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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग XV' (निर्वाचन - अनुच्छेद 324 से 329क) तथा राजनीतिक दलों के पंजीकरण एवं दलबदल विरोधी कानून (अनुच्छेद 102(2) और 191(2), एवं दसवीं अनुसूची) के प्रावधानों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29क के तहत भारत के निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) को राजनीतिक दलों के पंजीकरण की शक्ति प्रदान की गई है, किंतु निर्वाचन आयोग को यह वैधानिक अधिकार प्राप्त नहीं है कि वह किसी पंजीकृत राजनीतिक दल को उसके द्वारा आंतरिक लोकतंत्र का पालन न किए जाने या अपने संविधान में संशोधन करने के बाद उसे समय पर सूचित न करने पर उसकी मान्यता को रद्द (De-register) कर सके।
- 2. संविधान की दसवीं अनुसूची के अंतर्गत 'दलबदल' (Defection) के आधार पर संसद या राज्य विधानमंडल के किसी सदस्य की अयोग्यता का प्रश्न यदि उठता है, तो उस सदन के सभापति या अध्यक्ष (Chairman or Speaker) का निर्णय अंतिम होता है, और सर्वोच्च न्यायालय ने अपने ऐतिहासिक निर्णय (किहोटो होलोहन मामला, 1992) में यह स्पष्ट किया था कि पीठासीन अधिकारी का यह निर्णय न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के दायरे से पूरी तरह बाहर है और इसे किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है।
- 3. यदि लोकसभा या राज्य विधानसभा का कोई निर्वाचित सदस्य किसी राजनीतिक दल का सदस्य है और वह स्वेच्छा से उस राजनीतिक दल की सदस्यता छोड़ देता है या सदन में अपने दल के व्हिप (Whip) के विपरीत मतदान करता है तथा उसके इस आचरण को संबंधित राजनीतिक दल द्वारा पंद्रह दिनों के भीतर क्षमा नहीं किया जाता है, तो वह सदन की सदस्यता के लिए अयोग्य हो जाएगा।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 गलत है: यद्यपि लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29क निर्वाचन आयोग को राजनीतिक दलों के पंजीकरण की शक्ति देती है, सर्वोच्च न्यायालय ने 'इंडियन नेशनल कांग्रेस बनाम इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल वेलफेयर' (2002) मामले में यह स्पष्ट किया था कि निर्वाचन आयोग के पास किसी दल द्वारा धोखाधड़ी से पंजीकरण कराने, आंतरिक संविधान का पालन न करने या वैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन करने पर उसका पंजीकरण रद्द (De-register) करने की शक्ति निहित है (यदि उसने दल-बदल या असंवैधानिक तरीकों से पंजीकरण प्राप्त किया हो)। हालांकि, राजनीतिक दलों की मान्यता (Recognition as National/State parties) और उनके चुनाव चिह्नों का आवंटन 'चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968' के तहत विनियमित होता है।
कथन 2 गलत है: किहोटो होलोहन बनाम जाचिलू (1992) के ऐतिहासिक मामले में सर्वोच्च न्यायालय की सात-सदस्यीय संविधान पीठ ने दसवीं अनुसूची के पैराग्राफ 7 को असंवैधानिक घोषित करके रद्द कर दिया था (क्योंकि इसके लिए अनुच्छेद 368 के तहत राज्यों के अनुसमर्थन की आवश्यकता थी), और यह निर्णय दिया था कि पीठासीन अधिकारी (अध्यक्ष/सभापति) का निर्णय न्यायिक समीक्षा के अधीन है। न्यायालय ने कहा कि अध्यक्ष एक न्यायाधिकरण (Tribunal) के रूप में कार्य करता है और उसके निर्णय की न्यायिक समीक्षा उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा की जा सकती है।
कथन 3 गलत है: दसवीं अनुसूची के अनुसार, यदि कोई निर्वाचित सदस्य स्वेच्छा से अपनी राजनीतिक दल की सदस्यता छोड़ देता है या सदन में अपने दल के निर्देशों (Whip) के विरुद्ध मतदान करता है या मतदान से अनुपस्थित रहता है (और पार्टी द्वारा 15 दिनों के भीतर उसकी इस हरकत को क्षमा/माफ - Condoned नहीं किया जाता है), तो वह अयोग्य हो जाता है। हालाँकि, कथन में यह दर्शाया गया है कि 'पंद्रह दिनों के भीतर क्षमा करने' का प्रावधान व्हिप के उल्लंघन के मामले में स्वचालित रूप से लागू होता है, जबकि दलबदल विरोधी कानून के तहत दल द्वारा क्षमा करने की यह अवधि और प्रक्रिया के नियम अलग हैं तथा इसमें केवल 15 दिन की समयसीमा का ऐसा सामान्य अपवाद इस रूप में परिभाषित नहीं है कि दल की अनुमति से अयोग्यता स्वतः समाप्त हो जाए यदि दल माफ़ न करे (वास्तव में, यदि पार्टी 15 दिनों के भीतर पूर्व अनुमति या बाद में समर्थन न दे, तो अयोग्यता लागू होती है)। अधिक स्पष्ट रूप से, कथन 1, 2 और 3 तीनों में तथ्यात्मक और कानूनी विसंगतियाँ हैं, इसलिए सही उत्तर 'कोई भी नहीं' (d) है।
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भारतीय राजव्यवस्था और संसद की विधायी प्रक्रिया के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 108' के अंतर्गत संसद के दोनों सदनों की 'संयुक्त बैठक' (Joint Sitting) के प्रावधानों और उसकी सीमाओं के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राष्ट्रपति द्वारा संयुक्त बैठक बुलाए जाने का निर्णय किसी साधारण विधेयक या वित्तीय विधेयक (श्रेणी-I) के संबंध में तब लिया जा सकता है जब विधेयक को दूसरे सदन द्वारा अस्वीकार कर दिया गया हो या विधेयक में किए जाने वाले संशोधनों पर दोनों सदन अंतिम रूप से असहमत हो गए हों।
