Indian Polity
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भारतीय संविधान के अंतर्गत राष्ट्रपति की अध्यादेश निर्माण की शक्ति (Ordinance-making power) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 123 के अनुसार राष्ट्रपति को अध्यादेश प्रख्यापित करने की शक्ति तब प्राप्त होती है जब संसद के दोनों सदन सत्र में न हों, और राष्ट्रपति का यह समाधान हो जाता है कि ऐसी परिस्थितियाँ विद्यमान हैं जिनके कारण तुरंत कार्रवाई करना आवश्यक हो गया है।
- 2. राष्ट्रपति द्वारा प्रख्यापित अध्यादेश की संप्रभुता और प्रभाव वही होता है जो संसद द्वारा बनाए गए किसी अधिनियम का होता है, किंतु यह संसद के पुनर्समेकित होने के छह सप्ताह के भीतर या संसद के दोनों सदनों द्वारा अस्वीकृत किए जाने पर स्वतः प्रभावहीन हो जाता है, तथा इसकी अधिकतम संभावित अवधि संसद की पुनः बैठक होने के छह सप्ताह बाद तक ही हो सकती है।
- 3. सर्वोच्च न्यायालय ने 'कुप्पुस्वामी वाद' और 'डी.सी. वाधवा वाद' जैसे ऐतिहासिक निर्णयों में यह स्पष्ट रूप से प्रतिपादित किया है कि अध्यादेश निर्माण की शक्ति राष्ट्रपति की एक विवेककारी (Discretionary) शक्ति है, जिसकी न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) किसी भी परिस्थिति में न्यायालय द्वारा नहीं की जा सकती है, भले ही इसे दुर्भावनापूर्ण तरीके से प्रख्यापित किया गया हो।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 123 के अनुसार, राष्ट्रपति को अध्यादेश जारी करने की शक्ति तब मिलती है जब संसद के दोनों सदन सत्र में न हों और राष्ट्रपति को ऐसा लगे कि तुरंत कार्रवाई करना आवश्यक है। कथन 2 सही है: अध्यादेश का प्रभाव संसद के कानून के समान होता है और यह संसद की पुनः बैठक के छह सप्ताह के भीतर या दोनों सदनों द्वारा अस्वीकृत किए जाने पर समाप्त हो जाता है। कथन 3 गलत है: सर्वोच्च न्यायालय ने 'डी.सी. वाधवा वाद (1987)' में यह स्पष्ट किया था कि अध्यादेश निर्माण की शक्ति राष्ट्रपति की पूर्णतः असंदिग्ध शक्ति नहीं है, बल्कि मंत्रिपरिषद की सलाह पर आधारित होती है, और दुर्भावनापूर्ण रूप से बार-बार अध्यादेश जारी करने के मामलों में इसकी न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) की जा सकती है। इस विषय के बारे में अधिक जानने के लिए आप भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था के विस्तृत नोट्स पढ़ सकते हैं।
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भारतीय संविधान के अंतर्गत उपराष्ट्रपति के पद, उनकी शक्तियों, निर्वाचन…
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भारतीय संविधान के अंतर्गत उपराष्ट्रपति के निर्वाचन, प्रधानमंत्री के उत्तरदायित्व तथा केंद्रीय मंत्रिपरिषद के कामकाज से संबंधित संवैधानिक प्रावधानों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 66 के अनुसार उपराष्ट्रपति के निर्वाचन के लिए गठित निर्वाचक मंडल (Electoral College) में संसद के दोनों सदनों के सभी निर्वाचित और मनोनीत सदस्य शामिल होते हैं, तथा इसमें राज्यों की विधानसभाओं या विधान परिषदों के सदस्यों को कोई स्थान नहीं दिया जाता है।
2. अनुच्छेद 75(3) के प्रावधान के अनुसार केंद्रीय मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होती है, जिसका अर्थ यह है कि यदि लोकसभा में मंत्रिपरिषद के विरुद्ध कोई अविश्वास प्रस्ताव पारित हो जाता है, तो प्रधानमंत्री सहित संपूर्ण मंत्रिपरिषद को त्यागपत्र देना पड़ता है, भले ही नीतिगत मामलों पर राज्यसभा का समर्थन प्राप्त हो।
3. अनुच्छेद 78 के अंतर्गत प्रधानमंत्री का यह संवैधानिक कर्तव्य है कि वह संघ के प्रशासन और विधान विषयक प्रस्तावों से संबंधित मंत्रिपरिषद के सभी निर्णयों को राष्ट्रपति को संसूचित करे, किंतु यदि राष्ट्रपति किसी ऐसे विषय पर जानकारी मांगते हैं जिस पर किसी मंत्री ने निर्णय ले लिया है किंतु मंत्रिपरिषद ने विचार नहीं किया है, तो प्रधानमंत्री ऐसी सूचना देने के लिए कानूनी रूप से बाध्य नहीं होते हैं।
