Indian Polity
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भारतीय निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) और देश में चुनाव सुधारों के संवैधानिक तथा विधिक प्रावधानों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 324 के अंतर्गत निर्वाचन आयोग के मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, तथा संविधान में यह अनिवार्य रूप से उपबंधित किया गया है कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त को उसके पद से हटाने की प्रक्रिया सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान ही होगी, जबकि अन्य निर्वाचन आयुक्तों को मुख्य निर्वाचन आयुक्त की लिखित सिफारिश के बिना किसी भी परिस्थिति में नहीं हटाया जा सकता है।
- 2. जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 77 के अंतर्गत किसी राजनीतिक दल द्वारा अपने स्टार प्रचारकों (Star Campaigners) की सूची निर्वाचन आयोग और संबंधित मुख्य निर्वाचन अधिकारी को चुनाव प्रचार के चरण शुरू होने से कम से कम 48 घंटे पूर्व सौंपी जानी चाहिए, और इन स्टार प्रचारकों की यात्रा पर होने वाला व्यय संबंधित निर्वाचन क्षेत्र के उम्मीदवार के चुनावी खर्च की सीमा में शामिल नहीं किया जाता है।
- 3. निर्वाचन आयोग द्वारा चुनावों में काले धन के प्रभाव को नियंत्रित करने और चुनावी वित्तपोषण (Electoral Funding) में पारदर्शिता लाने के लिए वर्ष 2017 में राजनीतिक दलों को मिलने वाले अज्ञात चंदे की सीमा को 20,000 रुपये से घटाकर 2,000 रुपये प्रति व्यक्ति कर दिया गया था, जिसे आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 13A में संशोधन के माध्यम से कानूनी जामा पहनाया गया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 असत्य है क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 324(5) के अनुसार मुख्य निर्वाचन आयुक्त को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया (महाभियोग जैसी प्रक्रिया) और आधारों पर ही हटाया जा सकता है, किंतु अन्य निर्वाचन आयुक्तों को हटाने के लिए मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफारिश अनिवार्य होती है, ऐसा संविधान में नहीं बल्कि अधिनियमित नियमों के अधीन है (हालाँकि अन्य आयुक्तों को मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफारिश पर ही राष्ट्रपति द्वारा हटाया जा सकता है, किंतु संवैधानिक सुरक्षा केवल मुख्य निर्वाचन आयुक्त को प्राप्त है)। कथन 2 सत्य है; जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 77 के तहत राजनीतिक दलों को मान्यता प्राप्त स्टार प्रचारकों की सूची निर्धारित समय (आमतौर पर अधिसूचना जारी होने के 7 दिन या चुनाव चरण से पहले) के भीतर देनी होती है और उनके खर्च को उम्मीदवार की व्यक्तिगत व्यय सीमा से छूट दी जाती है। कथन 3 सत्य है; वर्ष 2017 के बजट और आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 13A में संशोधन के जरिए राजनीतिक दलों द्वारा नगद चंदे की अधिकतम अज्ञात सीमा को 20,000 रुपये से घटाकर 2,000 रुपये कर दिया गया था ताकि चुनावी फंडिंग में पारदर्शिता लाई जा सके। अधिक जानकारी के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पोर्टल पर विजिट करें।
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भारतीय संविधान के भाग II (अनुच्छेद 5-11) के अंतर्गत नागरिकता के प्रावधानों और नागरिकता (संशोधन) अधिनियमों के ऐतिहासिक विकास के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान लागू होने के समय (26 जनवरी 1950) अनुच्छेद 6 के अंतर्गत पाकिस्तान से भारत प्रवासन करने वाले व्यक्तियों के लिए नागरिकता के अर्जन की व्यवस्था की गई थी, जिसके तहत 1 जुलाई 1948 से पूर्व भारत आने वाले व्यक्तियों को स्वतः नागरिकता मिल जाती थी, जबकि उस तिथि के पश्चात आने वाले व्यक्तियों को छह महीने तक भारत में निवास करने के बाद निर्धारित अधिकारी के समक्ष पंजीकरण कराना अनिवार्य था।
