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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग III' के अंतर्गत प्रदत्त 'समानता के अधिकार' (अनुच्छेद 14 से 18) तथा विधियों के समक्ष समानता एवं विधियों के समान संरक्षण के सिद्धांतों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. 'विधियों के समक्ष समानता' (Equality before the law) का विचार ब्रिटिश मूल की अवधारणा से प्रेरित है, जिसका अर्थ है कि किसी भी व्यक्ति के पक्ष में विशेष विशेषाधिकारों का अभाव तथा देश के सामान्य कानून के प्रति सभी व्यक्तियों की समान अधीनता, चाहे वह साधारण नागरिक हो या कोई उच्च पदाधिकारी।
  2. 2. 'विधियों का समान संरक्षण' (Equal protection of the laws) की अवधारणा अमेरिकी संविधान से ली गई है, जिसका तात्पर्य समान परिस्थितियों वाले व्यक्तियों के बीच समान व्यवहार तथा विधि के अनुप्रयोग में समानों और असमानों के बीच उचित वर्गीकरण (Reasonable Classification) करना है।
  3. 3. अनुच्छेद 14 के अंतर्गत निहित समानता के सिद्धांत के अपवादस्वरूप, भारतीय संविधान का अनुच्छेद 361 राष्ट्रपति और राज्यपालों को उनके कार्यकाल के दौरान उनके द्वारा किए गए किसी भी कृत्य के लिए किसी भी न्यायालय में आपराधिक कार्यवाही से पूर्ण और आजीवन उन्मुक्ति (Immunity) प्रदान करता है, यहाँ तक कि उनके निजी कृत्यों के संबंध में भी उन पर कोई सिविल मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है: 'विधियों के समक्ष समानता' (Equality before the law) मूल रूप से ब्रिटिश विधि शास्त्री ए.वी. डायसी के 'कानून के शासन' (Rule of Law) की अवधारणा से ली गई है। इसका अर्थ है कि किसी भी व्यक्ति को किसी विशेष विशेषाधिकार का लाभ नहीं मिलेगा और सभी वर्ग देश के सामान्य कानून के अधीन होंगे। कथन 2 सही है: 'विधियों का समान संरक्षण' (Equal protection of the laws) अमेरिकी संविधान से लिया गया है। इसका आशय है कि समान परिस्थितियों में रहने वाले लोगों के साथ समान व्यवहार किया जाना चाहिए। इसके तहत कानून के समक्ष समानों और असमानों में उचित वर्गीकरण (Reasonable Classification) की अनुमति है, बशर्ते वह वर्गीकरण मनमाना न हो और उसका एक सुसंगत उद्देश्य हो। कथन 3 गलत है: अनुच्छेद 361 के तहत राष्ट्रपति और राज्यपालों को उनके कार्यकाल के दौरान उनके पद के कर्तव्यों के पालन के लिए व्यापक उन्मुक्तियाँ प्राप्त हैं। उन्हें उनके कार्यकाल के दौरान किसी भी न्यायालय में आपराधिक कार्यवाही (Criminal proceedings) से पूर्ण संरक्षण प्राप्त होता है। हालाँकि, उनके **निजी कृत्यों (Personal acts)** के संबंध में उन्हें कार्यकाल के दौरान सिविल कार्यवाही (Civil proceedings) से छूट जरूर मिलती है, किंतु इसके लिए दो महीने का पूर्व नोटिस देना अनिवार्य होता है और कार्यकाल के बाद निजी कृत्यों के लिए उन पर विधिक कार्रवाई की जा सकती है, इसे 'आजीवन आपराधिक और सिविल उन्मुक्ति' नहीं कहा जा सकता क्योंकि आपराधिक मामलों में भी पद छोड़ने के बाद उचित प्रक्रिया के तहत कार्रवाई की जा सकती है।
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