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Indian Polity
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भारतीय संविधान के अंतर्गत केंद्र-राज्य विधायी, प्रशासनिक और वित्तीय संबंधों के साथ-साथ अंतर-राज्यीय परिषद् (Inter-State Council) के प्रावधानों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. संविधान के अनुच्छेद 263 के अंतर्गत राष्ट्रपति को यह शक्ति प्राप्त है कि वह अंतर-राज्यीय परिषद् की स्थापना कर सकता है, और इस परिषद् द्वारा दिए गए सभी निर्णय या संस्तुतियाँ केंद्र सरकार तथा सभी संबंधित राज्यों के लिए पूर्ण रूप से विधिक रूप से बाध्यकारी (Legally Binding) होती हैं।
  2. 2. अंतर-राज्यीय परिषद् के गठन की संस्तुति सर्वप्रथम सरकारी आयोग (Sarkaria Commission, 1983-88) द्वारा की गई थी, जिसके परिणामस्वरूप वर्ष 1990 में राष्ट्रपति के आदेश द्वारा इसे एक स्थायी संवैधानिक निकाय के रूप में स्थापित किया गया।
  3. 3. संविधान के अनुच्छेद 280 के तहत गठित वित्त आयोग (Finance Commission) भी एक प्रकार का सांविधिक निकाय है जो केंद्र और राज्यों के बीच करों के शुद्ध आगमों के वितरण तथा राज्यों को दी जाने वाली सहायता अनुदान के सिद्धांतों पर राष्ट्रपति को संस्तुतियां देता है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

उपर्युक्त में से कोई भी कथन सही नहीं है। कथन 1 असत्य है क्योंकि अनुच्छेद 263 के तहत गठित अंतर-राज्यीय परिषद् की प्रकृति केवल एक परामर्शदात्री (Advisory) निकाय की है, और इसके द्वारा दी गई सिफारिशें या निर्णय केंद्र या राज्यों पर बाध्यकारी नहीं होते हैं। कथन 2 असत्य है क्योंकि अंतर-राज्यीय परिषद् एक 'संवैधानिक निकाय' (Constitutional Body) है जिसका प्रत्यक्ष उल्लेख अनुच्छेद 263 में है, न कि कोई मात्र संविदात्मक या साधारण सांविधिक निकाय; हालांकि सरकारी आयोग की सिफारिश पर इसे 1990 में औपचारिक रूप से सक्रिय जरूर किया गया था। कथन 3 असत्य है क्योंकि वित्त आयोग (Finance Commission) एक 'संवैधानिक निकाय' है जिसका गठन अनुच्छेद 280 के तहत होता है, न कि सांविधिक (Statutory) निकाय। संघ और राज्यों के बीच विधायी, प्रशासनिक और वित्तीय संबंधों के विस्तृत अध्ययन के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था के प्रावधानों को पढ़ें।
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भारतीय संविधान के भाग II के अंतर्गत 'नागरिकता' (अनुच्छेद 5-11) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 9 के स्पष्ट प्रावधान के अनुसार, यदि कोई भारतीय नागरिक स्वेच्छा से किसी विदेशी राज्य की नागरिकता प्राप्त कर लेता है, तो उसकी भारतीय नागरिकता स्वतः समाप्त हो जाएगी, किंतु यह नियम उस स्थिति में लागू नहीं होता जब भारत में युद्ध की स्थिति चल रही हो। 2. संविधान के अनुच्छेद 11 के तहत संसद को नागरिकता के अर्जन और समाप्ति तथा नागरिकता से संबंधित अन्य सभी विषयों के संबंध में उपबंध करने की संपूर्ण शक्ति प्रदान की गई है, और इसी शक्ति का प्रयोग करते हुए संसद ने नागरिकता अधिनियम, 1955 (Citizenship Act, 1955) पारित किया था। 3. नागरिकता अधिनियम, 1955 में अब तक हुए संशोधनों (विशेषकर नागरिकता संशोधन अधिनियम, 2019) के पश्चात, अब भारत में जन्म से नागरिकता प्राप्त करने के लिए यह अनिवार्य कर दिया गया है कि जन्म के समय माता-पिता में से कम से कम एक भारत का नागरिक हो और दूसरा अवैध प्रवासी (Illegal Migrant) न हो। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? भारत के महान्यायवादी (Attorney General) और नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) के संवैधानिक पदों, अधिकारों और कृत्यों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. महान्यायवादी को भारत के राज्यक्षेत्र के सभी न्यायालयों में audiencia (सुनवाई) का अधिकार प्राप्त है, तथा उसे संसद के दोनों सदनों या उनकी संयुक्त बैठकों में बोलने और भाग लेने का अधिकार है, किंतु अनुच्छेद 88 के तहत उसे संसद में मत देने का कोई अधिकार नहीं है। 2. नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) भारत सरकार के खातों से संबंधित अपनी लेखापरीक्षा रिपोर्टें सीधे संसद में प्रस्तुत करता है, जबकि राज्यों के खातों से संबंधित रिपोर्टें वह सीधे राज्य विधानसभा में पेश करता है। 3. सीएजी का कार्यकाल 6 वर्ष या 65 वर्ष की आयु (जो भी पहले हो) होता है, और उसे उसके पद से केवल उसी रीति और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है जिस रीति और जिन आधारों पर उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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