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History of India
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सत्रहवीं शताब्दी में छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा स्थापित मराठा साम्राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था और राजकोषीय नीतियों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. शिवाजी की केंद्रीय मंत्रिपरिषद 'अष्टप्रधान' में प्रधानमंत्री का पद 'पेशवा' कहलाता था, जो राजा के बाद सबसे महत्वपूर्ण अधिकारी था, और इस परिषद का प्रत्येक सदस्य सीधे अपने विभाग का स्वतंत्र प्रमुख होता था तथा उसे सैन्य नेतृत्व करने का भी अनिवार्य अधिकार प्राप्त था।
- 2. मराठा प्रशासन में भू-राजस्व निर्धारण के लिए मलिक अंबर की राजस्व व्यवस्था को आधार बनाया गया था, जिसके तहत कुल उपज का लगभग 40 प्रतिशत भाग राज्य को कर के रूप में दिया जाता था, जिसे बाद में शिवाजी ने बढ़ाकर 60 प्रतिशत कर दिया और 'मिरासदारों' के अधिकारों को समाप्त कर दिया।
- 3. 'चौथ' और 'सरदेशमुखी' मराठा साम्राज्य के प्रमुख बाह्य कर थे; चौथ पड़ोसी क्षेत्रों से सुरक्षा के एवज में वसूला जाने वाला कुल राजस्व का 25 प्रतिशत कर था, जबकि सरदेशमुखी एक प्रकार का अधिभार (Overcharge) था जो संपूर्ण देश पर उनके वंशानुगत सरदेशमुख होने के दावे के रूप में 10 प्रतिशत वसूला जाता था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 गलत है क्योंकि 'अष्टप्रधान' के सभी सदस्य (पेशवा को छोड़कर) असैनिक अधिकारी होते थे, जिन्हें आवश्यकता पड़ने पर सैन्य अभियानों का नेतृत्व करना पड़ता था, किंतु वे स्वतंत्र प्रमुख नहीं थे बल्कि वे राजा के अधीन कार्य करते थे और प्रत्येक विभाग का कार्य राजा के सीधे नियंत्रण में होता था। कथन 2 गलत है क्योंकि शिवाजी ने मलिक अंबर की भू-राजस्व व्यवस्था को अपनाते हुए पहले उपज का 33% कर निर्धारित किया था जिसे बाद में बढ़ाकर 40% किया गया, न कि 60%; साथ ही, उन्होंने पारंपरिक 'मिरासदारों' (स्थानीय भूमिस्वामियों) के अधिकारों को समाप्त नहीं किया था। कथन 3 पूरी तरह सही है; 'चौथ' पड़ोसी गैर-मराठा क्षेत्रों से आक्रमण न करने के एवज में वसूल किया जाने वाला भू-राजस्व का 25% कर था, और 'सरदेशमुखी' मराठों के राजा होने के दावे के रूप में वसूल किया जाने वाला 10% अतिरिक्त कर था। इस प्रशासनिक संरचना के बारे में अधिक जानने के लिए आप विकिपीडिया संदर्भ देख सकते हैं।
Related Questions
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मुगल साम्राज्य के प्रशासनिक, धार्मिक और स्थापत्य विकास के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. अकबर द्वारा साम्राज्य के सुदृढ़ीकरण हेतु लागू की गई 'मनसबदारी व्यवस्था' आंशिक रूप से मंगोलों की दशमलव पद्धति पर आधारित थी, जिसमें 'जात' पद व्यक्ति के व्यक्तिगत वेतन और पद को दर्शाता था, जबकि 'सवार' पद उसके द्वारा रखे जाने वाले घुड़सवार सैनिकों की संख्या को निश्चित करता था।
2. जहांगीर के शासनकाल में चित्रकला ने अपनी चरम सीमा या स्वर्ण युग को छुआ, किंतु इसी काल में नूरजहाँ ने एक शक्तिशाली राजनीतिक गुट (जहाँगीर जूता या ज्यूरी) का निर्माण किया था, जिसमें उसके पिता इत्तिमद उद्दौला और भाई आसफ खान शामिल थे।
