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Indian Polity
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भारतीय संविधान के अंतर्गत राज्य विधानमंडलों की विधाई शक्तियों, धन विधेयकों (Money Bills) की प्रक्रिया तथा विधानसभा और विधान परिषद के अंतर्संबंधों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 197 के अनुसार, यदि विधानसभा द्वारा कोई साधारण विधेयक पारित करके विधान परिषद को भेजा जाता है, और विधान परिषद उस विधेयक को बिना पारित किए तीन महीने तक रोक लेती है या उसमें ऐसे संशोधन करती है जिनसे विधानसभा सहमत नहीं है, तो विधानसभा उस विधेयक को पुनः पारित कर सकती है और विधान परिषद के पास अधिकतम चार महीने (प्रथम बार के 3 महीने और द्वितीय बार के 1 महीने को मिलाकर) का कुल विलंबकारी अधिकार होता है।
- 2. धन विधेयक (Money Bill) के संबंध में संविधान के अनुच्छेद 198 के तहत यह प्रावधान किया गया है कि धन विधेयक केवल विधानसभा में ही पुनरस्थापित किया जा सकता है, विधान परिषद में नहीं; तथा विधान परिषद को किसी धन विधेयक को प्राप्ति की तिथि से अधिकतम चौदह दिनों की अवधि के भीतर अपनी सिफारिशों के साथ या बिना सिफारिश के विधानसभा को लौटाना होता है, और यदि वह ऐसा नहीं करती है, तो उस अवधि की समाप्ति पर वह विधेयक दोनों सदनों द्वारा उस रूप में पारित समझा जाता है जिस रूप में वह विधानसभा द्वारा पारित किया गया था।
- 3. विधान परिषद के पास किसी साधारण विधेयक पर विचार करने के दौरान उसे अस्वीकार करने की पूर्ण शक्ति होती है, और दोनों सदनों के बीच गतिरोध (Deadlock) की स्थिति को सुलझाने के लिए संविधान के अनुच्छेद 197 के अंतर्गत संसद के दोनों सदनों की तर्ज पर राज्य विधानमंडल के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक (Joint Sitting) बुलाए जाने का स्पष्ट संवैधानिक प्रावधान किया गया है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 असत्य है क्योंकि साधारण विधेयक के मामले में विधान परिषद के पास प्रथम बार में 3 महीने और द्वितीय बार में 1 महीने यानी कुल मिलाकर अधिकतम 4 महीने का विलंबकारी (Delaying) अधिकार नहीं होता है। विधान परिषद किसी साधारण विधेयक को प्रथम बार में अधिकतम 3 महीने तक और विधानसभा द्वारा दोबारा पारित करने पर अधिकतम 1 महीने तक रोक सकती है, यानी कुल मिलाकर अधिकतम 3 महीने (प्रथम बार 3 महीने + द्वितीय बार 1 महीने नहीं, बल्कि विधानसभा द्वारा पुनः पारित किए जाने पर उसे 1 माह का अतिरिक्त समय मिलता है, जिससे कुल अवधि 4 महीने नहीं बल्कि पहली बार 3 महीने और दूसरी बार 1 महीना यानी कुल मिलाकर विधान परिषद कुल 4 महीने तक विचार रोक सकती है, यह कथन तकनीकी रूप से सही है; किंतु रुकिए - विधान परिषद प्रथम बार में विधेयक को 3 महीने तक रोक सकती है और दूसरी बार में 1 महीने तक, यानी कुल मिलाकर वह 4 महीने तक विलंब कर सकती है। अतः कथन 1 सही है? नहीं, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 197 के अनुसार विधान परिषद किसी साधारण विधेयक को प्रथम बार में 3 महीने और दूसरी बार में 1 महीने तक रोक सकती है, कुल मिलाकर 4 महीने का समय मिलता है। आइए तीसरे कथन को देखते हैं)। कथन 3 असत्य है क्योंकि भारतीय संविधान में राज्य विधानमंडल के दोनों सदनों (विधानसभा और विधान परिषद) के बीच गतिरोध को दूर करने के लिए **संयुक्त बैठक (Joint Sitting)** का **कोई प्रावधान नहीं है**। संसद के संदर्भ में अनुच्छेद 108 के तहत संयुक्त बैठक बुलाई जाती है, लेकिन राज्य स्तर पर विधानसभा की स्थिति सर्वोपरि होती है और विधान परिषद केवल एक उच्च सदन के रूप में विलंबकारी भूमिका निभाती है। कथन 2 बिल्कुल सही है, क्योंकि धन विधेयक केवल विधानसभा में पेश होता है और विधान परिषद इसे केवल 14 दिन रोक सकती है। अधिक जानकारी के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पर विस्तृत अध्ययन करें।
Related Questions
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भारतीय संविधान के अंतर्गत राज्य के नीति निर्देशक तत्वों (DPSP - भाग IV, अनुच्छेद 36-51) के स्वरूप, न्यायोचितता और उनके क्रियान्वयन के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 37 के अनुसार नीति निर्देशक तत्व देश के शासन में मूलभूत हैं और विधि बनाने में इन तत्वों को लागू करना राज्य का कर्तव्य होगा, किंतु ये तत्व किसी भी न्यायालय द्वारा न्यायोचित (Justiciable) नहीं हैं, अर्थात इन्हें किसी न्यायालय द्वारा बाध्यकारी रूप से प्रवर्तित नहीं कराया जा सकता है।
2. सर्वोच्च न्यायालय ने 'मिनर्वा मिल्स लिमिटेड बनाम भारत संघ' (1980) वाद में यह स्पष्ट किया था कि भारतीय संविधान की नींव मूल अधिकार (Fundamental Rights) और नीति निर्देशक तत्वों (DPSPs) के बीच संतुलन के संतुलन चक्र पर टिकी है, और इनमें से किसी एक को दूसरे पर अनन्य प्राथमिकता नहीं दी जा सकती।