2. नागरिकता अधिनियम, 1955 के अंतर्गत 'वंश द्वारा नागरिकता' (By Descent) के मूल प्रावधान के अनुसार 26 जनवरी 1950 के बाद या उसके पश्चात भारत से बाहर जन्मा व्यक्ति भारत का नागरिक तभी हो सकता था जब उसके जन्म के समय उसके पिता भारत सरकार के अधीन सेवा में हों, और नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 1992 द्वारा इस प्रावधान में संशोधन कर 'माता या पिता' दोनों में से किसी एक के भारतीय होने को आधार बनाया गया।
3. अनुच्छेद 11 के तहत संसद को नागरिकता के अर्जन और समाप्ति तथा नागरिकता से संबंधित अन्य सभी विषयों पर कानून बनाने की पूर्ण शक्ति प्राप्त है, और इसी शक्ति का प्रयोग करते हुए संसद द्वारा वर्ष 2019 में पारित नागरिकता (संशोधन) अधिनियम (CAA) के माध्यम से पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से 31 दिसंबर 2014 से पूर्व भारत आए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदायों के प्रवासियों को अवैध प्रवासी (Illegal Migrant) की परिभाषा से छूट प्रदान की गई है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के ऐतिहासिक विकास के अंतर्गत ब्रिटिश संसद द्वारा पारित विभिन्न अधिनियमों (Acts) के प्रावधानों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. रेगुलेटिंग एक्ट, 1773 के माध्यम से बंगाल के गवर्नर को 'बंगाल का गवर्नर-जनरल' पदनाम दिया गया तथा उसकी सहायता के लिए चार सदस्यीय कार्यकारी परिषद का गठन किया गया, और इसी अधिनियम के तहत वर्ष 1774 में कलकत्ता में एक उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) की स्थापना की गई जिसमें एक मुख्य न्यायाधीश और तीन अन्य न्यायाधीश शामिल थे।
2. पिट्स इंडिया एक्ट, 1784 द्वारा कंपनी के राजनीतिक और वाणिज्यिक कार्यों को पृथक् कर दिया गया, जिसके तहत 'बोर्ड ऑफ कंट्रोल' (Board of Control) का गठन किया गया जो कंपनी के राजनीतिक मामलों और ब्रिटिश नियंत्रण की देखरेख करता था, जबकि 'कोर्ट ऑफ डायरेक्टर' (Court of Directors) को वाणिज्यिक मामलों के प्रबंधन की जिम्मेदारी सौंपी गई।
3. चार्टर अधिनियम, 1833 ने भारत में केंद्रीय प्रशासन की नींव रखी, जिसके तहत बंगाल के गवर्नर-जनरल को 'भारत का गवर्नर-जनरल' बना दिया गया और देश की पहली बार ऐसी विधाई शक्ति का केंद्रीकरण किया गया जिसके द्वारा मद्रास और बॉम्बे के गवर्नरों की विधाई शक्तियों को पूरी तरह छीन लिया गया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के अंतर्गत उपराष्ट्रपति के पद, उनकी शक्तियों, निर्वाचन प्रक्रिया तथा प्रधानमंत्री और केंद्रीय मंत्रिपरिषद से संबंधित संवैधानिक प्रावधानों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 66 के अनुसार उपराष्ट्रपति का निर्वाचन संसद के दोनों सदनों (निर्वाचित और मनोनीत दोनों सदस्य) के सदस्यों से मिलकर बनने वाले निर्वाचक कॉलेज के सदस्यों द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत के द्वारा होता है, जिसमें राज्य विधानसभाओं के सदस्यों की कोई भूमिका नहीं होती है।
2. अनुच्छेद 75(5) के अनुसार कोई भी व्यक्ति जो संसद के किसी भी सदन का सदस्य नहीं है, प्रधानमंत्री या मंत्रिपरिषद का मंत्री नियुक्त किया जा सकता है, किंतु उसे इस पद पर बने रहने के लिए नियुक्ति की तिथि से छह मास के भीतर संसद के किसी न किसी सदन का सदस्य निर्वाचित होना अनिवार्य होता है, अन्यथा वह मंत्री पद पर नहीं रहेगा।
3. सर्वोच्च न्यायालय ने विभिन्न प्रकरणों में यह स्पष्ट किया है कि राष्ट्रपति या राज्यपाल द्वारा मंत्रिपरिषद की सलाह के बिना या मंत्रिपरिषद के बहुमत खो देने के पश्चात भी अपने विवेक से प्रधानमंत्री या मंत्रियों की नियुक्ति की जा सकती है, और मंत्रिपरिषद के सामूहिक उत्तरदायित्व के सिद्धांत के तहत लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पारित होने पर प्रधानमंत्री सहित संपूर्ण मंत्रिपरिषद को त्यागपत्र देना पड़ता है।
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भारतीय संविधान के अंतर्गत राष्ट्रपति की अध्यादेश निर्माण की शक्ति (Ordinance-making power) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 123 के अनुसार राष्ट्रपति को अध्यादेश प्रख्यापित करने की शक्ति तब प्राप्त होती है जब संसद के दोनों सदन सत्र में न हों, और राष्ट्रपति का यह समाधान हो जाता है कि ऐसी परिस्थितियाँ विद्यमान हैं जिनके कारण तुरंत कार्रवाई करना आवश्यक हो गया है।