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भारतीय निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) और देश में चुनाव सुधारों के संवैधानिक तथा विधिक प्रावधानों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 324 के अंतर्गत निर्वाचन आयोग के मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, तथा संविधान में यह अनिवार्य रूप से उपबंधित किया गया है कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त को उसके पद से हटाने की प्रक्रिया सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान ही होगी, जबकि अन्य निर्वाचन आयुक्तों को मुख्य निर्वाचन आयुक्त की लिखित सिफारिश के बिना किसी भी परिस्थिति में नहीं हटाया जा सकता है।
2. जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 77 के अंतर्गत किसी राजनीतिक दल द्वारा अपने स्टार प्रचारकों (Star Campaigners) की सूची निर्वाचन आयोग और संबंधित मुख्य निर्वाचन अधिकारी को चुनाव प्रचार के चरण शुरू होने से कम से कम 48 घंटे पूर्व सौंपी जानी चाहिए, और इन स्टार प्रचारकों की यात्रा पर होने वाला व्यय संबंधित निर्वाचन क्षेत्र के उम्मीदवार के चुनावी खर्च की सीमा में शामिल नहीं किया जाता है।
3. निर्वाचन आयोग द्वारा चुनावों में काले धन के प्रभाव को नियंत्रित करने और चुनावी वित्तपोषण (Electoral Funding) में पारदर्शिता लाने के लिए वर्ष 2017 में राजनीतिक दलों को मिलने वाले अज्ञात चंदे की सीमा को 20,000 रुपये से घटाकर 2,000 रुपये प्रति व्यक्ति कर दिया गया था, जिसे आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 13A में संशोधन के माध्यम से कानूनी जामा पहनाया गया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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राज्य विधानमंडल के दोनों सदनों (विधानसभा और विधान परिषद) की शक्तियों, विधाई प्रक्रियाओं तथा उनके गठन के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 169 के अंतर्गत संसद किसी राज्य में विधान परिषद के सृजन या उत्सादन के लिए विधि बना सकती है, बशर्ते संबंधित राज्य की विधानसभा ने कुल सदस्य संख्या के बहुमत तथा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत से इस आशय का एक संकल्प पारित किया हो।
2. धन विधेयक (Money Bill) को केवल राज्य की विधानसभा में ही पुनः स्थापित किया जा सकता है, विधान परिषद में नहीं; और यदि विधान परिषद किसी धन विधेयक को अपने पास बिना किसी संशोधन के अधिकतम 14 दिनों तक रोक सकती है या उस पर अपनी संस्तुतियाँ दे सकती है, जिन्हें विधानसभा द्वारा मानना या न मानना पूरी तरह अनिवार्य होता है।
3. साधारण विधेयक के मामले में राज्य विधानमंडल की द्विसदनीय व्यवस्था में विधानसभा की स्थिति अत्यंत प्रभावी होती है, क्योंकि विधान परिषद किसी साधारण विधेयक को प्रथम बार में अधिकतम चार महीने (प्रथम बार 3 महीने और विधान परिषद द्वारा लौटाए जाने पर पुनः 1 महीने) तक ही रोक सकती है, जिसके पश्चात विधानसभा द्वारा पुनः पारित कर दिए जाने पर विधेयक दोनों सदनों से पारित मान लिया जाता है, भले ही विधान परिषद उसे अस्वीकार ही क्यों न कर दे।
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भारतीय संविधान के 73वें संशोधन अधिनियम, 1992 के अंतर्गत पंचायती राज संस्थाओं (PRIs) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 243-G के अंतर्गत पंचायतों को आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय के लिए योजनाएं तैयार करने तथा उन्हें लागू करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है, जिसके तहत ग्यारहवीं अनुसूची में कुल 29 कार्यात्मक विषयों को शामिल किया गया है, और इन विषयों को पंचायतों को हस्तांतरित करना राज्यों के लिए संवैधानिक रूप से अनिवार्य है।