3. संविधान के अनुच्छेद 39(b) और 39(c) के अंतर्गत निहित समाजवादी सिद्धांतों को प्रभावी बनाने के लिए संसद द्वारा बनाए गए कानूनों को यदि अनुच्छेद 14 या अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों का उल्लंघन करने वाला पाया जाता है, तो अनुच्छेद 31-C के अनुसार उन्हें इस आधार पर अमान्य घोषित नहीं किया जा सकता है कि वे उक्त मूल अधिकारों का अतिक्रमण करते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के अंतर्गत राज्यों के उच्च न्यायालयों की स्वतंत्रता, प्रशासनिक नियंत्रण तथा अधीनस्थ न्यायपालिका के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 227 के अनुसार प्रत्येक उच्च न्यायालय को अपने प्रादेशिक क्षेत्राधिकार के भीतर सभी न्यायालयों और अधिकरणों (Tribunals) के अधीक्षण की व्यापक शक्ति प्राप्त है, और यह अधीक्षण शक्ति केवल प्रशासनिक एवं वित्तीय मामलों तक सीमित है, इसका विस्तार न्यायिक निर्णयों या न्यायिक समीक्षा के दायरे तक नहीं होता है।
2. संविधान के अनुच्छेद 233 के प्रावधानों के तहत किसी राज्य में जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति, पोस्टिंग और पदोन्नति संबंधित राज्य के राज्यपाल द्वारा राज्य के उच्च न्यायालय से परामर्श करने के पश्चात ही की जाती है, तथा इस प्रक्रिया में उच्च न्यायालय की संस्तुति राज्यपाल के लिए पूर्णतः बाध्यकारी होती है।
3. अनुच्छेद 235 के अंतर्गत राज्य के अधीनस्थ न्यायालयों पर नियंत्रण, जिसमें जिला न्यायालयों और उनके अधीनस्थ न्यायपालिका के अधिकारियों की पदस्थापना, प्रमोशन, छुट्टी और अनुशासन से संबंधित नियंत्रण शामिल है, पूरी तरह से संबंधित राज्य के उच्च न्यायालय में निहित होता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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पंचायत राज व्यवस्था किस संशोधन से जुड़ी है?
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भारतीय उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) की स्वतंत्रता, अधिकार क्षेत्र और संविधान की व्याख्या करने की शक्ति के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 141 के अनुसार उच्चतम न्यायालय द्वारा घोषित किया गया विधि भारत के राज्यक्षेत्र के भीतर सभी न्यायालयों पर आबद्धकर (Binding) होता है, किंतु स्वयं उच्चतम न्यायालय अपने पूर्ववर्ती निर्णयों या आदेशों से कानूनी रूप से पूरी तरह बंधा हुआ होता है और वह अपने किसी भी पुराने निर्णय को पलटने या उसमें संशोधन करने की शक्ति नहीं रखता है।
2. संविधान के अनुच्छेद 145 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय को भारत के राष्ट्रपति के अनुमोदन से न्यायालय की पद्धति और प्रक्रिया को विनियमित करने के लिए नियम बनाने की शक्ति प्राप्त है, बशर्ते कि संविधान के किसी उपबंध के अधीन संसद द्वारा बनाई गई कोई विधि इसके प्रतिकूल न हो।
3. उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों के आचरण की संसद में चर्चा पर संविधान के अनुच्छेद 121 के तहत पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया है, सिवाय उस स्थिति के जब न्यायाधीश को हटाने के लिए महाभियोग (Impeachment) प्रस्ताव पर संसद में विचार किया जा रहा हो।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के भाग II के अंतर्गत नागरिकता के प्रावधानों और नागरिकता (संशोधन) अधिनियमों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 9 के स्पष्ट प्रावधान के अनुसार, यदि कोई भारतीय नागरिक स्वेच्छा से किसी विदेशी राज्य की नागरिकता अर्जित कर लेता है, तो उसकी भारतीय नागरिकता स्वतः समाप्त (Termination) हो जाएगी, और इसके लिए संसद द्वारा अलग से किसी विधि के निर्माण की आवश्यकता नहीं होती है।
2. नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2019 (CAA) के तहत पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से 31 दिसंबर 2014 से पहले भारत आए प्रवासियों को भारतीय नागरिकता प्रदान करने का विशेष प्रावधान किया गया है, और इस अधिनियम के अंतर्गत देशीयकरण (Naturalisation) द्वारा नागरिकता प्राप्त करने के लिए आवश्यक निवास अवधि की शर्त को उन छह समुदायों (हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई) के लिए 11 वर्ष से घटाकर 5 वर्ष कर दिया गया है।
3. अनुच्छेद 10 के अंतर्गत यह उपबंध किया गया है कि संसद द्वारा बनाई जाने वाली किसी भी नागरिकता कानून के बावजूद, प्रत्येक व्यक्ति जो भाग II के प्रावधानों के तहत नागरिक है, संसद की विधि के उपबंधों के अधीन रहते हुए नागरिक बना रहेगा (Continuity of rights of citizenship), जिसका तात्पर्य यह है कि संसद किसी भी नागरिक को मनमाने ढंग से नागरिकता के अधिकारों से वंचित नहीं कर सकती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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