयोग आंदोलन के स्थगन के पश्चात चौरी-चौरा की घटना (5 फरवरी 1922) के विरोध में गांधीजी ने तुरंत कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया और आजीवन किसी भी राजनीतिक आंदोलन में भाग न लेने की घोषणा की।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
चंपारण सत्याग्रह (1917) महात्मा गांधी द्वारा भारत में चलाया गया पहला सफल सत्याग्रह था, जहाँ 'तीनकथा प्रणाली' के अंतर्गत किसानों को अपनी भूमि के 3/20 भाग पर नील की खेती करने के लिए बाध्य किया जाता था। वर्ष 1920 के नागपुर अधिवेशन में असहयोग आंदोलन के प्रस्ताव की पुष्टि की गई और कांग्रेस के संविधान में क्रांतिकारी परिवर्तन कर शांतिपूर्ण व वैध साधनों द्वारा 'स्वराज' प्राप्ति का लक्ष्य रखा गया। इसके विपरीत, खेड़ा सत्याग्रह (1918) में गांधीजी ने किसानों को केवल उन्हीं लोगों द्वारा कर भुगतान करने को कहा जो सक्षम थे (पूर्ण बहिष्कार का नहीं बल्कि सशर्त भुगतान का रुख था)। चौरी-चौरा कांड के बाद गांधीजी ने आंदोलन स्थगित अवश्य किया था, परंतु उन्होंने कांग्रेस की सदस्यता से इस्तीफा नहीं दिया था। इस विषय के विस्तृत अध्ययन के लिए आप विकिपीडिया संदर्भ देख सकते हैं।
Related Questions
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यूरोपीय कंपनियों के भारत आगमन और बंगाल में ब्रिटिश सत्ता की स्थापना के प्रारंभिक दौर के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. वर्ष 1717 में मुगल सम्राट फर्रुख्शियर द्वारा जारी फरमान के तहत ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल में 3,000 रुपये वार्षिक कर के बदले मुफ्त व्यापार करने का अधिकार मिला, जिसे कंपनी के अधिकारियों ने अपने निजी व्यापार पर मिलने वाले 'दस्तक' (Duty-free pass) का दुरुपयोग कर भारी वित्तीय क्षति पहुँचाई।
2. प्लासी के युद्ध (1757) के तुरंत बाद बंगाल के नवाब मीर जाफर ने अंग्रेजों को संतुष्ट करने के लिए चौबीस परगना जिले की जमींदारी अंग्रेजों को सौंप दी और कलकत्ता की किलेबंदी के लिए बड़ी धनराशि दी।
3. बक्सर के युद्ध (1764) की निर्णायक विजय के पश्चात अंग्रेजों ने अवध के नवाब शुजाउद्दोला के साथ इलाहाबाद की संधि (1765) की, जिसके तहत कड़ा और इलाहाबाद के जिले नवाब से लेकर मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय को सौंप दिए गए।
4. वर्ष 1765 में रॉबर्ट क्लाइव द्वारा बंगाल में द्वैध शासन (Dual Government) प्रणाली लागू की गई, जिसके अंतर्गत राजस्व संग्रह का अधिकार 'दीवानी' कंपनी के पास रहा जबकि प्रशासन और न्याय का दायित्व 'निजामत' नवाब के नियंत्रण में रखा गया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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वर्ष 1857 के महान विद्रोह के दौरान लखनऊ और अवध क्षेत्र में हुए प्रतिरोध के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. बेगम हजरत महल ने अपने अल्पवयस्क पुत्र बिरजिस कादिर को अवध का नवाब घोषित कर लखनऊ में विद्रोह का नेतृत्व संभाला और ब्रिटिश रेजिडेंसी की घेराबंदी का प्रभावी ढंग से संचालन किया था।
2. 'फैजाबाद के मौलवी' के रूप में प्रसिद्ध अहमदुल्लाह शाह ने चिनहट के युद्ध (जुलाई 1857) में ब्रिटिश सेनापति हेनरी लॉरेंस की सेना को पराजित करने में रणनीतिक नेतृत्व प्रदान किया था और उन पर अंग्रेजों द्वारा इनाम घोषित किया गया था।
3. लखनऊ पर पुनः अधिकार प्राप्त करने के अंतिम चरणों में ब्रिटिश सेनापति सर कॉलिन कैंपबेल ने गोरखा रेजिमेंट की सैन्य सहायता ली थी, और पराजय के उपरांत बेगम हजरत महल ने अंग्रेजों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया था, जिन्हें बाद में कलकत्ता निर्वासित कर दिया गया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
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वर्ष 1857 के महान विद्रोह की असफलता और इसके नेतृत्व की कमियों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. 1857 के विद्रोह के दौरान विद्रोही नेताओं के पास आधुनिक सैन्य तकनीक, संचार माध्यमों और हथियारों का भारी अभाव था, तथा उनके पास भविष्य के भारतीय प्रशासनिक और राजनीतिक ढांचे का कोई स्पष्ट दूरदर्शी खाका नहीं था।
