Indian Polity
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भारतीय संविधान के प्रथम भाग के अंतर्गत 'संघ एवं उसके राज्य क्षेत्र' (अनुच्छेद 1-4) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 2 के अंतर्गत संसद को विधि द्वारा ऐसे निबंधनों और शर्तों पर, जो वह ठीक समझे, संघ में नए राज्यों के प्रवेश या उनकी स्थापना करने की शक्ति प्राप्त है, जबकि अनुच्छेद 3 के तहत संसद को किसी राज्य के क्षेत्र में परिवर्तन करने अथवा नए राज्य के निर्माण की शक्ति दी गई है।
- 2. अनुच्छेद 3 के परंतुक के अनुसार, किसी राज्य के क्षेत्र, सीमा या नाम को प्रभावित करने वाले किसी भी विधेयक को राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति के बिना संसद के किसी भी सदन में पुनरस्थापित नहीं किया जा सकता, तथा राष्ट्रपति द्वारा ऐसा विधेयक संबंधित राज्य के विधानमंडल के पास उसके विचार भेजने पर, राज्य विधानमंडल द्वारा तय की गई समयावधि का राष्ट्रपति के लिए बाध्यकारी होना अनिवार्य है।
- 3. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 'बेरूबारी यूनियन वाद' (1960) में दिए गए निर्णय के पश्चात, भारतीय संघ के किसी भू-भाग को किसी अन्य देश को सौंपने (Cession of territory to a foreign country) के लिए संविधान के अनुच्छेद 3 के अंतर्गत केवल साधारण बहुमत से विधायी प्रक्रिया अपनाई जा सकती है, जिसके लिए संविधान संशोधन की कोई आवश्यकता नहीं होती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: संविधान के अनुच्छेद 2 के अनुसार संसद विधि द्वारा ऐसे निबंधनों और शर्तों पर, जो वह ठीक समझे, संघ में नए राज्यों का प्रवेश या उनकी स्थापना कर सकती है। वहीं अनुच्छेद 3 नए राज्यों के निर्माण और वर्तमान राज्यों के क्षेत्रों, सीमाओं या नामों में परिवर्तन से संबंधित है। कथन 2 गलत है: अनुच्छेद 3 के परंतुक के अनुसार राष्ट्रपति द्वारा संबंधित राज्य के विधानमंडल के पास विधेयक भेजा जाता है, किंतु राज्य विधानमंडल द्वारा व्यक्त किया गया मत या विचार राष्ट्रपति या संसद के लिए **बाध्यकारी नहीं** होता है। संसद उस पर विचार करने के लिए स्वतंत्र है। कथन 3 गलत है: 'बेरूबारी यूनियन वाद' (1960) में उच्चतम न्यायालय ने यह स्पष्ट किया था कि भारतीय भू-भाग को किसी अन्य देश को सौंपने के लिए अनुच्छेद 3 के तहत साधारण बहुमत से काम नहीं चलाया जा सकता, बल्कि इसके लिए संविधान के **अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संविधान संशोधन अधिनियम** पारित करना अनिवार्य होता है (यद्यपि सीमा निर्धारण विवादों के लिए इसकी आवश्यकता नहीं होती)। अधिक जानकारी के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पोर्टल पर विजिट करें।
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भारत के महान्यायवादी (Attorney General) और नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) के…
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भारतीय संविधान की अनुसूचियों, राजभाषा और राजनैतिक दलों से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान की आठवीं अनुसूची में मूल रूप से 14 भाषाएँ थीं, जिन्हें बाद में विभिन्न संवैधानिक संशोधनों (जैसे 21वें, 71वें और 92वें संशोधन) के माध्यम से बढ़ाकर वर्तमान में 22 कर दिया गया है, किंतु इस अनुसूची में 'अंग्रेज़ी' और 'राजस्थानी' भाषाओं को अभी तक आधिकारिक रूप से शामिल नहीं किया गया है।
2. संविधान के भाग XVII के अंतर्गत अनुच्छेद 343 से 351 तक संघ की राजभाषा से संबंधित उपबंध किए गए हैं, जिसके तहत अनुच्छेद 351 में यह निर्देश दिया गया है कि संघ का यह कर्तव्य होगा कि वह हिंदी भाषा का प्रसार बढ़ाए, उसका विकास करे ताकि वह भारत की सामासिक संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके और उसके रूप में मुख्य रूप से संस्कृत के साथ-साथ देश की अन्य भाषाओं की शब्दावली को भी आत्मसात करे।