2. संविधान के अनुसार, 'धन विधेयक' (Money Bill) और 'संविधान संशोधन विधेयक' (Constitutional Amendment Bill) के मामलों में दोनों सदनों की संयुक्त बैठक बुलाने का कोई प्रावधान नहीं है।
3. संयुक्त बैठक की अध्यक्षता अनिवार्य रूप से लोकसभा अध्यक्ष द्वारा की जाती है, और यदि लोकसभा अध्यक्ष अनुपस्थित हैं, तो लोकसभा का उपाध्यक्ष इसकी अध्यक्षता करता है, किंतु दोनों के अनुपस्थित होने पर राज्यसभा के सभापति (उपराष्ट्रपति) को संयुक्त बैठक की अध्यक्षता करने का पूर्ण अधिकार होता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग IV' के अंतर्गत 'राज्य के नीति निर्देशक तत्व' (Directive Principles of State Policy - अनुच्छेद 36 से 51) तथा 'समान नागरिक संहिता' (Uniform Civil Code - अनुच्छेद 44) के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 44 के अनुसार राज्य, भारत के पूरे राज्यक्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता (UCC) को सुरक्षित करने का प्रयास करेगा, और यह प्रावधान एक न्यायोचित (Justiciable) अधिकार है जिसे लागू कराने के लिए कोई भी नागरिक सीधे सर्वोच्च न्यायालय का रुख कर सकता है।
2. गोवा एकमात्र ऐसा राज्य है जहाँ पुर्तगाली सिविल कोड, 1867 (Portuguese Civil Code) के रूप में एक समान नागरिक संहिता पहले से ही लागू है, जो धार्मिक संप्रदायों के आधार पर व्यक्तिगत कानूनों (Personal Laws) में अंतर किए बिना सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू होता है।
3. नीति निर्देशक तत्वों के अंतर्गत आने वाले प्रावधानों में से कुछ को समय-समय पर विभिन्न संविधान संशोधनों के माध्यम से जोड़ा गया है, किंतु अनुच्छेद 44 (समान नागरिक संहिता) मूल संविधान में ही नीति निर्देशक तत्वों के भाग के रूप में निहित था, जिसे किसी भी संशोधन द्वारा नहीं जोड़ा गया है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता किस अनुच्छेद में है?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 356' के अंतर्गत 'राष्ट्रपति शासन' (President's Rule) और उससे संबंधित 'एस.आर. बोम्मई वाद (1994)' के ऐतिहासिक निर्णय के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राष्ट्रपति शासन की घोषणा के लिए यह अनिवार्य है कि राज्य के राज्यपाल द्वारा एक औपचारिक लिखित रिपोर्ट भेजी जाए, और यदि राज्यपाल ऐसी रिपोर्ट नहीं भेजता है, तो राष्ट्रपति अपने स्वविवेक से या किसी अन्य सूचना के आधार पर उस राज्य में संवैधानिक तंत्र के विफल होने की घोषणा नहीं कर सकता है।
2. एस.आर. बोम्मई वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि राज्य सरकार के बहुमत का परीक्षण (Floor Test) राज्यपाल के राजभवन में नहीं, बल्कि राज्य की विधानसभा के पटल पर होना चाहिए, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि सरकार के पास बहुमत है या नहीं।
3. राष्ट्रपति द्वारा अनुच्छेद 356 के तहत की गई उद्घोषणा न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के दायरे से पूर्णतः बाहर है, क्योंकि यह राष्ट्रपति का एक विशुद्ध राजनीतिक और संप्रभु निर्णय होता है, जिसमें अदालतें दखल नहीं दे सकती हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 352' के अंतर्गत 'राष्ट्रीय आपातकाल' (National Emergency) की उद्घोषणा और '44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978' द्वारा किए गए परिवर्तनों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मूल संविधान में राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा का एक आधार 'आंतरिक अशांति' (Internal Disturbance) भी था, जिसे 44वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा प्रतिस्थापित करके 'सशस्त्र विद्रोह' (Armed Rebellion) कर दिया गया था।
2. राष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणा तभी की जा सकती है जब मंत्रिमंडल (Cabinet) लिखित रूप में अपना ऐसा विनिश्चय राष्ट्रपति को संसूचित करता है, और इस उद्घोषणा को संसद के दोनों सदनों द्वारा इसकी जारी होने की तारीख से एक माह के भीतर विशेष बहुमत द्वारा अनुमोदित किया जाना अनिवार्य है।
3. राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकार स्वतः ही निलंबित हो जाते हैं, चाहे आपातकाल की घोषणा युद्ध, बाह्य आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह में से किसी भी आधार पर की गई हो।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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