3. शाहजहाँ के काल में स्थापत्य कला अपने स्वर्ण युग पर पहुँची, और इस दौरान यूरोपीय यात्री बर्नियर तथा ट्रैवर्नीयर ने यह उल्लेख किया कि साम्राज्य की अत्यधिक केंद्रीकृत प्रशासनिक व्यवस्था और कृषि पर बढ़ते राजस्व बोझ के कारण किसानों और कारीगरों की आर्थिक स्थिति अत्यंत दयनीय हो गई थी।
4. औरंगजेब द्वारा पुनः 'जिजिया' कर लगाया जाना तथा मंदिरों को ध्वस्त करने की उसकी नीति केवल धार्मिक असहिष्णुता का परिणाम नहीं थी, बल्कि इसके पीछे राजनीतिक और प्रशासनिक नियंत्रण की आवश्यकता भी जुड़ी हुई थी, और उसके शासनकाल के दौरान मुगल साम्राज्य का भू-भाग अपने अधिकतम विस्तार को प्राप्त हुआ था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
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सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930-34) और गांधी-इरविन समझौते के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. वर्ष 1930 में प्रारंभ हुए सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान दांडी मार्च के पश्चात देश के विभिन्न हिस्सों में नमक कानून तोड़ने के अलावा वन कानूनों की अवहेलना, चौकीदारी कर अदायगी का बहिष्कार और विदेशी कपड़ों का पूर्ण बहिष्कार जैसे कार्यक्रम व्यापक स्तर पर चलाए गए।
2. 5 मार्च 1931 को महात्मा गांधी और वायसराय लॉर्ड इरविन के बीच हुए समझौते के तहत सरकार ने उन सभी राजनीतिक कैदियों को तुरंत रिहा करने पर सहमति दी जिन पर हिंसा के आरोप थे, तथा जब्त की गई सभी संपत्तियों को बिना शर्त वापस कर दिया।
3. गांधी-इरविन समझौते के उपरांत कांग्रेस ने कराची अधिवेशन (1931) में इस समझौते का अनुमोदन किया और महात्मा गांधी को आगामी द्वितीय गोलमेज सम्मेलन (1931) में कांग्रेस के एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में लंदन जाने के लिए अधिकृत किया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
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ब्रिटिश भारत में लागू की गई विभिन्न भू-राजस्व व्यवस्थाओं—स्थाई बंदोबस्त, रयतवारी और महालवारी—के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. बंगाल, बिहार और उड़ीसा में लागू 'स्थाई बंदोबस्त' (Permanent Settlement) के तहत भू-राजस्व की दर को स्थायी रूप से निश्चित कर दिया गया था, जिससे जमींदार भूमि के वास्तविक स्वामी बन गए और यदि वे निर्धारित तिथि तक सूर्यास्त से पहले कर नहीं चुका पाते थे, तो उनकी जमींदारी नीलाम कर दी जाती थी (सूर्यास्त कानून)।
2. थॉमस मुनरो और कैप्टन रीड द्वारा मुख्य रूप से मद्रास और बंबई प्रेसीडेंसी में लागू की गई 'रयतवारी व्यवस्था' में सरकार और किसान (रयत) के बीच सीधा समझौता था, जिसमें व्यक्तिगत किसानों को भूमि का स्वामित्व दिया गया और लगान की दरें पूरी तरह स्थायी थीं, जिन्हें कभी बढ़ाया नहीं गया।
3. उत्तर-पश्चिम प्रांत, मध्य भारत और पंजाब के कुछ हिस्सों में लागू 'महालवारी व्यवस्था' के अंतर्गत भू-राजस्व का निर्धारण व्यक्तिगत किसान के स्तर पर न करके पूरे गाँव या 'महाल' (गाँवों के समूह) के आधार पर किया जाता था, और राजस्व संग्रह की जिम्मेदारी मुख्य रूप से ग्राम के मुखिया या लंबरदार को सौंपी जाती थी।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
