BaalVikas
Menu
Civil services
Asked 2 months ago · Viewed 19 times

भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग XI' के अंतर्गत 'संघ और राज्यों के बीच विधายक संबंध' (Legislative Relations - अनुच्छेद 245 से 255) तथा अवशिष्ट शक्तियों (Residual Powers) के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. संविधान के अनुच्छेद 245 के अनुसार संसद को भारत के संपूर्ण राज्यक्षेत्र या उसके किसी भाग के लिए कानून बनाने की शक्ति प्राप्त है, और किसी भी राज्य के विधानमंडल को उस राज्य के संपूर्ण राज्यक्षेत्र या उसके किसी भाग के लिए कानून बनाने की शक्ति दी गई है, बशर्ते राज्य द्वारा बनाया गया कोई भी कानून इस आधार पर अवैध नहीं माना जाएगा कि उसका अतिरिक्त-क्षेत्रीय प्रवर्तन (Extra-territorial operation) होता है।
  2. 2. संविधान के अनुच्छेद 248 के अनुसार संसद को किसी ऐसे विषय के संबंध में कानून बनाने की अनन्य शक्ति प्राप्त है जो समवर्ती सूची या राज्य सूची में शामिल नहीं है, और इस 'अवशिष्ट शक्ति' (Residual Power) के अंतर्गत कर लगाने (Taxation) का विषय भी संसद की ही विधायी शक्ति के अधीन आता है।
  3. 3. यदि समवर्ती सूची (Concurrent List) में शामिल किसी विषय पर संसद द्वारा बनाया गया कोई कानून और किसी राज्य के विधानमंडल द्वारा बनाया गया कोई कानून एक-दूसरे के प्रतिकूल या विरोधाभासी होते हैं, तो संविधान के अनुच्छेद 254 के तहत हमेशा संसद द्वारा बनाया गया कानून ही प्रभावी होगा, भले ही राज्य का कानून बाद में बनाया गया हो और उसे राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति प्राप्त हुई हो।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 असत्य है: संविधान के अनुच्छेद 245(2) के अनुसार, राज्य का कोई भी कानून इस आधार पर अमान्य नहीं होगा कि उसका अतिरिक्त-क्षेत्रीय प्रवर्तन (Extra-territorial operation) है, लेकिन यह नियम केवल संसद पर लागू होता है कि वह पूरे देश के लिए अतिरिक्त-क्षेत्रीय कानून बना सकती है। यहाँ कथन की भाषा में सूक्ष्म तकनीकी त्रुटि यह है कि अनुच्छेद 245(1) स्पष्ट रूप से यह प्रावधान करता है कि संसद भारत के संपूर्ण राज्यक्षेत्र या उसके किसी भाग के लिए कानून बना सकती है, किंतु राज्यों के विधानमंडल केवल अपने राज्य के भीतर के क्षेत्रों के लिए ही कानून बना सकते हैं। इसके अलावा, भारतीय अदृश्य अतिरिक्त-क्षेत्रीय कानूनों की शक्ति राज्यों के पास नहीं होती है। अधिक स्पष्ट रूप से, राज्य विधानमंडल के कानून का अतिरिक्त-क्षेत्रीय होना उसे अवैध बनाता है यदि उसका राज्य से कोई पर्याप्त संबंध (Nexus) न हो। कथन 2 सत्य है: संविधान के अनुच्छेद 248 के अनुसार, संसद को किसी भी ऐसे विषय के संबंध में कानून बनाने की अनन्य (Exclusive) शक्ति प्राप्त है जो समवर्ती सूची (सूची-III) या राज्य सूची (सूची-II) में प्रगणित नहीं है। इन 'अवशिष्ट शक्तियों' (Residual Powers) के अंतर्गत कर लगाने की शक्ति भी संसद में ही निहित है (जो कि अमेरिकी या ऑस्ट्रेलियाई संविधानों से भिन्न है, जहाँ अवशिष्ट शक्तियाँ राज्यों के पास होती हैं, जबकि कनाडा और भारत के संविधान में यह केंद्र के पास हैं)। कथन 3 असत्य है: संविधान के अनुच्छेद 254(1) के अनुसार यदि समवर्ती सूची के किसी विषय पर राज्य का कानून संसद के कानून के विरुद्ध है, तो संसद का कानून ही मान्य होगा। किंतु अनुच्छेद 254(2) यह प्रावधान करता है कि यदि राज्य सूची के किसी विषय (या समवर्ती सूची के विषय) पर राज्य के विधानमंडल द्वारा बनाया गया कानून राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित रखा जाता है और उसे राष्ट्रपति की अनुमति (Assent) मिल जाती है, तो वह कानून उस राज्य में प्रभावी रहेगा, भले ही वह संसद के पहले से बने कानून के प्रतिकूल हो (बशर्ते संसद बाद में उसी विषय पर नया कानून बनाकर राज्य के उस कानून को निरोधित या संशोधित न कर दे)। चूँकि कथन में राष्ट्रपति की अनुमति के अपवाद को नजरंदाज किया गया है, अतः कथन 3 गलत है।
Share:
अगला प्रश्न → भारतीय अर्थव्यवस्था एवं सतत विकास के संदर्भ में, 'राष्ट्रीय जैव विविधता… ← पिछला प्रश्न भारतीय अर्थव्यवस्था एवं सतत विकास के संदर्भ में…

Related Questions

→ भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग XV' के अंतर्गत 'निर्वाचन' (Elections - अनुच्छेद 324 से 329A) तथा चुनाव आयोग एवं निर्वाचन सुधारों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 324 के अनुसार संसद, राज्य के विधानमंडलों, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के पदों के लिए निर्वाचनों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की संपूर्ण शक्ति 'भारतीय निर्वाचन आयोग' (Election Commission of India) में निहित होती है, जिसमें एक मुख्य चुनाव आयुक्त और उतने ही अन्य चुनाव आयुक्त होते हैं जितने राष्ट्रपति समय-समय पर निर्धारित करते हैं। 2. मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, और मुख्य चुनाव आयुक्त को उसके पद से उसी रीति और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है जिस रीति और जिन आधारों पर उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है, जबकि अन्य चुनाव आयुक्तों को मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश के बिना राष्ट्रपति द्वारा किसी भी समय पद से हटाया जा सकता है। 3. संविधान के अनुच्छेद 327 के तहत संसद को यह शक्ति प्राप्त है कि वह समय-समय पर विधि द्वारा निर्वाचनों से संबंधित सभी मामलों के संबंध में उपबंध कर सके, जिसमें संसद और राज्य के विधानमंडलों के सदनों के लिए निर्वाचन सूचियों का तैयार किया जाना, निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन और सदन के गठन से संबंधित अन्य सभी विषय शामिल हैं। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → भारतीय अर्थव्यवस्था और सतत विकास के संदर्भ में, 'बहुआयामी गरीबी सूचकांक' (Multidimensional Poverty Index - MPI) और उसके मापन के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. वैश्विक बहुआयामी गरीबी सूचकांक (Global MPI) संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) और ऑक्सफोर्ड पॉवर्टी एंड ह्यूमन डेवलपमेंट इनिशिएटिव (OPHI) द्वारा संयुक्त रूप से जारी किया जाता है, जो स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन स्तर जैसे तीन समान रूप से भारित आयामों (Dimensions) के अंतर्गत कुल दस संकेतकों (Indicators) का उपयोग करता है। 2. वैश्विक MPI में किसी व्यक्ति को 'बहुआयामी रूप से गरीब' तब माना जाता है जब वह कुल भारित संकेतकों में से कम से कम 20 प्रतिशत (यानी एक-पाँचवें हिस्से) अभावों (Deprivations) से ग्रस्त होता है, और यह सूचकांक केवल आय या उपभोग व्यय पर आधारित एक-आयामी दृष्टिकोण से परे जाकर गरीबी का आकलन करता है। 3. नीति आयोग द्वारा जारी किया जाने वाला 'राष्ट्रीय बहुआयामी गरीबी सूचकांक' वैश्विक MPI के तीन समान आयामों को ही आधार बनाता है, किंतु इसमें भारत की विशिष्ट सामाजिक-आर्थिक वास्तविकताओं को反映 (reflect) करने के लिए संकेतकों की कुल संख्या को दस से बढ़ाकर बारह कर दिया गया है, जिसमें मातृ स्वास्थ्य (Maternal Health) और बैंक खाते (Bank Account) जैसे दो नए संकेतक जोड़े गए हैं। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → हुरुन ग्लोबल यूनिकॉर्न इंडेक्स 2026 में भारत की रैंक क्या है? → भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग IVक' (मूल कर्तव्य - अनुच्छेद 51क) तथा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए विभिन्न निर्णयों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. मूल कर्तव्यों को मूल संविधान में शामिल नहीं किया गया था, बल्कि इन्हें स्वर्ण सिंह समिति की संस्तुति पर 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा संविधान के भाग IVक में जोड़ा गया, और वर्तमान में संविधान में कुल 11 मूल कर्तव्य हैं जिन्हें वर्ष 2002 के 86वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा अंतिम बार संशोधित किया गया था। 2. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51क के अंतर्गत उल्लिखित सभी 11 मूल कर्तव्य प्रकृति से वाद योग्य (Justiciable) हैं, जिसका अर्थ है कि यदि कोई नागरिक अपने किसी मूल कर्तव्य का पालन नहीं करता है, तो उसके विरुद्ध उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अनुच्छेद 226 और अनुच्छेद 32 के तहत सीधे रिट याचिका जारी की जा सकती है। 3. 'रंगनाथ मिश्रा बनाम भारत संघ' (2003) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया था कि मूल कर्तव्यों को केवल कानूनी रूप से लागू करने या दण्डित करने का विषय नहीं बनाया जाना चाहिए, बल्कि देश में नागरिकों के बीच इनके प्रति जन-जागरूकता पैदा की जानी चाहिए और इन्हें कानून के अन्य प्रावधानों के साथ समेकित करके लागू किया जाना चाहिए। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग XIV' (संघ और राज्यों के अधीन सेवाएँ - अनुच्छेद 308 से 323) के अंतर्गत 'अखिल भारतीय सेवाओं' (All India Services) और लोक सेवा आयोगों के प्रावधानों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 312 के अनुसार संसद को यह शक्ति प्राप्त है कि वह कानून द्वारा भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) और भारतीय पुलिस सेवा (IPS) के अतिरिक्त किसी अन्य नई अखिल भारतीय सेवा के सृजन का प्रावधान कर सके, बशर्ते राज्य सभा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम-से-कम दो-तिहाई बहुमत से यह संकल्प पारित कर दे कि राष्ट्रीय हित में ऐसा करना आवश्यक है। 2. अखिल भारतीय सेवाओं के सदस्यों की नियुक्ति और सेवा की शर्तों का निर्धारण करने की अंतिम शक्ति राष्ट्रपति में निहित होती है, किंतु इन सेवाओं के अधिकारियों को उनके पद से हटाने या अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का अधिकार केवल संबंधित राज्य सरकार के पास होता है जहाँ वे सेवारत हैं, और केंद्र सरकार इस मामले में कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकती है। 3. संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) के किसी सदस्य को उसकी पदावधि की समाप्ति से पहले केवल राष्ट्रपति द्वारा साबित कदाचार या असमर्थता के आधार पर सर्वोच्च न्यायालय की जाँच रिपोर्ट के पश्चात ही हटाया जा सकता है, तथा UPSC के अध्यक्ष या सदस्य अपने पद से हटने के बाद भारत सरकार या किसी राज्य की सरकार के अधीन किसी भी प्रकार के नियोजन (Employment) के पात्र नहीं होते हैं। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → भारतीय पर्यावरण कानून और 'राष्ट्रीय हरित अधिकरण' (National Green Tribunal - NGT) के गठन, क्षेत्राधिकार एवं कार्यप्रणाली के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के अंतर्गत स्थापित एनजीटी (NGT) एक सांविधिक निकाय है, जिसे पर्यावरण संरक्षण, वनों के संवर्धन और अन्य प्राकृतिक संसाधनों से संबंधित कानूनी अधिकारों के प्रवर्तन के लिए सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के सख्त और पारंपरिक नियमों का पालन करने की कानूनी बाध्यता नहीं है, बल्कि यह 'प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों' (Principles of Natural Justice) द्वारा निर्देशित होकर कार्य करता है। 2. एनजीटी के पास देश के किसी भी ऐसे आदेश, निर्णय या पुरस्कार के विरुद्ध पुनरीक्षण (Review) करने की शक्ति प्राप्त है, और इसके आदेश या पुरस्कार से व्यथित किसी भी व्यक्ति द्वारा यदि कोई अपील दायर करनी हो, तो वह इस आदेश के पारित होने के 90 दिनों के भीतर सीधे सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) में की जा सकती है। 3. यह अधिकरण पर्यावरण से जुड़े मामलों का निपटारा करते समय वैधानिक रूप से 'प्रदूषक भुगतान करेगा' (Polluter Pays Principle), 'निवारक सिद्धांत' (Precautionary Principle) और 'सतत विकास' (Sustainable Development) के सिद्धांतों को लागू करने की पूर्ण शक्ति रखता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Log in to add to quiz, bookmark, or report issues.