BaalVikas
Menu

त्वरित लिंक्स

Indian Polity
6 views

भारतीय संविधान के अंतर्गत उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद की संवैधानिक स्थिति, शक्तियों और सामूहिक उत्तरदायित्व के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. संविधान के अनुच्छेद 67 के अनुसार उपराष्ट्रपति को उसके पद से हटाने के लिए राज्य सभा द्वारा अपने तत्कालीन समस्त सदस्यों के बहुमत से पारित ऐसे प्रस्ताव द्वारा हटाया जा सकता है जिससे लोक सभा सहमत हो, किंतु इस प्रकार का कोई भी प्रस्ताव तब तक प्रस्तुत नहीं किया जा सकता जब तक कि उस प्रस्ताव को प्रस्तुत करने के कम से कम चौदह दिन पूर्व की लिखित सूचना न दी गई हो।
  2. 2. संविधान के अनुच्छेद 75(2) के तहत मंत्री राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करते हैं, जिसका अर्थ यह है कि राष्ट्रपति किसी भी मंत्री को प्रधानमंत्री की सलाह के बिना भी व्यक्तिगत रूप से बर्खास्त कर सकता है, क्योंकि यह राष्ट्रपति की एक पूर्ण और अनियंत्रित विवेकीय शक्ति है।
  3. 3. राष्ट्रीय सुरक्षा समिति (Cabinet Committee on Security - CCS) सहित सभी मंत्रिमंडलीय समितियों का गठन प्रधानमंत्री द्वारा किया जाता है, और ये समितियाँ न केवल नीतिगत मामलों पर विचार करती हैं बल्कि आवश्यक होने पर मंत्रिमंडलीय निर्णयों को संशोधित या उनका पुनरावलोकन भी कर सकती हैं।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है: संविधान के अनुच्छेद 67(ख) के अनुसार, उपराष्ट्रपति को राज्य सभा के ऐसे संकल्प द्वारा उसके पद से हटाया जा सकता है जिसे राज्य सभा के तत्कालीन समस्त सदस्यों के बहुमत से पारित किया गया हो और जिससे लोक सभा सहमत हो। इसके लिए कम से कम 14 दिन पूर्व लिखित सूचना देना अनिवार्य है।
कथन 2 गलत है: यद्यपि अनुच्छेद 75(2) के तहत मंत्री राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करते हैं, किंतु संवैधानिक परंपराओं और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों के अनुसार राष्ट्रपति किसी मंत्री को अपनी इच्छा से या प्रधानमंत्री की सलाह के बिना बर्खास्त नहीं कर सकता; राष्ट्रपति मंत्रियों को केवल प्रधानमंत्री की सलाह पर ही बर्खास्त कर सकता है।
कथन 3 गलत है: मंत्रिमंडलीय समितियों (Cabinet Committees) का गठन प्रधानमंत्री द्वारा अपनी आवश्यकता और प्राथमिकताओं के आधार पर किया जाता है, किंतु ये समितियाँ मंत्रिपरिषद या मंत्रिमंडल (Cabinet) के निर्णयों को 'संशोधित' नहीं कर सकती हैं, बल्कि ये मुख्य रूप से नीतिगत मामलों पर विचार करके मंत्रिमंडल के समक्ष संस्तुतियाँ प्रस्तुत करती हैं, और अंतिम निर्णय मंत्रिमंडल का ही होता है। अधिक अध्ययन के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पर विजिट करें।
Share:

Related Questions

संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) और राज्य लोक सेवा आयोगों (SPSC) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 316 के प्रावधानों के अनुसार संघ लोक सेवा आयोग या किसी संयुक्त राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और अन्य सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, जबकि राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और अन्य सदस्यों की नियुक्ति संबंधित राज्य के राज्यपाल द्वारा की जाती है। 2. संविधान के अनुच्छेद 317 के अंतर्गत संघ लोक सेवा आयोग या किसी राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष या किसी अन्य सदस्य को केवल राष्ट्रपति द्वारा उनके दुराचार (Misbehaviour) के आधार पर हटाया जा सकता है, भले ही उनकी नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की गई हो, किंतु इसके लिए उच्चतम न्यायालय की संवीक्षा और जाँच अनिवार्य होती है। 3. अनुच्छेद 320 के अनुसार संघ लोक सेवा आयोग और राज्य लोक सेवा आयोगों का यह संवैधानिक कर्तव्य है कि वे राज्य के लोक सेवाओं के संबंध में की जाने वाली सभी नियुक्तियों की प्रत्येक प्रक्रिया के लिए प्रत्यक्ष साक्षात्कार और लिखित परीक्षा आयोजित करें, और सरकार किसी भी परिस्थिति में आयोग से परामर्श किए बिना सीधी भर्ती के किसी भी मामले में नियम नहीं बना सकती है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? भारतीय संविधान की प्रस्तावना (उद्देशिका) में उल्लिखित शब्दों और उनके ऐतिहासिक तथा वैधानिक संदर्भों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान की प्रस्तावना में 'समाजवादी' (Socialist) और 'पंथनिरपेक्ष' (Secular) शब्दों को 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा जोड़ा गया था, किंतु ये दोनों शब्द और 'अखंडता' शब्द मूल उद्देश्य प्रस्ताव का हिस्सा नहीं थे, बल्कि इन्हें स्वर्ण सिंह समिति की विशेष सिफारिश पर शामिल किया गया था। 2. 'प्रस्तावना संविधान का भाग है या नहीं' इस पर सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों का क्रम देखें तो 'बेरूबारी यूनियन वाद' (1960) में न्यायालय ने प्रस्तावना को संविधान का अंग मानने से इंकार कर दिया था, जबकि 'केशवानंद भारती वाद' (1973) और 'एलआईसी ऑफ़ इंडिया वाद' (1995) में इसे स्पष्ट रूप से संविधान का एक अभिन्न अंग स्वीकार किया गया। 3. प्रस्तावना में स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व (Liberty, Equality and Fraternity) के आदर्शों को रूसी क्रांति (1917) से प्रेरित होकर अपनाया गया है, जबकि सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय के आदर्श को फ्रांसीसी क्रांति (1789) से लिया गया है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? भारतीय संसद की विधाई प्रक्रिया और वित्तीय विधेयकों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 110 के अंतर्गत किसी विधेयक को 'धन विधेयक' (Money Bill) के रूप में प्रमाणित करने की अनन्य शक्ति लोकसभा अध्यक्ष के पास होती है, और लोकसभा अध्यक्ष का यह प्रमाणन अंतिम होता है तथा इसे किसी भी न्यायालय या सदन में चुनौती नहीं दी जा सकती है। 2. वित्तीय विधेयक (श्रेणी-I), जिसका उल्लेख अनुच्छेद 117(1) में किया गया है, को लोकसभा में केवल राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश से ही पुनः स्थापित किया जा सकता है, और इस प्रकार के वित्तीय विधेयक को पारित करने के संबंध में लोकसभा और राज्यसभा की शक्तियां साधारण विधेयक की तरह पूर्णतः समान होती हैं। 3. अनुच्छेद 117(3) के अंतर्गत आने वाले वित्तीय विधेयक (श्रेणी-II), जिनमें ऐसे उपबंध होते हैं जिनसे भारत की संचित निधि से व्यय करना पड़े, को संसद के किसी भी सदन में राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश के बिना भी पुनः स्थापित किया जा सकता है, किंतु राष्ट्रपति की सिफारिश के बिना ऐसा कोई भी विधेयक किसी भी सदन द्वारा पारित नहीं किया जा सकता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? भारत के निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) और चुनावी सुधारों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 324 के अंतर्गत निर्वाचन आयोग को संसद, राज्य विधानमंडलों, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के पदों के चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की शक्ति प्रदान की गई है, और यह एक अखिल भारतीय निकाय है जो संघ और राज्यों दोनों के लिए समान रूप से कार्य करता है। 2. दिनेश गोस्वामी समिति (1990) ने चुनावी सुधारों पर अपनी सिफारिश देते हुए राज्य द्वारा चुनावी खर्च के वित्तपोषण (State Funding of Elections) का समर्थन किया था, लेकिन इसके तहत केवल वस्तु के रूप में (In-kind) सहायता देने की बात कही थी न कि नकद अनुदान देने की। 3. जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 126 के अनुसार मतदान समाप्त होने के लिए नियत समय के साथ समाप्त होने वाले 48 घंटों की अवधि के दौरान किसी भी चुनावी क्षेत्र में किसी भी सार्वजनिक सभा, जुलूस या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के माध्यम से चुनाव प्रचार करने पर पूर्ण प्रतिबंध रहता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? भारतीय संविधान के 74वें संशोधन अधिनियम, 1992 के अंतर्गत शहरी स्थानीय शासन (नगरपालिकाओं) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. इस अधिनियम के माध्यम से संविधान में भाग IX-A जोड़ा गया, जिसमें अनुच्छेद 243-P से 243-ZG तक के प्रावधान शामिल हैं, तथा इसके तहत नगरपालिकाओं के तीन प्रकार—नगर पंचायत, नगर परिषद और नगर निगम—के गठन का प्रावधान किया गया है। 2. अनुच्छेद 243-S के अनुसार प्रत्येक नगरपालिका में वार्ड कमेटियों (Ward Committees) का गठन किया जाना अनिवार्य है, और यह प्रावधान उन सभी नगरपालिकाओं पर लागू होता है जिनकी कुल जनसंख्या दस लाख या उससे अधिक है। 3. अनुच्छेद 243-Y के प्रावधानों के तहत पंचायतों के लिए गठित राज्य वित्त आयोग ही नगरपालिकाओं की वित्तीय स्थिति की भी समीक्षा करता है और राज्यपाल को उनकी वित्तीय स्थिति सुधारने के लिए संस्तुतियां प्रस्तुत करता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Log in to add to quiz, bookmark, or report issues.