2. यद्यपि मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर को विद्रोहियों द्वारा भारत का सम्राट घोषित किया गया था, तथापि विभिन्न क्षेत्रीय केंद्रों के नेताओं जैसे नाना साहब, लक्ष्मीबाई और कुंवर सिंह के बीच प्रभावकारी केंद्रीय समन्वय और रणनीतिक एकता का पूर्ण अभाव था।
3. भारत के सभी शिक्षित मध्यम वर्ग, आधुनिक बुद्धिजीवियों और अधिकांश देशी रियासतों के शासकों (जैसे सिंधिया, होलकर और हैदराबाद के निजाम) ने इस राष्ट्रीय संघर्ष में खुलकर विद्रोहियों का साथ दिया और ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध सशस्त्र सहायता प्रदान की।
4. विद्रोह का प्रसार मुख्य रूप से उत्तर और मध्य भारत तक ही सीमित रहा, जबकि दक्षिण भारत, पंजाब का अधिकांश भाग और पश्चिमी भारत का क्षेत्र शांत बना रहा।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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ब्रिटिश शासनकाल में भारत में लागू की गई विभिन्न भू-राजस्व प्रणालियों (स्थाई बंदोबस्त, रयतवारी और महालवारी) के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. लॉर्ड कार्नवालिस द्वारा बंगाल, बिहार और उड़ीसा में लागू किए गए 'स्थाई बंदोबस्त' (Permanent Settlement) के तहत जमींदारों को भूमि का वास्तविक मालिक बना दिया गया, किंतु 'सूर्यास्त कानून' (Sunset Law) के अंतर्गत यदि कोई जमींदार निर्धारित सूर्योदय से पूर्व अपना भू-राजस्व जमा नहीं करता था, तो उसकी जमींदारी का एक हिस्सा नीलाम कर दिया जाता था।
2. थॉमस मुनरो और कैप्टन रीड द्वारा मुख्य रूप से मद्रास और बंबई प्रेसीडेंसी में विकसित 'रयतवारी व्यवस्था' में सरकार और किसान (रयत) के बीच सीधा अनुबंध होता था, जिसमें लगान की दरें स्थायी थीं और किसी भी स्थिति में सरकार द्वारा उसमें वृद्धि नहीं की जा सकती थी।
3. हॉल्ट मैकेंज़ी और रॉबर्ट मार्टिंस बर्ड द्वारा प्रतिपादित 'महालवारी व्यवस्था' के अंतर्गत भू-राजस्व का निर्धारण व्यक्तिगत किसान के स्तर पर न करके संपूर्ण ग्राम या महाल (गाँवों के समूह) के आधार पर किया जाता था, जिसमें ग्राम का कोई प्रमुख व्यक्ति या लंबरदार कर संग्रह के लिए उत्तरदायी होता था।
4. इन तीनों भू-राजस्व प्रणालियों के परिणामस्वरूप भारतीय कृषि का बड़े पैमाने पर वाणिज्यीकरण (Commercialization of Agriculture) हुआ, जिससे किसानों ने पारंपरिक खाद्यान्न फसलों के स्थान पर नील, कपास और अफीम जैसी व्यावसायिक फसलों का उत्पादन करना शुरू कर दिया, जिससे पारंपरिक ग्रामीण अर्थव्यवस्था और आत्मनिर्भरता को गहरा आघात पहुँचा।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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सिंधु घाटी सभ्यता की परिपक्व अवस्था, इसकी नगरीय योजना, शिल्प और बाह्य व्यापार के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. हड़प्पा सभ्यता के किसी भी स्थल से मंदिर, महलों या स्पष्ट धार्मिक पूजा-गृह के अवशेष प्राप्त नहीं हुए हैं, जो यह दर्शाता है कि इस सभ्यता का शासन किसी पुरोहित वर्ग के हाथों में न होकर संभवतः व्यापारियों या वणिक वर्ग के हाथों में था।
2. बनावली से प्राप्त पकी हुई मिट्टी (टेराकोटा) का हल यह प्रमाणित करता है कि सिंधु घाटी के लोगों को कृषि के लिए हल का ज्ञान था, और यहाँ से जौ की एक उन्नत किस्म के साथ-साथ धान और बाजरे के साक्ष्य भी प्रचुर मात्रा में मिले हैं।
3. लोथल और चन्हूदड़ो दोनों ही स्थल मनके बनाने (Bead-making) के प्रमुख औद्योगिक केंद्र थे, जहाँ से कार्नेलियन, जैस्पर और शंख जैसी बहुमूल्य सामग्रियों से मनके तैयार किए जाते थे।
4. सुरकोटड़ा और कालीबंगा दोनों ही ऐसे स्थल हैं जहाँ से घोड़े के स्पष्ट और प्रामाणिक अवशेष (हड्डियाँ तथा दाँत) बड़ी मात्रा में प्राप्त हुए हैं, जो यह सिद्ध करते हैं कि सैंधव लोग घोड़े के पालन-पोषण और युद्ध में उसके व्यापक उपयोग से भली-भांति परिचित थे।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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