2. राष्ट्रपति द्वारा प्रख्यापित अध्यादेश की संप्रभुता और प्रभाव वही होता है जो संसद द्वारा बनाए गए किसी अधिनियम का होता है, किंतु यह संसद के पुनर्समेकित होने के छह सप्ताह के भीतर या संसद के दोनों सदनों द्वारा अस्वीकृत किए जाने पर स्वतः प्रभावहीन हो जाता है, तथा इसकी अधिकतम संभावित अवधि संसद की पुनः बैठक होने के छह सप्ताह बाद तक ही हो सकती है।
3. सर्वोच्च न्यायालय ने 'कुप्पुस्वामी वाद' और 'डी.सी. वाधवा वाद' जैसे ऐतिहासिक निर्णयों में यह स्पष्ट रूप से प्रतिपादित किया है कि अध्यादेश निर्माण की शक्ति राष्ट्रपति की एक विवेककारी (Discretionary) शक्ति है, जिसकी न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) किसी भी परिस्थिति में न्यायालय द्वारा नहीं की जा सकती है, भले ही इसे दुर्भावनापूर्ण तरीके से प्रख्यापित किया गया हो।
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भारतीय संविधान के भाग-IV के अंतर्गत वर्णित 'राज्य के नीति निर्देशक तत्वों' (DPSP - अनुच्छेद 36-51) की प्रकृति, संशोधनों और न्यायिक व्याख्या के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 39(b) और 39(c) के अंतर्गत निहित नीति निर्देशक सिद्धांतों को प्रभावी बनाने के लिए संसद या राज्य विधानमंडलों द्वारा बनाई गई किसी विधि को इस आधार पर असंवैधानिक घोषित नहीं किया जा सकता कि वह अनुच्छेद 14 या अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों को छीनती या न्यून करती है, और यह संरक्षण मूल संविधान में ही निहित था जिसे बाद में 42वें संविधान संशोधन द्वारा विस्तारित किया गया था।
2. निर्देशक तत्वों को न्यायपालिका द्वारा अपरिवर्तनीय (Non-justiciable) घोषित किया गया है, किंतु सर्वोच्च न्यायालय ने अपने कई ऐतिहासिक निर्णयों (जैसे मिनर्वा मिल्स वाद, 1980) में यह स्पष्ट किया है कि मूल अधिकार और नीति निर्देशक तत्व एक-दूसरे के पूरक हैं और इनके बीच का संतुलन संविधान के 'मूल ढाँचे' (Basic Structure) का एक अनिवार्य हिस्सा है।
3. अनुच्छेद 48 के तहत राज्य कृषि और पशुपालन को आधुनिक और वैज्ञानिक प्रणालियों से संगठित करने के प्रयास करेगा, और विशेष रूप से गायों और बछड़ों तथा अन्य दुधारू और वाहक पशुओं की नस्लों के परीक्षण और सुधार के लिए तथा उनके वध का प्रतिषेध करने के लिए कदम उठाएगा, और यह एक समाजवादी विचारधारा पर आधारित नीति निर्देशक तत्व है।
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भारतीय संविधान के भाग I के अंतर्गत 'संघ एवं उसके राज्य क्षेत्र' (अनुच्छेद 1-4) और नए राज्यों के निर्माण या सीमा परिवर्तन की विधायी प्रक्रिया के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 2 के अंतर्गत संसद को यह शक्ति प्राप्त है कि वह संघ में नए राज्यों का प्रवेश या उनकी स्थापना ऐसे निबंधनों और शर्तों पर कर सके जो वह ठीक समझे, जबकि अनुच्छेद 3 के तहत संसद को मौजूदा राज्यों के क्षेत्रों, सीमाओं या नामों में परिवर्तन करने की शक्ति प्रदान की गई है।
2. अनुच्छेद 3 के तहत नए राज्यों के निर्माण या किसी राज्य के क्षेत्र, सीमा या नाम में परिवर्तन करने वाला कोई भी विधेयक संसद के किसी भी सदन में केवल तभी प्रस्तुत किया जा सकता है जब राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश प्राप्त हो, और राष्ट्रपति द्वारा ऐसा विधेयक संबंधित राज्य के विधानमंडल के पास उसकी राय जानने के लिए भेजा जाना संवैधानिक रूप से अनिवार्य है, भले ही राज्य विधानमंडल द्वारा दी गई राय को मानना संसद के लिए बाध्यकारी न हो।
3. अनुच्छेद 4 के स्पष्ट प्रावधान के अनुसार, अनुच्छेद 2 या अनुच्छेद 3 के तहत नए राज्यों के प्रवेश, स्थापना, या राज्यों के पुनर्गठन से संबंधित किए गए कानून संविधान के अनुच्छेद 368 के प्रयोजन के लिए 'संविधान संशोधन' माने जाएंगे, जिसके लिए संसद के विशेष बहुमत तथा आधे राज्यों के विधानमंडलों के अनुसमर्थन की अनिवार्य आवश्यकता होती है।
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