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गुप्तकालीन अर्थव्यवस्था, भूमि अनुदान व्यवस्था (Land Grants) और प्रशासनिक संरचना के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. गुप्त काल में ब्राह्मणों, मंदिरों और बौद्ध विहारों को दिए जाने वाले कर-मुक्त भूमि अनुदान की प्रथा में भारी वृद्धि हुई, जिसे 'अग्रहार' अनुदान कहा जाता था, और इस प्रकार के अनुदानों से स्थानीय किसानों के अधिकार सुरक्षित रहते थे तथा उन्हें भूमि से बेदखल करने का अधिकार अनुदान प्राप्तकर्ताओं को नहीं था।
2. इस काल में स्वर्ण सिक्कों (जिसे 'दीनार' कहा जाता था) का प्रचलन बड़े पैमाने पर हुआ, किंतु गुप्त सम्राटों के उत्तरवर्ती काल में, विशेषकर स्कंदगुप्त के शासनकाल के बाद, स्वर्ण सिक्कों में सोने की शुद्धता में निरंतर गिरावट आई और तांबे व रजत सिक्कों का प्रयोग स्थानीय व्यापार में बढ़ गया।
3. गुप्त प्रशासनिक व्यवस्था में 'विषय' (जिला) के प्रशासनिक प्रमुख को 'विषयपति' कहा जाता था, जो नगर श्रेष्ठियों, सार्थवाहों, प्रथम कुलिक और प्रथम कायस्थ जैसे स्थानीय व्यापारियों व अधिकारियों के निकाय की सहायता से शासन संचालित करता था।
4. गुप्त काल में कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए राज्य द्वारा सिंचाई के साधनों पर विशेष ध्यान दिया गया था, जिसका सबसे प्रसिद्ध प्रमाण सौराष्ट्र प्रांत में स्थित 'सुदर्शन झील' का पुनर्निर्माण था, जिसे पुष्यगुप्त और तुषास्प के बाद गुप्त शासक स्कंदगुप्त के शासनकाल में पर्णदत्त और उसके पुत्र चक्रपालित द्वारा जीर्णोद्धार करवाया गया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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मुगलकालीन प्रशासनिक व्यवस्था, मनसबदारी प्रणाली और धार्मिक नीतियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. अकबर द्वारा प्रारंभ की गई मनसबदारी व्यवस्था में 'जात' पद मनसबदार के व्यक्तिगत वेतन और पद-प्रतिष्ठा को निर्धारित करता था, जबकि 'सवार' पद उसके द्वारा रखे जाने वाले घोड़ों और घुड़सवार सैनिकों की संख्या को स्पष्ट करता था।
2. जहांगीर के शासनकाल में मनसबदारी व्यवस्था के अंतर्गत 'दुअस्पा-सिंहअस्पा' प्रणाली की शुरुआत की गई, जिसके माध्यम से मनसबदारों को अपने 'जात' पद को बढ़ाए बिना अधिक घुड़सवार सैनिक रखने की अनुमति दी गई।
3. शाहजहां के शासनकाल में स्थापत्य कला ने अपनी चरमोत्कर्ष अवस्था को प्राप्त किया, और उसके द्वारा सिजदा और पाइबॉस जैसी फारसी दरबारी परंपराओं को पुनः अनिवार्य कर दिया गया, जिन्हें अकबर ने समाप्त कर दिया था।
4. औरंगजेब ने अपने शासनकाल में संगीत और चित्रकला को शाही दरबार से पूर्णतः प्रतिबंधित कर दिया, तथा उसने हिन्दू मंदिरों के निर्माण और उनके जीर्णोद्धार पर रोक लगाने के साथ-साथ जजिया कर को पुनः लागू कर दिया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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