3. वर्ष 1985 के 52वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा संविधान में दसवीं अनुसूची जोड़ी गई, जिसके तहत दलबदल के आधार पर संसद और राज्य विधानमंडलों के सदस्यों की निर्हता (Disqualification) से संबंधित उपबंध किए गए हैं, और इस अनुसूची के अंतर्गत दलबदल से जुड़े किसी विवाद पर अंतिम निर्णय लेने की शक्ति संबंधित सदन के पीठासीन अधिकारी (सभापति या अध्यक्ष) के पास होती है, जिसका न्यायिक पुनरावलोकन (Judicial Review) किसी भी परिस्थिति में नहीं किया जा सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के भाग II के अंतर्गत 'नागरिकता' (अनुच्छेद 5-11) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 9 के स्पष्ट प्रावधान के अनुसार, यदि कोई भारतीय नागरिक स्वेच्छा से किसी विदेशी राज्य की नागरिकता प्राप्त कर लेता है, तो उसकी भारतीय नागरिकता स्वतः समाप्त हो जाएगी, किंतु यह नियम उस स्थिति में लागू नहीं होता जब भारत में युद्ध की स्थिति चल रही हो।
2. संविधान के अनुच्छेद 11 के तहत संसद को नागरिकता के अर्जन और समाप्ति तथा नागरिकता से संबंधित अन्य सभी विषयों के संबंध में उपबंध करने की संपूर्ण शक्ति प्रदान की गई है, और इसी शक्ति का प्रयोग करते हुए संसद ने नागरिकता अधिनियम, 1955 (Citizenship Act, 1955) पारित किया था।
3. नागरिकता अधिनियम, 1955 में अब तक हुए संशोधनों (विशेषकर नागरिकता संशोधन अधिनियम, 2019) के पश्चात, अब भारत में जन्म से नागरिकता प्राप्त करने के लिए यह अनिवार्य कर दिया गया है कि जन्म के समय माता-पिता में से कम से कम एक भारत का नागरिक हो और दूसरा अवैध प्रवासी (Illegal Migrant) न हो।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारत के महान्यायवादी (Attorney General) और नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) के संवैधानिक पदों, उनकी योग्यताओं, शक्तियों और कार्यप्रणाली के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 76 के अनुसार भारत के महान्यायवादी की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है और उसके पास योग्यता वह होनी चाहिए जो उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की होती है, तथा उसे अपने कर्तव्यों के पालन में भारत के राज्यक्षेत्र के सभी न्यायालयों में सुनवाई का अधिकार प्राप्त है, किंतु उसे संसद के दोनों सदनों की बैठकों में बोलने या उसकी कार्यवाही में भाग लेने का अधिकार तो है परंतु मत देने (Voting) का कोई अधिकार नहीं है।
2. संविधान के अनुच्छेद 148 के अंतर्गत नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है और उसे उसके पद से उसी रीति से और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है जिस रीति से और जिन आधारों से उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है।
3. नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) अपनी पदमुक्ति के पश्चात् भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन किसी भी प्रकार के अन्य पद (Office of Profit) धारण करने का पात्र नहीं होता है, जबकि महान्यायवादी के संदर्भ में संविधान में ऐसा कोई पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया गया है कि वह निजी प्रैक्टिस या अन्य सरकारी पद धारण नहीं कर सकता है, बशर्ते वह सरकार के हितों के प्रतिकूल न हो।
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भारतीय संविधान के अंतर्गत उच्च न्यायालयों (High Courts) की अधिकारिता, रिट क्षेत्राधिकार (Writ Jurisdiction) और अधीनस्थ न्यायालयों पर नियंत्रण के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत किसी उच्च न्यायालय का रिट क्षेत्राधिकार (Writ Jurisdiction) सर्वोच्च न्यायालय के अनुच्छेद 32 के अंतर्गत प्रदत्त रिट क्षेत्राधिकार की तुलना में अधिक व्यापक है, क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय केवल मूल अधिकारों के प्रवर्तन के लिए ही रिट जारी कर सकता है, जबकि उच्च न्यायालय मूल अधिकारों के साथ-साथ किसी अन्य प्रयोजन (Any other purpose) के लिए भी रिट जारी कर सकता है।
