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Indian Polity
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भारतीय उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) की स्वतंत्रता, अधिकार क्षेत्र और संविधान की व्याख्या करने की शक्ति के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 141 के अनुसार उच्चतम न्यायालय द्वारा घोषित किया गया विधि भारत के राज्यक्षेत्र के भीतर सभी न्यायालयों पर आबद्धकर (Binding) होता है, किंतु स्वयं उच्चतम न्यायालय अपने पूर्ववर्ती निर्णयों या आदेशों से कानूनी रूप से पूरी तरह बंधा हुआ होता है और वह अपने किसी भी पुराने निर्णय को पलटने या उसमें संशोधन करने की शक्ति नहीं रखता है।
- 2. संविधान के अनुच्छेद 145 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय को भारत के राष्ट्रपति के अनुमोदन से न्यायालय की पद्धति और प्रक्रिया को विनियमित करने के लिए नियम बनाने की शक्ति प्राप्त है, बशर्ते कि संविधान के किसी उपबंध के अधीन संसद द्वारा बनाई गई कोई विधि इसके प्रतिकूल न हो।
- 3. उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों के आचरण की संसद में चर्चा पर संविधान के अनुच्छेद 121 के तहत पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया है, सिवाय उस स्थिति के जब न्यायाधीश को हटाने के लिए महाभियोग (Impeachment) प्रस्ताव पर संसद में विचार किया जा रहा हो।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 गलत है क्योंकि उच्चतम न्यायालय अपने पूर्ववर्ती निर्णयों या आदेशों से पूर्णतः बंधा हुआ नहीं है। 'तुलसीदास बनाम राज्य' तथा अन्य कई ऐतिहासिक मामलों में उच्चतम न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि वह अपने पूर्व के गलत या न्यायसंगत न प्रतीत होने वाले निर्णयों पर पुनर्विचार कर सकता है और उन्हें पलट सकता है। कथन 2 सही है, संविधान के अनुच्छेद 145 के अनुसार उच्चतम न्यायालय को राष्ट्रपति के अनुमोदन से न्यायालय की प्रक्रिया और नियमों को विनियमित करने की शक्ति प्राप्त है। कथन 3 सही है, अनुच्छेद 121 के तहत उच्चतम न्यायालय या किसी उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के कर्तव्यों के निर्वहन में उनके आचरण के संबंध में संसद में चर्चा पर प्रतिबंध है, जब तक कि उन्हें हटाने के लिए संविधान के अनुच्छेद 124(4) के तहत प्रस्ताव पर विचार न किया जा रहा हो। अधिक विस्तृत अध्ययन के लिए आप भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पोर्टल का अवलोकन कर सकते हैं।
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भारतीय संविधान में मौलिक अधिकारों की अवधारणा किस देश के संविधान से ली गई है?
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भारतीय संविधान के भाग-IVक के अंतर्गत समाविष्ट 'मूल कर्तव्यों' (Fundamental Duties) और स्वर्ण सिंह समिति की सिफारिशों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मूल संविधान में मूल कर्तव्यों का कोई प्रावधान नहीं था, इन्हें 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा सरदार स्वर्ण सिंह समिति की सिफारिश पर जोड़ा गया था, किंतु इस समिति ने नागरिकों को कर अदायगी (payment of taxes) को भी एक मूल कर्तव्य के रूप में शामिल करने की सिफारिश की थी जिसे संसद ने स्वीकार नहीं किया था।
2. संविधान के अनुच्छेद 51क के तहत वर्तमान में कुल 11 मूल कर्तव्य हैं, जिनमें से 11वें मूल कर्तव्य के रूप में छह से चौदह वर्ष की आयु के बच्चों को शिक्षा के अवसर प्रदान करने का दायित्व उनके माता-पिता या संरक्षक का होगा, जिसे 86वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2002 द्वारा अंतःस्थापित किया गया था।
