BaalVikas
Menu

त्वरित लिंक्स

Civil services
3 views

भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग IV' के अंतर्गत 'राज्य के नीति निर्देशक तत्व' (Directive Principles of State Policy - DPSP - अनुच्छेद 36 से 51) तथा उनकी न्यायसंगतता के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. संविधान के अनुच्छेद 37 के अनुसार DPSP देश के शासन में मौलिक हैं और देश के लिए कानून बनाने में इन तत्वों को लागू करना राज्य का कर्तव्य होगा, किंतु ये तत्व किसी भी न्यायालय द्वारा न्यायसंगत (Justiciable) नहीं हैं, अर्थात इन्हें किसी न्यायालय द्वारा प्रवर्तित नहीं कराया जा सकता है।
  2. 2. संविधान में यद्यपि DPSP को गैर-न्यायसंगत बनाया गया है, किंतु सर्वोच्च न्यायालय ने अपने विभिन्न ऐतिहासिक निर्णयों (जैसे मिनर्वा मिल्स वाद, 1980) में यह प्रतिपादित किया है कि मौलिक अधिकारों और नीति निर्देशक तत्वों के बीच संतुलन संविधान की मूल संरचना (Basic Structure) का एक अनिवार्य हिस्सा है, और नीति निर्देशक तत्वों के क्रियान्वयन के लिए बनाए गए कानून को अनुच्छेद 14 या अनुच्छेद 19 के उल्लंघन के आधार पर पूरी तरह असंवैधानिक घोषित नहीं किया जा सकता यदि वह अनुच्छेद 39(b) या (c) के उद्देश्यों को पूरा करता हो।
  3. 3. संविधान के अनुच्छेद 44 के अंतर्गत 'समान नागरिक संहिता' (Uniform Civil Code) का प्रावधान एक ऐसा नीति निर्देशक तत्व है जिसे केवल संसद द्वारा ही पूरे देश के लिए एक साथ अधिनियमित किया जा सकता है, और किसी भी राज्य के विधानमंडल को अपने राज्य क्षेत्र के भीतर समान नागरिक संहिता से संबंधित कोई भी कानून बनाने की संवैधानिक शक्ति प्राप्त नहीं है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 37 में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि इस भाग में अंतर्विष्ट उपबंध किसी भी न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं होंगे, किंतु फिर भी इसमें उल्लिखित तत्व देश के शासन में मौलिक हैं और विधि बनाने में इन तत्वों को लागू करना राज्य का कर्तव्य होगा। कथन 2 सही है: सर्वोच्च न्यायालय ने 'केशवानंद भारती वाद' (1973) और विशेष रूप से 'मिनर्वा मिल्स वाद' (1980) में यह निर्णय दिया कि मौलिक अधिकार और नीति निर्देशक तत्व एक-दूसरे के पूरक हैं और इनके बीच का संतुलन संविधान की मूल संरचना का हिस्सा है। साथ ही, अनुच्छेद 31C के तहत यदि कोई कानून अनुच्छेद 39(b) और (c) में वर्णित सामाजिक-आर्थिक न्याय के सिद्धांतों को लागू करने के लिए बनाया जाता है, तो उसे अनुच्छेद 14 और 19 के आधार पर शून्य घोषित नहीं किया जा सकता। कथन 3 गलत है: संविधान के अनुच्छेद 44 (समान नागरिक संहिता) के अंतर्गत संसद के साथ-साथ राज्य विधानमंडलों को भी समवर्ती सूची (सातवीं अनुसूची की सूची-III, प्रविष्टि 5 'विवाह और तलाक; शिशु और नाबलिग; वसीयत, intestacy और उत्तराधिकार; परिवार के ऐसे सभी मामले जिन पर न्यायिक कार्यवाही के संकलन के समय न्यायिक कानून लागू होता था') के अंतर्गत कानून बनाने की शक्ति प्राप्त है। इसलिए यह कहना गलत है कि राज्य विधानमंडलों को इस पर कानून बनाने की शक्ति प्राप्त नहीं है (गोवा में पहले से ही पुर्तगाली सिविल कोड आधारित पारिवारिक कानून लागू रहा है)। अतः केवल कथन 1 और 2 सही हैं।
Share:

Related Questions

भारतीय इतिहास, कला एवं संस्कृति के संदर्भ में, सल्तनत काल के दौरान प्रशासनिक व्यवस्था और सैन्य सुधारों के अंतर्गत 'इकता प्रणाली' (Iqta System) तथा 'दाग और हुलिया' पद्धति के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. इकता प्रणाली एक प्रकार की भू-राजस्व सम्वर्तन (assignment) व्यवस्था थी, जिसे सुल्तानों द्वारा अपने सैन्य कमांडरों और अधिकारियों को वेतन के रूप में किसी विशेष क्षेत्र से राजस्व एकत्र करने के अधिकार के रूप में प्रदान किया जाता था, और सल्तनत काल के प्रारंभिक चरण में ये इकता पूरी तरह से आनुवंशिक (hereditary) होते थे। 2. अलाउद्दीन खिलजी ने अपनी सेना को अधिक कुशल और अनुशासित बनाने के लिए घोड़ों को दागने की 'दाग' प्रथा और सैनिकों के व्यक्तिगत विवरण दर्ज करने की 'हुलिया' पद्धति की शुरुआत की थी, ताकि घोड़ों की अदला-बदली और फर्जी सैनिकों की भर्ती जैसी कुप्रथाओं को रोका जा सके। 3. सल्तनत काल में 'मुक्ति' या 'वालिया' (Iqtadars) के रूप में जाने जाने वाले इकता धारकों का मुख्य कर्तव्य अपने क्षेत्र से भू-राजस्व एकत्र करना और सुल्तान की आवश्यकता पड़ने पर सैन्य सहायता प्रदान करना था, किंतु उन्हें उस क्षेत्र के किसानों से प्रत्यक्ष रूप से कर निर्धारण करने की कोई कानूनी शक्ति प्राप्त नहीं थी। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? वैदिक काल के संदर्भ में कौन से कथन सत्य हैं: ऋग्वैदिक पशुपालन, उत्तर वैदिक वर्ण व्यवस्था, ऋग्वेद में लोहे का उल्लेख? भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग XV' के अंतर्गत निर्वाचन आयोग और निर्वाचन से संबंधित प्रावधानों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 324 के अनुसार भारत के निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) में एक मुख्य निर्वाचन आयुक्त और उतने ही अन्य निर्वाचन आयुक्त, यदि कोई हों, होते हैं जितने राष्ट्रपति समय-समय पर निर्धारित करते हैं, और मुख्य निर्वाचन आयुक्त को उसके पद से हटाने की प्रक्रिया और आधार सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान ही होते हैं। 2. अन्य निर्वाचन आयुक्तों या क्षेत्रीय आयुक्तों को मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफारिश के बिना राष्ट्रपति द्वारा उनके पद से हटाया जा सकता है, क्योंकि उन्हें मुख्य निर्वाचन आयुक्त के समान संवैधानिक सुरक्षा और महाभियोग जैसी विशेष प्रक्रिया प्राप्त नहीं होती है। 3. वर्ष 1993 में संसद द्वारा बनाए गए एक अधिनियम के माध्यम से निर्वाचन आयोग को एक बहु-सदस्यीय निकाय (Multi-member Body) बना दिया गया, तथा यह भी प्रावधान किया गया कि यदि आयोग के सदस्यों के बीच किसी निर्णय पर मतभेद होता है, तो निर्णय बहुमत के आधार पर लिया जाएगा, जिसमें मुख्य निर्वाचन आयुक्त को वीटो पावर (Veto Power) प्राप्त होती है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 356' के अंतर्गत राष्ट्रपति शासन (President's Rule) और इसके न्यायिक पुनरावलोकन (Judicial Review) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान का अनुच्छेद 356 राज्यपाल की रिपोर्ट पर या अन्यथा राष्ट्रपति को यह संतुष्टि होने पर कि ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई है जिसमें किसी राज्य का सरकार का कामकाज संविधान के प्रावधानों के अनुसार नहीं चलाया जा सकता है, राष्ट्रपति शासन लगाने की शक्ति प्रदान करता है। 2. ऐतिहासिक 'एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994)' वाद में उच्चतम न्यायालय ने यह निर्धारित किया था कि राष्ट्रपति शासन की घोषणा न्यायिक समीक्षा के दायरे से पूरी तरह बाहर है और न्यायालय इस बात की जाँच नहीं कर सकता कि राष्ट्रपति की संतुष्टि वास्तविक रूप से प्रासंगिक सामग्री पर आधारित थी या नहीं। 3. बोम्मई वाद के निर्णय के अनुसार, फ्लोर टेस्ट (Floor Test) यह साबित करने के लिए सबसे उपयुक्त और वस्तुनिष्ठ तरीका है कि संबंधित राज्य के मुख्यमंत्री को विधानसभा का बहुमत प्राप्त है या नहीं, और यदि राज्य सरकार को बहुमत परीक्षण का अवसर दिए बिना बर्खास्त कर दिया जाता है, तो यह असंवैधानिक माना जाएगा। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 148' से 'अनुच्छेद 151' के अंतर्गत 'भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक' (Comptroller and Auditor General of India - CAG) के पद, स्वतंत्रता और उसकी शक्तियों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा अपने हस्ताक्षर और मुद्रा सहित अधिपत्र द्वारा की जाती है, और उसे उसके पद से उसी रीति और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है जो सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने के लिए लागू होते हैं। 2. सीएजी (CAG) का कार्यकाल 6 वर्ष की अवधि या 65 वर्ष की आयु (जो भी पहले हो) तक होता है, और अपने पद से सेवानिवृत्त होने के बाद वह भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन किसी भी अन्य कार्यालय या पद पर पुनः नियुक्ति का पात्र होता है। 3. सीएजी (CAG) न केवल केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के समेकित फंड (Consolidated Funds) से होने वाले सभी खर्चों की लेखा-परीक्षा करता है, बल्कि केंद्र और राज्यों के उन सभी स्वायत्त निकायों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSUs) की भी अनिवार्य रूप से लेखा-परीक्षा करता है जिनके वित्तीय मामलों की जांच संसद या राज्य विधानमंडल द्वारा विधिवत अधिकृत की गई हो। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Log in to add to quiz, bookmark, or report issues.