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भारतीय अर्थव्यवस्था एवं सतत विकास के संदर्भ में, 'हरित बॉन्ड' (Green Bonds) और 'सॉवरेन ग्रीन बॉन्ड' (Sovereign Green Bonds) के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. हरित बॉन्ड एक प्रकार का निश्चित आय वाला साधन है जिसका उपयोग विशेष रूप से जलवायु और पर्यावरण से संबंधित परियोजनाओं (जैसे नवीकरणीय ऊर्जा, ऊर्जा दक्षता और स्वच्छ परिवहन) के लिए वित्तपोषण या पुनर्वित्तपोषण हेतु किया जाता है, और ये वैश्विक स्तर पर 'ग्रीन बॉन्ड प्रिंसिपल्स' (GBP) द्वारा शासित होते हैं।
  2. 2. भारत सरकार ने अपनी प्रतिबद्धताओं के तहत वर्ष 2022-23 के बजट घोषणा के अनुरूप पहली बार 'सार्वभौमिक हरित बॉन्ड' (Sovereign Green Bonds) जारी किए, तथा इन बॉन्डों से प्राप्त होने वाली आय को केंद्र सरकार के समेकित निधि (Consolidated Fund of India) में जमा किया जाता है, जिसका उपयोग देश के किसी भी विकासात्मक या राजकोषीय घाटे को पाटने के लिए किया जा सकता है।
  3. 3. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हरित बांडों का प्रमाणन और यह सत्यापित करने की प्रक्रिया कि परियोजनाएं पर्यावरण अनुकूल मानदंडों का पालन करती हैं या नहीं, मुख्य रूप से 'क्लाइमेट बॉन्ड इनिशिएटिव' (Climate Bonds Initiative) जैसी स्वतंत्र संस्थाओं द्वारा की जाती है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है: हरित बॉन्ड (Green Bonds) निश्चित आय वाले वित्तीय उपकरण होते हैं जिनका उपयोग विशेष रूप से पर्यावरण अनुकूल और जलवायु संबंधी परियोजनाओं के वित्तपोषण के लिए किया जाता है। ये अंतर्राष्ट्रीय पूंजी बाजार संघ (ICMA) के 'ग्रीन बॉन्ड प्रिंसिपल्स' (GBP) के सिद्धांतों पर आधारित होते हैं। कथन 2 गलत है: सॉवरेन ग्रीन बॉन्ड से प्राप्त होने वाली आय को केंद्र सरकार के समेकित निधि (Consolidated Fund of India) में जमा किया जाता है, किंतु नियमों के अनुसार इन निधियों को केवल उन 'योग्य हरित परियोजनाओं' (Eligible Green Projects) में हीियोजित किया जा सकता है जिनकी पहचान भारत सरकार के 'सॉवरेन ग्रीन बॉन्ड फ्रेमवर्क' के तहत की गई है। इनका उपयोग सामान्य राजकोषीय घाटे को पाटने या किसी भी गैर-हरित विकासात्मक कार्य के लिए मनमाने ढंग से नहीं किया जा सकता है। कथन 3 सही है: 'क्लाइमेट बॉन्ड इनिशिएटिव' (CBI) एक प्रमुख अंतरराष्ट्रीय निवेशक-केंद्रित गैर-लाभकारी संगठन है जो हरित बांड बाजार के मानकीकरण, प्रमाणन (Certification) और निगरानी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
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NGT के समक्ष प्रस्तुत किए जाने वाले किसी भी पर्यावरण संबंधी आदेश, निर्णय या पुरस्कार से व्यथित व्यक्ति इस अधिकरण के आदेश के विरुद्ध 90 दिनों के भीतर सीधे सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर कर सकता है, क्योंकि उच्च न्यायालयों (High Courts) की अधिकारिता इस अधिनियम के तहत वर्जित है। 3. पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) भारत में पहली बार पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के अंतर्गत विधיक रूप से वर्ष 1994 में अधिसूचित किया गया था, और इसके तहत किसी भी नई विकास परियोजना के निर्माण से पहले उसके संभावित पर्यावरणीय प्रभावों का वैज्ञानिक मूल्यांकन करना अनिवार्य होता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग III' के अंतर्गत 'मौलिक अधिकार' (Fundamental Rights - अनुच्छेद 12 से 35) तथा 'संसदीय संप्रभुता एवं न्यायिक सर्वोच्चता' के अंतर्संबंधों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 13(2) के अनुसार राज्य कोई ऐसी विधि नहीं बनाएगा जो भाग III द्वारा प्रदत्त अधिकारों को छीनती है या न्यून करती है, और इस प्रकार बनाई गई प्रत्येक विधि उल्लंघन की मात्रा तक शून्य होगी, जहाँ 'विधि' (Law) शब्द के अंतर्गत केवल संसद या राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित अधिनियम शामिल हैं, तथा इसमें अध्यादेश, उप-विधियाँ, नियम, और रूढ़ियाँ या प्रथाएँ शामिल नहीं हैं। 