3. मूल कर्तव्यों के उल्लंघन पर सीधे दंड देने या उन्हें लागू कराने के लिए संविधान स्वयं कोई प्रत्यक्ष दंडात्मक उपबंध नहीं करता है, किंतु संसद या राज्य विधानमंडल विधि द्वारा इसके प्रवर्तन के लिए उपयुक्त दंड या प्रतिबंध का प्रावधान कर सकते हैं, तथा न्यायमूर्ति जे.एस. वर्मा समिति (1999) ने कुछ मूल कर्तव्यों के कानूनी प्रावधानों और उनके कार्यान्वयन से संबंधित महत्वपूर्ण सुझाव दिए थे।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के भाग IV में वर्णित राज्य के नीति निर्देशक तत्वों (DPSP - अनुच्छेद 36-51) के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 40 के तहत राज्य, ग्राम पंचायतों के संगठन के लिए कदम उठाएगा और उन्हें ऐसी शक्तियां प्रदान करेगा जो उन्हें स्वायत्त शासन की इकाइयों के रूप में कार्य करने योग्य बनाने के लिए आवश्यक हों, तथा यह नीति निर्देशक तत्व प्रकृति से न्यायोचित (Justiciable) है, जिससे नागरिक इसके क्रियान्वयन के लिए सीधे न्यायालय की शरण ले सकते हैं।
2. अनुच्छेद 45 के मूल पाठ में यह प्रावधान था कि राज्य, इस संविधान के प्रारंभ होने से दस वर्ष की अवधि के भीतर, सभी बालकों के लिए चौदह वर्ष की आयु पूरी होने तक निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा देने के लिए प्रयास करेगा, जिसे बाद में 86वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2002 द्वारा संशोधित कर प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा का प्रावधान बनाया गया।
3. संविधान के अनुच्छेद 51 के अनुसार राज्य, अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की अभिवृद्धि करने, राष्ट्रों के बीच न्यायसंगत और सम्मानजनक संबंधों को बनाए रखने, और अंतर्राष्ट्रीय विवादों के मध्यस्थता द्वारा निपटारे के लिए प्रोत्साहन देने का प्रयास करेगा।
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राज्य विधानमंडल के अंतर्गत विधानसभा और विधान परिषद की विधाई शक्तियों तथा उनकी आपसी अंतःक्रियाओं के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 197 के अनुसार यदि विधान परिषद किसी सामान्य विधेयक को पारित करने से अस्वीकार कर देती है या उसमें ऐसे संशोधन करती है जिनसे विधानसभा सहमत नहीं है, तो विधानसभा द्वारा दोबारा पारित किए जाने पर भी विधान परिषद उसे अधिकतम चार महीने तक ही रोक सकती है (प्रथम बार तीन माह और पुनरीक्षण के पश्चात एक माह)।
2. धन विधेयक (Money Bill) को केवल विधानसभा में ही पुनः स्थापित किया जा सकता है, और यदि विधानसभा द्वारा पारित धन विधेयक विधान परिषद को भेजा जाता है, तो विधान परिषद के पास न तो उसे अस्वीकार करने की शक्ति होती है और न ही उसमें संशोधन करने की; वह इसे अधिकतम चौदह दिनों की अवधि तक ही रोक सकती है।
3. राज्य के वार्षिक वित्तीय विवरण (बजट) पर राज्य विधानमंडल के दोनों सदनों में सामान्य चर्चा होती है, किंतु अनुदान की मांगों पर मतदान (Voting on Demands for Grants) केवल विधानसभा के अधिकार क्षेत्र में आता है, विधान परिषद को अनुदान मांगों पर मतदान करने का कोई संवैधानिक अधिकार प्राप्त नहीं है।
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भारतीय संविधान के निर्माण और संविधान सभा की कार्यप्रणाली के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. कैबिनेट मिशन योजना (1946) के प्रावधानों के तहत संविधान सभा के लिए कुल 389 सीटें निर्धारित की गई थीं, जिनमें से ब्रिटिश प्रांतों को 292 सीटें, मुख्य आयुक्तों के 4 क्षेत्रों (दिल्ली, अजमेर-मारवाड़, कुर्ग और ब्रिटिश बलूचिस्तान) को 4 सीटें तथा देशी रियाساतों को 93 सीटें आवंटित की गईं, और देशी रियासतों के इन प्रतिनिधियों का चयन रियासतों के शासकों द्वारा किया जाना था, न कि प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा।
2. संविधान सभा की प्रथम बैठक 9 दिसंबर 1946 को हुई थी, जिसमें मुस्लिम लीग ने इस बैठक का पूर्ण बहिष्कार किया था, और इस बैठक में फ्रांसिसी प्रथा का अनुसरण करते हुए सभा के सबसे वरिष्ठ सदस्य डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा को अस्थायी अध्यक्ष चुना गया था, जबकि डॉ. राजेंद्र प्रसाद को 11 दिसंबर 1946 को सभा का स्थायी अध्यक्ष चुना गया था।
3. संविधान सभा द्वारा संविधान के निर्माण कार्यों को सुचारू रूप से चलाने के लिए कई समितियों का गठन किया गया था, जिनमें संघ शक्ति समिति के अध्यक्ष पंडित जवाहरलाल नेहरू, प्रांतीय संविधान समिति के अध्यक्ष सरदार वल्लभभाई पटेल, और प्रारूप समिति (Drafting Committee) के अध्यक्ष डॉ. बी.आर. अंबेडकर थे।
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