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Indian Polity
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भारतीय संविधान के अंतर्गत राष्ट्रपति की क्षमादान की शक्ति (Pardoning Power - अनुच्छेद 72) और उसकी न्यायिक समीक्षा के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. राष्ट्रपति की क्षमादान की शक्ति कार्यपालिका की शक्ति का एक हिस्सा नहीं है, बल्कि यह एक स्वतंत्र संवैधानिक विशेषाधिकार है जिसका प्रयोग वह मंत्रिपरिषद की सलाह के बिना अपने स्वविवेक से कर सकता है।
- 2. उच्चतम न्यायालय द्वारा 'ईपुरा सुधाकर बनाम आंध्र प्रदेश राज्य' (2006) और अन्य मामलों में यह प्रतिपादित किया गया है कि राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति का प्रयोग न्यायिक समीक्षा के दायरे से पूरी तरह बाहर है, क्योंकि यह एक संप्रभु कृत्य (Sovereign Act) है।
- 3. राष्ट्रपति मृत्युदंड (Death Sentence) को क्षमा करने की शक्ति रखता है, और इसके साथ ही कोर्ट मार्शल (Court Martial) द्वारा दिए गए दंड के मामलों में भी क्षमादान देने का अधिकार केवल राष्ट्रपति को ही प्राप्त होता है, राज्यपाल को नहीं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 गलत है क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 74 के तहत राष्ट्रपति अपनी लगभग सभी शक्तियों का प्रयोग मंत्रिपरिषद की सलाह के अनुसार ही करता है, जिसमें क्षमादान की शक्ति भी शामिल है (केरल राज्य बनाम एम.के. कृष्णन मामले में स्पष्ट किया गया)। कथन 2 गलत है क्योंकि उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया है कि राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति मनमानी, दुर्भावनापूर्ण या भेदभावपूर्ण होने पर न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के दायरे में आती है। कथन 3 सही है क्योंकि सैन्य न्यायालयों (Court Martial) द्वारा दिए गए दंड के खिलाफ क्षमादान देने की अनन्य शक्ति केवल राष्ट्रपति के पास है, राज्य के राज्यपाल के पास नहीं। अधिक जानकारी के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पोर्टल पर विजिट करें।
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भारतीय संविधान के अंतर्गत राज्य की कार्यपालिका, विशेष रूप से राज्यपाल की अध्यादेश प्रख्यापित करने की शक्ति (अनुच्छेद 213) और मुख्यमंत्री तथा मंत्रिपरिषद के संवैधानिक संबंधों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 213 के अनुसार राज्यपाल को राज्य विधानमंडल के सत्र में न होने पर अध्यादेश प्रख्यापित करने की शक्ति प्राप्त है, और यह शक्ति राज्यपाल की एक पूर्णतः स्वतंत्र और अनियंत्रित विवेकीय शक्ति है, जिसके लिए उसे मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह की आवश्यकता नहीं होती है।
2. राज्यपाल द्वारा प्रख्यापित प्रत्येक अध्यादेश को राज्य विधानमंडल के पुनः समवेत होने पर उसके समक्ष प्रस्तुत किया जाना अनिवार्य है, और यदि विधानमंडल उस अध्यादेश को अस्वीकृत करने वाला संकल्प पारित कर देता है या उसकी अवधि (सामान्यतः छह सप्ताह) समाप्त हो जाती है, तो वह अध्यादेश निष्प्रभावी हो जाता है।
3. संविधान के अनुच्छेद 164 के अंतर्गत मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है और अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा मुख्यमंत्री की सलाह पर की जाती है, तथा राज्य के सभी मंत्री राज्यपाल के प्रसादपर्यंत पद धारण करते हैं, जिसका विधिक अर्थ यह है कि राज्यपाल किसी भी मंत्री को बिना मुख्यमंत्री की सलाह के व्यक्तिगत रूप से उसके पद से बर्खास्त कर सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान का कौन सा अनुच्छेद 'अस्पृश्यता का अंत' करता है?
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