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Indian Polity
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भारतीय संविधान के अंतर्गत प्रदत्त मूल अधिकारों (Fundamental Rights) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. संविधान के अनुच्छेद 13 के अंतर्गत 'विधि' (Law) शब्द के व्यापक दायरे में संसद या राज्य विधानमंडलों द्वारा बनाए गए अधिनियमों और अध्यादेशों के साथ-साथ केवल प्रत्यायोजित विधान (Delegated Legislation) जैसे आदेश, उप-विधियाँ और नियम ही शामिल किए गए हैं, जबकि भारत के राज्यक्षेत्र में कानून का बल रखने वाले रूढ़ि या प्रथा (Customs or Usages) को इस अनुच्छेद के तहत 'विधि' की परिभाषा से बाहर रखा गया है।
  2. 2. अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत कोई भी वृत्ति, व्यापार या कारोबार करने के अधिकार के अंतर्गत राज्य को यह पूर्ण शक्ति प्राप्त है कि वह नागरिकों के इन अधिकारों पर पूर्ण प्रतिबंध (Absolute Ban) लगाते हुए किसी व्यापार या व्यवसाय को पूरी तरह से अपने हाथ में ले ले, और इसके लिए राज्य द्वारा किसी नागरिक के अधिकारों को समाप्त करने के लिए कोई न्यायिक समीक्षा या क्षतिपूर्ति की आवश्यकता नहीं होती है।
  3. 3. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 'मिनर्वा मिल्स वाद (1980)' में यह स्पष्ट रूप से निर्धारित किया गया कि भाग III (मूल अधिकार) और भाग IV (नीति निर्देशक तत्व) के बीच संतुलन संविधान की मूल संरचना (Basic Structure) का एक अनिवार्य हिस्सा है, और संसद अनुच्छेद 368 के तहत अपनी संविधान संशोधन शक्ति का प्रयोग करते हुए मूल अधिकारों को इस हद तक सीमित नहीं कर सकती कि वे संविधान के मूलभूत ताने-बाने को ही नष्ट कर दें।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 गलत है क्योंकि अनुच्छेद 13 के खंड (3)(a) के अनुसार 'विधि' (Law) के अंतर्गत केवल अध्यादेश, आदेश, उप-विधि, नियम, विनियम और अधिसूचनाएं ही नहीं, बल्कि भारत के राज्यक्षेत्र में कानून का बल रखने वाली **रूढ़ियाँ या प्रथाएँ (Customs or Usages)** भी स्पष्ट रूप से शामिल हैं। यदि कोई प्रथा मूल अधिकारों का उल्लंघन करती है, तो वह शून्य होगी। कथन 2 गलत है क्योंकि अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत कोई भी वृत्ति, व्यापार या कारोबार करने का अधिकार 'युक्तियुक्त प्रतिबंधों' (Reasonable Restrictions) के अधीन है, और राज्य किसी व्यापार को अपने हाथ में ले सकता है (राज्य एकाधिकार स्थापित कर सकता है), किंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि वह नागरिकों के मूल अधिकारों को पूर्णतः समाप्त या मनमाने ढंग से प्रतिबंधित कर दे; इसके लिए भी विधायी और संवैधानिक औचित्य होना आवश्यक है। कथन 3 बिल्कुल सही है; 'मिनर्वा मिल्स वाद (1980)' में सर्वोच्च न्यायालय ने यह ऐतिहासिक निर्णय दिया था कि मौलिक अधिकारों और नीति निर्देशक तत्वों के बीच संतुलन संविधान की मूल संरचना (Basic Structure) का एक मूलभूत हिस्सा है। भारतीय संविधान और राजव्यवस्था के ऐसे ही अन्य महत्वपूर्ण विषयों के बारे में विस्तार से पढ़ने के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पोर्टल पर विजिट करें।
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