2. संविधान के अनुच्छेद 233 के अनुसार किसी राज्य में जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति, पोस्टिंग और प्रमोशन उस राज्य के राज्यपाल द्वारा राज्य के उच्च न्यायालय से परामर्श करने के पश्चात ही की जाती है, तथा जिला न्यायाधीश के रूप में नियुक्त होने के लिए व्यक्ति कम से कम सात वर्ष का अधिवक्ता या प्लीडर होना चाहिए और वह केंद्र या राज्य सरकार की सेवा में पहले से सेवारत नहीं होना चाहिए।
3. अनुच्छेद 235 के अंतर्गत राज्यों के अधीनस्थ न्यायालयों (Subordinate Courts) पर नियंत्रण का अधिकार, जिसमें जिला न्यायालयों और उनके अधीनस्थ न्यायालयों की पोस्टिंग, पदोस्थापना और उनसे संबंधित अन्य प्रशासनिक नियंत्रण शामिल है, पूरी तरह से संबंधित राज्य के राज्यपाल में निहित होता है, और इसमें उच्च न्यायालय की कोई परामर्शदात्री या निर्णायक भूमिका नहीं होती है।
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भारतीय संविधान के भाग-IV के अंतर्गत वर्णित 'राज्य के नीति निर्देशक तत्वों' (DPSP - अनुच्छेद 36-51) की प्रकृति, संशोधनों और न्यायिक व्याख्या के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 39(b) और 39(c) के अंतर्गत निहित नीति निर्देशक सिद्धांतों को प्रभावी बनाने के लिए संसद या राज्य विधानमंडलों द्वारा बनाई गई किसी विधि को इस आधार पर असंवैधानिक घोषित नहीं किया जा सकता कि वह अनुच्छेद 14 या अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों को छीनती या न्यून करती है, और यह संरक्षण मूल संविधान में ही निहित था जिसे बाद में 42वें संविधान संशोधन द्वारा विस्तारित किया गया था।
2. निर्देशक तत्वों को न्यायपालिका द्वारा अपरिवर्तनीय (Non-justiciable) घोषित किया गया है, किंतु सर्वोच्च न्यायालय ने अपने कई ऐतिहासिक निर्णयों (जैसे मिनर्वा मिल्स वाद, 1980) में यह स्पष्ट किया है कि मूल अधिकार और नीति निर्देशक तत्व एक-दूसरे के पूरक हैं और इनके बीच का संतुलन संविधान के 'मूल ढाँचे' (Basic Structure) का एक अनिवार्य हिस्सा है।
3. अनुच्छेद 48 के तहत राज्य कृषि और पशुपालन को आधुनिक और वैज्ञानिक प्रणालियों से संगठित करने के प्रयास करेगा, और विशेष रूप से गायों और बछड़ों तथा अन्य दुधारू और वाहक पशुओं की नस्लों के परीक्षण और सुधार के लिए तथा उनके वध का प्रतिषेध करने के लिए कदम उठाएगा, और यह एक समाजवादी विचारधारा पर आधारित नीति निर्देशक तत्व है।
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भारतीय संविधान के भाग I के अंतर्गत 'संघ एवं उसके राज्य क्षेत्र' (अनुच्छेद 1-4) और नए राज्यों के निर्माण या सीमा परिवर्तन की विधायी प्रक्रिया के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 2 के अंतर्गत संसद को यह शक्ति प्राप्त है कि वह संघ में नए राज्यों का प्रवेश या उनकी स्थापना ऐसे निबंधनों और शर्तों पर कर सके जो वह ठीक समझे, जबकि अनुच्छेद 3 के तहत संसद को मौजूदा राज्यों के क्षेत्रों, सीमाओं या नामों में परिवर्तन करने की शक्ति प्रदान की गई है।
2. अनुच्छेद 3 के तहत नए राज्यों के निर्माण या किसी राज्य के क्षेत्र, सीमा या नाम में परिवर्तन करने वाला कोई भी विधेयक संसद के किसी भी सदन में केवल तभी प्रस्तुत किया जा सकता है जब राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश प्राप्त हो, और राष्ट्रपति द्वारा ऐसा विधेयक संबंधित राज्य के विधानमंडल के पास उसकी राय जानने के लिए भेजा जाना संवैधानिक रूप से अनिवार्य है, भले ही राज्य विधानमंडल द्वारा दी गई राय को मानना संसद के लिए बाध्यकारी न हो।
3. अनुच्छेद 4 के स्पष्ट प्रावधान के अनुसार, अनुच्छेद 2 या अनुच्छेद 3 के तहत नए राज्यों के प्रवेश, स्थापना, या राज्यों के पुनर्गठन से संबंधित किए गए कानून संविधान के अनुच्छेद 368 के प्रयोजन के लिए 'संविधान संशोधन' माने जाएंगे, जिसके लिए संसद के विशेष बहुमत तथा आधे राज्यों के विधानमंडलों के अनुसमर्थन की अनिवार्य आवश्यकता होती है।
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