2. गोलकनाथ वाद (1967) में उच्चतम न्यायालय द्वारा यह निर्णय दिया गया था कि संसद को मौलिक अधिकारों में संशोधन करने की कोई शक्ति प्राप्त नहीं है, क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत किया जाने वाला 'संवैधानिक संशोधन' भी अनुच्छेद 13 के अंतर्गत आने वाली 'विधि' (Law) के ही समान है। 3. केशवानंद भारती वाद (1973) के ऐतिहासिक निर्णय द्वारा गोलकनाथ वाद के निर्णय को पलट दिया गया और यह अभिनिर्धारित किया गया कि संसद को अनुच्छेद 368 के अधीन संविधान के किसी भी हिस्से (मौलिक अधिकारों सहित) में संशोधन करने की शक्ति प्राप्त है, बशर्ते ऐसा कोई भी संशोधन संविधान की 'मूल संरचना' (Basic Structure) का उल्लंघन न करे। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? बुद्ध के जीवन काल में कोसल का राजा कौन था? भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 72' के अंतर्गत 'राष्ट्रपति की क्षमादान की शक्ति' (Pardoning Power of President) के प्रावधानों और उनकी न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. राष्ट्रपति की क्षमादान की शक्ति का विस्तार उन सभी मामलों पर होता है जहाँ दंड या दंडादेश ऐसे विषय के विरुद्ध किसी विधि के तहत दिया गया है जिस पर संघ की कार्यकारी शक्ति का विस्तार होता है, और इसमें सैन्य न्यायालयों (Court Martial) द्वारा दिए गए सभी प्रकार के दंडों के साथ-साथ मृत्युदंड (Death Sentence) को क्षमा करने या उसका लघुकरण करने की अनन्य शक्ति भी शामिल है। 2. राज्यपाल की क्षमादान की शक्ति के विपरीत, राष्ट्रपति संविधान के अनुच्छेद 72 के तहत मृत्युदंड के मामलों में पूर्ण क्षमा (Pardon) प्रदान कर सकता है, और यह शक्ति राज्य के राज्यपाल के पास किसी भी परिस्थिति में उपलब्ध नहीं होती है। 3. सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न ऐतिहासिक निर्णयों (जैसे ईकेरा राम बनाम भारत संघ वाद) के अनुसार, राष्ट्रपति द्वारा क्षमादान की शक्ति का प्रयोग पूरी तरह से उसका व्यक्तिगत और अनंतिम स्वविवेक होता है, और इस शक्ति के प्रयोग को किसी भी उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय में न्यायिक समीक्षा के दायरे में चुनौती नहीं दी जा सकती है, भले ही यह निर्णय दुर्भावनापूर्ण या राजनीतिक कारणों से प्रेरित क्यों न हो। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग XVI' के अंतर्गत 'कुछ वर्गों के संबंध में विशेष उपबंध' (Special Provisions Relating to Certain Classes - Articles 330-342A) से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 330 और 332 के अनुसार लोकसभा तथा राज्यों की विधानसभाओं में अनुसूचित जातियों (SCs) और अनुसूचित जनजातियों (STs) के लिए सीटों का आरक्षण उनकी जनसंख्या के अनुपात के आधार पर किया जाता है, तथा मूल संविधान में यह प्रावधान किया गया था कि यह आरक्षण संविधान के प्रारंभ होने के बाद पचास वर्षों की अवधि के बाद स्वतः समाप्त हो जाएगा। 2. 104वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2019 द्वारा लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए सीटों के आरक्षण की समय-सीमा को बढ़ाकर संविधान के लागू होने से अस्सी (80) वर्ष कर दिया गया है, किंतु इसके साथ ही इस संशोधन द्वारा आंग्ल-भारतीय (Anglo-Indian) समुदाय के सदस्यों के लिए लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में मनोनयन के विशेष प्रावधान को समाप्त कर दिया गया है। 3. अनुच्छेद 338A के अंतर्गत गठित 'राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग' (National Commission for Scheduled Tribes) को एक दीवानी न्यायालय (Civil Court) की शक्तियाँ प्राप्त होती हैं, और इस आयोग की वार्षिक रिपोर्ट को भारत के राष्ट्रपति द्वारा संसद के प्रत्येक सदन के पटल पर रखवाया जाता है, जिसके साथ उस रिपोर्ट पर की गई या जाने वाली कार्रवाई का एक ज्ञापन भी संलग्न होता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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