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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग IV' के अंतर्गत 'राज्य के नीति निर्देशक तत्व' (Directive Principles of State Policy - अनुच्छेद 36 से 51) तथा 'समान नागरिक संहिता' (Uniform Civil Code - अनुच्छेद 44) के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 44 के अनुसार राज्य, भारत के पूरे राज्यक्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता (UCC) को सुरक्षित करने का प्रयास करेगा, और यह प्रावधान एक न्यायोचित (Justiciable) अधिकार है जिसे लागू कराने के लिए कोई भी नागरिक सीधे सर्वोच्च न्यायालय का रुख कर सकता है।
- 2. गोवा एकमात्र ऐसा राज्य है जहाँ पुर्तगाली सिविल कोड, 1867 (Portuguese Civil Code) के रूप में एक समान नागरिक संहिता पहले से ही लागू है, जो धार्मिक संप्रदायों के आधार पर व्यक्तिगत कानूनों (Personal Laws) में अंतर किए बिना सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू होता है।
- 3. नीति निर्देशक तत्वों के अंतर्गत आने वाले प्रावधानों में से कुछ को समय-समय पर विभिन्न संविधान संशोधनों के माध्यम से जोड़ा गया है, किंतु अनुच्छेद 44 (समान नागरिक संहिता) मूल संविधान में ही नीति निर्देशक तत्वों के भाग के रूप में निहित था, जिसे किसी भी संशोधन द्वारा नहीं जोड़ा गया है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 असत्य है क्योंकि संविधान के भाग IV (नीति निर्देशक तत्व) में शामिल अनुच्छेद 44 'गैर-न्यायोचित' (Non-justiciable) प्रकृति के हैं, अर्थात इन्हें न्यायालय द्वारा लागू नहीं कराया जा सकता है और इसके उल्लंघन पर कोई नागरिक सीधे सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय नहीं जा सकता। कथन 2 सत्य है क्योंकि गोवा में पुर्तगाली सिविल कोड, 1867 लागू है जो एक प्रकार की समान नागरिक संहिता का उदाहरण है। कथन 3 सत्य है क्योंकि अनुच्छेद 44 मूल संविधान (1950) के समय से ही नीति निर्देशक तत्वों में शामिल है, हालांकि इसे लागू करना अभी भी नीतिगत और विधायी इच्छाशक्ति का विषय बना हुआ है।
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग IV' (राज्य के नीति निर्देशक तत्व - अनुच्छेद 36 से 51) तथा 'समान नागरिक संहिता' (Uniform Civil Code - अनुच्छेद 44) के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 44 के अनुसार राज्य, भारत के पूरे राज्यक्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता को सुरक्षित करने का प्रयास करेगा, और यह उपबंध नीति निर्देशक तत्वों के अंतर्गत होने के कारण देश की न्यायपालिका द्वारा स्वतः प्रवर्तनीय (Self-enforceable) है।
2. 'शामला बनाम स्टेट ऑफ पंजाब' और 'सारला मुद्गल बनाम भारत संघ' जैसे ऐतिहासिक सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों में समय-समय पर यह रेखांकित किया गया है कि देश में एक समान नागरिक संहिता का होना राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करने और लैंगिक न्याय (Gender Justice) को बढ़ावा देने के लिए अत्यंत आवश्यक है।
3. नीति निर्देशक तत्वों के अंतर्गत शामिल अधिकांश प्रावधान भले ही वाद योग्य (Justiciable) नहीं हैं, किंतु संविधान के अनुच्छेद 37 में स्वयं यह स्पष्ट किया गया है कि इसमें अंतर्विष्ट सिद्धांत देश के शासन में मौलिक (Fundamental) हैं और विधि बनाने में इन सिद्धांतों को लागू करना राज्य का कर्तव्य होगा।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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आत्मीय सभा का गठन किस उद्देश्य से किया गया था?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग XVI' (कुछ वर्गों के संबंध में विशेष उपबंध - अनुच्छेद 330 से 342क) के अंतर्गत अनुसूचित जातियों (SC), अनुसूचित जनजातियों (ST) और सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों (SEBC) से संबंधित संवैधानिक प्रावधानों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 330 और 332 के अनुसार, लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के लिए स्थानों का आरक्षण उनकी जनसंख्या के अनुपात में किया जाता है, तथा 104वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2018 द्वारा इस आरक्षण की अवधि को बढ़ाकर वर्ष 2030 तक कर दिया गया है।
2. संविधान के अनुच्छेद 338क के तहत गठित 'राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग' (NCST) के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और अन्य सदस्यों की सेवा शर्तों और पदावधि का निर्धारण करने की शक्ति संसद के पास है, न कि राष्ट्रपति के पास।
3. संविधान के अनुच्छेद 342क के अनुसार, राष्ट्रपति किसी राज्य या संघ राज्यक्षेत्र के संबंध में, राज्यपाल (या उस राज्य के प्रशासक) से परामर्श करने के पश्चात्, लोक अधिसूचना द्वारा उन सामाजिक और शैक्षणिक जातियों को निर्दिष्ट कर सकता है जिन्हें उस राज्य या संघ राज्यक्षेत्र के संबंध में 'सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा वर्ग' (SEBC) माना जाएगा, तथा किसी जाति को इस सूची में जोड़ने या हटाने की अंतिम शक्ति केवल संसद में निहित है, राष्ट्रपति में नहीं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 72' के अंतर्गत राष्ट्रपति की क्षमादान की शक्ति (Pardoning Power) और उसकी न्यायिक समीक्षा के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति को सेना न्यायालय (Court Martial) द्वारा दी गई सजा को माफ करने, कम करने या उसका परिहार करने की पूर्ण शक्ति प्राप्त है, और इस शक्ति का प्रयोग करते समय राष्ट्रपति के लिए केंद्रीय मंत्रिपरिषद की सलाह मानना संवैधानिक रूप से हमेशा और बिना किसी अपवाद के बाध्यकारी होता है।
2. ऐतिहासिक 'ईश्वर सिंह बनाम भारत संघ' और अन्य मामलों में उच्चतम न्यायालय द्वारा यह स्पष्ट किया गया है कि राष्ट्रपति की क्षमादान की शक्ति की न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) की जा सकती है, यदि यह शक्ति का प्रयोग अत्यंत स्पष्ट रूप से मनमाने, दुर्भावनापूर्ण, भेदभावपूर्ण या अप्रासंगिक आधारों पर किया गया हो।
3. राज्यपाल की क्षमादान शक्ति (अनुच्छेद 161) की तुलना में राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति का दायरा अधिक व्यापक है, क्योंकि राष्ट्रपति मृत्युदंड (Death Sentence) के मामलों में भी क्षमादान दे सकते हैं और ऐसे मामलों में भी जहाँ सजा किसी राज्य सूची (State List) के विषय से संबंधित कानून के तहत दी गई हो।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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नगर पालिकाओं से संबंधित 12वीं अनुसूची किस संशोधन द्वारा जोड़ी गई थी?
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