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Indian Polity
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सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को कौन हटा सकता है?

Detailed Explanation

संसद द्वारा महाभियोग प्रक्रिया के माध्यम से हटाया जा सकता है।
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भारतीय संविधान के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) की शक्तियों, क्षेत्राधिकारों और संवैधानिक स्थिति के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 131 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय का मूल और अनन्य (Original and Exclusive) क्षेत्राधिकार उन विवादों तक विस्तृत है जो केंद्र और एक या अधिक राज्यों के बीच अथवा दो या अधिक राज्यों के बीच उत्पन्न होते हैं, बशर्ते यह विवाद किसी ऐसे प्राग्-संविधान (Pre-constitution) संधि या समझौते से उत्पन्न हुआ हो जिसके नियमन में कोई अपवाद न हो। 2. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत राष्ट्रपति को उच्चतम न्यायालय से परामर्श करने की शक्ति प्राप्त है, और यदि लोक महत्व का कोई प्रश्न उत्पन्न होता है, तो उच्चतम न्यायालय राष्ट्रपति को अपनी राय देने के लिए बाध्य है, तथा न्यायालय द्वारा दी गई यह परामर्शकारी सलाह (Advisory Opinion) सरकार के लिए पूर्ण रूप से बाध्यकारी होती है। 3. उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों को उनके पद से हटाने की प्रक्रिया अत्यंत कठोर है, जिसके लिए संसद के प्रत्येक सदन द्वारा अपनी कुल सदस्य संख्या के बहुमत तथा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत द्वारा समर्थित समावेदन राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत किया जाना आवश्यक होता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? भारतीय संविधान की प्रस्तावना (उद्देशिका) और उसके ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा 13 दिसंबर 1946 को संविधान सभा में प्रस्तुत और 22 जनवरी 1947 को सर्वसम्मति से स्वीकृत 'उद्देश्य प्रस्ताव' (Objectives Resolution) ही भारतीय संविधान की प्रस्तावना का आधार बना, जिसमें मूल रूप से 'संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न लोकतांत्रिक गणराज्य' की परिकल्पना की गई थी। 2. प्रस्तावना में उल्लिखित 'न्याय' (सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक) के आदर्श को रूस की क्रांति (1917) से प्रेरित होकर शामिल किया गया था, जबकि 'स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व' के आदर्शों को अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम से ग्रहण किया गया है। 3. 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा प्रस्तावना में पहली और एकमात्र बार संशोधन किया गया जिसके तहत इसमें 'समाजवादी', 'पंथनिरपेक्ष' और 'अखंडता' शब्दों को जोड़ा गया, और सर्वोच्च न्यायालय ने 'केशवानंद भारती वाद' (1973) में यह स्पष्ट किया था कि प्रस्तावना संविधान का एक अभिन्न अंग है तथा इसमें संशोधन किया जा सकता है बशर्ते इसके मूल ढांचे (Basic Structure) का उल्लंघन न हो। 4. संविधान की प्रस्तावना देश के नागरिकों के लिए न्याय, स्वतंत्रता और समता की गारंटी देती है, किंतु यह स्वयं न्यायालयों में गैर-न्याययोचित (Non-justiciable) है, जिसका अर्थ है कि इसके प्रावधानों को किसी न्यायालय द्वारा सीधे प्रवर्तित नहीं कराया जा सकता और यह विधायिका की शक्तियों पर न तो कोई प्रतिबंध लगाती है और न ही उसे कोई अतिरिक्त शक्ति प्रदान करती है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? भारतीय संविधान के अंतर्गत प्रदत्त मूल अधिकारों (Fundamental Rights) और उनके न्यायिक संरक्षण से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 13 के खंड (2) के अनुसार राज्य ऐसी कोई विधि नहीं बनाएगा जो भाग-III द्वाराप्रदत्त मूल अधिकारों को छीनती है या न्यून करती है, तथा इस खंड के अंतर्गत 'विधि' (Law) शब्द में संसद या राज्य विधानमंडलों द्वारा बनाए गए अधिनियमों के अतिरिक्त केवल अध्यादेश, आदेश और उप-विधियाँ ही शामिल हैं, किंतु किसी भी संवैधानिक संशोधन अधिनियम (Constitutional Amendment Act) को इस अनुच्छेद के अधीन 'विधि' नहीं माना जा सकता था। 2. उच्चतम न्यायालय द्वारा 'केशवानंद भारती वाद' (1973) में यह स्पष्ट रूप से अभिनिर्धारित किया गया कि अनुच्छेद 368 के तहत संसद को संविधान के किसी भी भाग में संशोधन करने की शक्ति प्राप्त है, जिसमें मूल अधिकार भी शामिल हैं, बशर्ते वह संशोधन संविधान के 'मूल ढांचे' (Basic Structure) का उल्लंघन न करे। 3. अनुच्छेद 32 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय को मूल अधिकारों के प्रवर्तन के लिए रिट जारी करने की अनन्य (Exclusive) अधिकारिता प्राप्त है, जिसका अर्थ यह है कि किसी भी मूल अधिकार के हनन की स्थिति में कोई भी व्यक्ति सीधे उच्चतम न्यायालय की शरण ले सकता है, और उच्च न्यायालयों को अनुच्छेद 226 के तहत रिट जारी करने की शक्ति केवल तभी प्राप्त होती है जब पीड़ित व्यक्ति पहले उच्च न्यायालय में अपील करे। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? पादप और जन्तु में मुख्य अंतर क्या है? भारतीय संविधान के 73वें संशोधन अधिनियम, 1992 के अंतर्गत पंचायती राज संस्थाओं के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. इस संशोधन अधिनियम द्वारा संविधान में भाग IX जोड़ा गया, जिसका शीर्षक 'पंचायते' है और इसमें अनुच्छेद 243 से 243-O तक के प्रावधान शामिल हैं, तथा इसके द्वारा संविधान में ग्यारहवीं अनुसूची जोड़ी गई जिसमें पंचायतों के क्षेत्राधिकार के लिए 29 कार्यात्मक विषयों का उल्लेख किया गया है। 2. पंचायती राज संस्थाओं के सभी स्तरों पर महिलाओं के लिए कुल आरक्षित सीटों का कम से कम एक-तिहाई (33 प्रतिशत) भाग प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा भरी जाने वाली सीटों के लिए आरक्षित होना अनिवार्य किया गया है, और यह आरक्षण महिलाओं के लिए अध्यक्ष के पदों (Offices of Chairpersons) पर भी लागू होता है। 3. राज्य में पंचायतों के लिए वित्तीय स्थिति की समीक्षा करने और संचित निधि से अनुदानों के आवंटन की संस्तुति करने के लिए प्रत्येक पाँच वर्ष की समाप्ति पर राज्यपाल द्वारा एक 'राज्य वित्त आयोग' (State Finance Commission) के गठन का प्रावधान अनुच्छेद 243-I के अंतर्गत किया गया है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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