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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग XVI' (कुछ वर्गों से संबंधित विशेष उपबंध - अनुच्छेद 330 से 342A) के अंतर्गत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जातियों (SCs) और अनुसूचित जनजातियों (STs) के लिए स्थानों के आरक्षण से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. संविधान के मूल पाठ में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में SCs और STs के लिए सीटों का आरक्षण केवल दस वर्षों की अवधि के लिए (अर्थात 1960 तक) उपबंधित किया गया था, किंतु संसद द्वारा समय-समय पर संविधान संशोधन अधिनियमों के माध्यम से इस अवधि को आगे बढ़ाया जाता रहा है, और नवीनतम '104वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2019' द्वारा इसे बढ़ाकर 25 जनवरी 2030 तक कर दिया गया है।
  2. 2. लोकसभा में किसी राज्य या संघ राज्यक्षेत्र के निर्वाचन क्षेत्रों से अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए स्थानों का आरक्षण, उस राज्य या संघ राज्यक्षेत्र में कुल जनसंख्या के साथ उस राज्य या संघ राज्यक्षेत्र की अनुसूचित जातियों या अनुसूचित जनजातियों की जनसंख्या के अनुपात के आधार पर निर्धारित किया जाता है।
  3. 3. 104वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2019 के माध्यम से लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में आंग्ल-भारतीय (Anglo-Indian) समुदाय के सदस्यों के लिए मनोनीत किए जाने वाले विशेष स्थानों के आरक्षण को समाप्त कर दिया गया है, क्योंकि 2011 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार इस समुदाय की जनसंख्या देश में नगण्य पाई गई थी।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है: संविधान के अनुच्छेद 334 के मूल प्रावधान के अनुसार, लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में SCs और STs के लिए आरक्षण केवल 10 वर्षों के लिए था। इसे लगातार संशोधनों द्वारा बढ़ाया गया है, और नवीनतम 104वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2019 के द्वारा इस अवधि को 26 जनवरी 2020 से बढ़ाकर 25 जनवरी 2030 कर दिया गया है। कथन 2 सही है: संविधान के अनुच्छेद 330 (लोकसभा के संबंध में) और अनुच्छेद 332 (विधानसभाओं के संबंध में) के अनुसार, SCs और STs के लिए सीटों का आवंटन राज्य या क्षेत्र की कुल जनसंख्या में उनकी जनसंख्या के अनुपात के आधार पर ही तय किया जाता है। कथन 3 गलत है: 104वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2019 द्वारा आंग्ल-भारतीय (Anglo-Indian) समुदाय के आरक्षण को समाप्त तो अवश्य किया गया है, किंतु इसका कारण 'जनगणना के आंकड़े' नहीं बल्कि यह था कि सरकार के पास उपलब्ध आंकड़ों और तर्कों के अनुसार इस समुदाय का पर्याप्त प्रतिनिधित्व और एकीकरण समाज की मुख्यधारा में हो चुका था, तथा विधायी निकायों में उनके लिए विशेष मनोनयन की आवश्यकता अब नहीं रह गई थी। अतः कथन 3 में दिया गया कारण आंशिक रूप से गलत है।
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