2. अनुच्छेद 243-H के अनुसार किसी राज्य का विधानमंडल विधि द्वारा पंचायतों को ऐसे कर, शुल्क, टोल और फीस आरोपित करने, वसूलने और विनियमित करने के लिए अधिकृत कर सकता है, तथा इसके साथ ही राज्य की संचित निधि से पंचायतों को सहायता-अनुदान (Grants-in-aid) दिए जाने का भी प्रावधान कर सकता है।
3. पंचायती राज संस्थाओं के चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण के लिए प्रत्येक राज्य में एक स्वतंत्र 'राज्य निर्वाचन आयोग' (State Election Commission) के गठन का उपबंध अनुच्छेद 243-K के तहत किया गया है, जिसके राज्य निर्वाचन आयुक्त को उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया और आधारों के अलावा किसी अन्य तरीके से उसके पद से नहीं हटाया जा सकता है।
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भारतीय संविधान के भाग-IV के अंतर्गत वर्णित 'राज्य के नीति निर्देशक तत्वों' (DPSP - अनुच्छेद 36-51) की प्रकृति, संशोधनों और न्यायिक व्याख्या के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 39(b) और 39(c) के अंतर्गत निहित नीति निर्देशक सिद्धांतों को प्रभावी बनाने के लिए संसद या राज्य विधानमंडलों द्वारा बनाई गई किसी विधि को इस आधार पर असंवैधानिक घोषित नहीं किया जा सकता कि वह अनुच्छेद 14 या अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों को छीनती या न्यून करती है, और यह संरक्षण मूल संविधान में ही निहित था जिसे बाद में 42वें संविधान संशोधन द्वारा विस्तारित किया गया था।
2. निर्देशक तत्वों को न्यायपालिका द्वारा अपरिवर्तनीय (Non-justiciable) घोषित किया गया है, किंतु सर्वोच्च न्यायालय ने अपने कई ऐतिहासिक निर्णयों (जैसे मिनर्वा मिल्स वाद, 1980) में यह स्पष्ट किया है कि मूल अधिकार और नीति निर्देशक तत्व एक-दूसरे के पूरक हैं और इनके बीच का संतुलन संविधान के 'मूल ढाँचे' (Basic Structure) का एक अनिवार्य हिस्सा है।
3. अनुच्छेद 48 के तहत राज्य कृषि और पशुपालन को आधुनिक और वैज्ञानिक प्रणालियों से संगठित करने के प्रयास करेगा, और विशेष रूप से गायों और बछड़ों तथा अन्य दुधारू और वाहक पशुओं की नस्लों के परीक्षण और सुधार के लिए तथा उनके वध का प्रतिषेध करने के लिए कदम उठाएगा, और यह एक समाजवादी विचारधारा पर आधारित नीति निर्देशक तत्व है।
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भारतीय संविधान के भाग I के अंतर्गत 'संघ एवं उसके राज्य क्षेत्र' (अनुच्छेद 1-4) और नए राज्यों के निर्माण या सीमा परिवर्तन की विधायी प्रक्रिया के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 2 के अंतर्गत संसद को यह शक्ति प्राप्त है कि वह संघ में नए राज्यों का प्रवेश या उनकी स्थापना ऐसे निबंधनों और शर्तों पर कर सके जो वह ठीक समझे, जबकि अनुच्छेद 3 के तहत संसद को मौजूदा राज्यों के क्षेत्रों, सीमाओं या नामों में परिवर्तन करने की शक्ति प्रदान की गई है।
2. अनुच्छेद 3 के तहत नए राज्यों के निर्माण या किसी राज्य के क्षेत्र, सीमा या नाम में परिवर्तन करने वाला कोई भी विधेयक संसद के किसी भी सदन में केवल तभी प्रस्तुत किया जा सकता है जब राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश प्राप्त हो, और राष्ट्रपति द्वारा ऐसा विधेयक संबंधित राज्य के विधानमंडल के पास उसकी राय जानने के लिए भेजा जाना संवैधानिक रूप से अनिवार्य है, भले ही राज्य विधानमंडल द्वारा दी गई राय को मानना संसद के लिए बाध्यकारी न हो।
3. अनुच्छेद 4 के स्पष्ट प्रावधान के अनुसार, अनुच्छेद 2 या अनुच्छेद 3 के तहत नए राज्यों के प्रवेश, स्थापना, या राज्यों के पुनर्गठन से संबंधित किए गए कानून संविधान के अनुच्छेद 368 के प्रयोजन के लिए 'संविधान संशोधन' माने जाएंगे, जिसके लिए संसद के विशेष बहुमत तथा आधे राज्यों के विधानमंडलों के अनुसमर्थन की अनिवार्य आवश्यकता होती है।
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