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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 72' के अंतर्गत राष्ट्रपति की क्षमादान की शक्ति (Pardoning Power) तथा इसके न्यायिक अर्थघटन के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. संविधान के अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति को किसी ऐसे विषय से संबंधित विधि के विरुद्ध किसी अपराध के लिए दोषी ठहराए गए व्यक्ति के दंड को क्षमा करने, उसका प्रविलंबन, विराम या परिहार करने की शक्ति प्राप्त है जिस विषय तक संघ की कार्यकारी शक्ति का विस्तार होता है, और इसमें न्यायालय द्वारा दी गई सैन्य अदालत (Court Martial) की सजा भी शामिल है।
  2. 2. राज्यपाल की क्षमादान शक्ति (अनुच्छेद 161) के विपरीत, राष्ट्रपति को मृत्युदंड (Death Sentence) के मामलों में उसे पूर्ण रूप से क्षमा (Pardon) करने की अनन्य संवैधानिक शक्ति प्राप्त है, तथा संविधान में यह स्पष्ट रूप से उपबंधित है कि राष्ट्रपति को अपनी इस शक्ति का प्रयोग करते समय प्रत्येक मामले में केंद्रीय मंत्रिमंडल की लिखित सलाह के विरुद्ध जाने का कोई अधिकार नहीं है।
  3. 3. 'ईपुरु सुधाकर बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (2006)' और अन्य मामलों में उच्चतम न्यायालय ने यह निर्धारित किया है कि राष्ट्रपति द्वारा क्षमादान की शक्ति का प्रयोग कोई विशुद्ध रूप से दया की भीख (Grace) नहीं है, बल्कि यह एक संवैधानिक कर्तव्य है जिसका प्रयोग न्यायसंगत (Justiciable) आधारों पर किया जा सकता है, और यदि यह निर्णय दुर्भावनापूर्ण, मनमाना या अप्रासंगिक विचारों पर आधारित पाया जाता है, तो न्यायालय द्वारा इसकी न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) की जा सकती है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है: संविधान के अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति को ऐसे किसी अपराध के लिए दोषी ठहराए गए व्यक्ति को क्षमा, प्रविलंबन, विराम या परिहार करने की शक्ति है, जहाँ तक संघ की कार्यकारी शक्ति का विस्तार होता है। इसके अंतर्गत सैन्य न्यायालयों (Court Martial) द्वारा दी गई सजाओं के मामलों में भी राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति का विस्तार होता है, जो राज्यपाल की शक्ति (अनुच्छेद 161) के अंतर्गत नहीं आता है। कथन 2 गलत है: यद्यपि राष्ट्रपति के पास मृत्युदंड के मामलों में पूर्ण क्षमादान देने की शक्ति है (जो राज्यपाल के पास नहीं है), किंतु यह कहना गलत है कि राष्ट्रपति केंद्रीय मंत्रिमंडल की लिखित सलाह के विरुद्ध नहीं जा सकते। सामान्यतः राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य करते हैं, किंतु वे पुनर्विचार के लिए मामला वापस भेज सकते हैं और कुछ मामलों में स्वविवेक का प्रयोग भी कर सकते हैं, हालांकि व्यावहारिक रूप से यह सलाह पर आधारित होता है। मुख्य त्रुटि यह है कि संविधान में ऐसा कोई कठोर प्रतिबंध निरपेक्ष रूप से नहीं है कि राष्ट्रपति मंत्रिमंडल की सलाह के खिलाफ कभी कोई कदम ही नहीं उठा सकते, तथा यह न्यायिक समीक्षा के दायरे में भी आता है। कथन 3 सही है: 'ईपुरु सुधाकर बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (2006)' मामले में उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति या राज्यपाल द्वारा क्षमादान की शक्तियों का प्रयोग कोई मात्र कृपा (grace) नहीं है, बल्कि यह एक संवैधानिक शक्ति है जिसका प्रयोग निष्पक्ष रूप से होना चाहिए। यदि यह शक्ति दुर्भावनापूर्ण, मनमाने ढंग से, किसी धर्म/जाति के आधार पर भेदभाव करते हुए या अप्रासंगिक विचारों पर आधारित पाई जाती है, तो सर्वोच्च न्यायालय अनुच्छेद 32 के तहत इसकी न्यायिक समीक्षा कर सकता है।
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