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भारतीय पर्यावरण, पारिस्थितिकी और जैव विविधता के संदर्भ में, 'राष्ट्रीय हरित अधिकरण' (National Green Tribunal - NGT) से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) की स्थापना राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के अंतर्गत पर्यावरण संरक्षण, वनों और अन्य प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से संबंधित कानूनी अधिकारों के प्रभावी और तीव्र प्रवर्तन के लिए की गई है, तथा यह दीवानी प्रक्रिया संहिता, 1908 के सिविल न्यायालयों की कठोर प्रक्रिया से बंधा हुआ नहीं है, बल्कि यह 'प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों' (Principles of Natural Justice) द्वारा निर्देशित होता है।
- 2. NGT अधिनियम के तहत अधिकरण के आदेश या निर्णय से व्यथित कोई भी व्यक्ति सर्वोच्च न्यायालय में प्रत्यक्ष अपील (Direct Appeal) दाखिल कर सकता है, क्योंकि NGT के निर्णयों के विरुद्ध उच्च न्यायालयों (High Courts) की रिट अधिकारिता (Writ Jurisdiction) पूरी तरह से समाप्त कर दी गई है।
- 3. राष्ट्रीय हरित अधिकरण को भारत के संविधान के अंतर्गत पर्यावरण संरक्षण से जुड़े मामलों के अतिरिक्त 'वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972' और 'अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006' (FRA) के अंतर्गत आने वाले मामलों पर सुनवाई करने की अधिकारिता (Jurisdiction) स्पष्ट रूप से प्रदान नहीं की गई है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) की स्थापना राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के तहत पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से जुड़े मामलों के त्वरित निपटारे के लिए की गई है। अधिनियम की धारा 19(1) के अनुसार, NGT दीवानी प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) की प्रक्रियाओं से बाध्य नहीं है, बल्कि यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुसार कार्य करता है। कथन 2 गलत है: NGT अधिनियम, 2010 की धारा 22 के अनुसार, NGT के आदेश या निर्णय से व्यथित कोई भी व्यक्ति **उच्चतम न्यायालय (Supreme Court)** में अपील कर सकता है (न कि सीधे उच्च न्यायालय में, यद्यपि NGT के निर्णयों पर उच्च न्यायालयों की अनुच्छेद 226 के तहत रिट अधिकारिता संवैधानिक प्रावधान होने के कारण पूरी तरह समाप्त नहीं की जा सकती, जैसा कि विभिन्न न्यायिक दृष्टांतों में स्पष्ट किया गया है, लेकिन NGT के आदेश के खिलाफ वैधानिक अपील सीधे सुप्रीम कोर्ट में ही होती है)। कथन 3 गलत है क्योंकि राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 की अनुसूची I (Schedule I) में उल्लिखित 7 प्रमुख पर्यावरण कानूनों के तहत मामले सुने जाते हैं, जिसमें 'वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972' और 'अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006' को इस अधिनियम की अनुसूची से बाहर रखा गया था (यानी NGT को सीधे तौर पर वन्यजीव संरक्षण अधिनियम और FRA के मामलों की सुनवाई की वैधानिक अधिकारिता प्राप्त नहीं है; हालांकि कथन 3 में कहा गया है कि 'प्रदान नहीं की गई है', लेकिन यह कथन 3 की भाषा और अन्य तकनीकी पक्षों के कारण भ्रामक हो सकता है - आइए देखें: NGT अधिनियम की अनुसूची में वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन एक्ट और FRA शामिल नहीं हैं, अतः NGT को इनकी अधिकारिता नहीं है। फिर भी, कथन 2 में प्रत्यक्ष अपील सर्वोच्च न्यायालय में होती है और उच्च न्यायालयों की रिट अधिकारिता पूरी तरह समाप्त नहीं होती। समग्र रूप से केवल कथन 1 ही सही है)।
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भारतीय इतिहास और राष्ट्रीय आंदोलन के संदर्भ में, वर्ष 1907 के 'सूरत अधिवेशन' (Surat Session) और कांग्रेस के विभाजन के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. सूरत अधिवेशन में कांग्रेस के अध्यक्ष पद के लिए नरम दल (Moderates) ने रास बिहारी घोष के नाम का प्रस्ताव रखा था, जबकि गर्म दल (Extremists) द्वारा लाला लाजपत राय को इस पद के लिए अध्यक्ष बनाने का समर्थन किया जा रहा था।
2. कांग्रेस का यह विभाजन ब्रिटिश सरकार द्वारा अपनाई गई 'फूट डालो और राज करो' की नीति का प्रत्यक्ष परिणाम था, क्योंकि ब्रिटिश अधिकारियों ने गुप्त रूप से नरम दल के नेताओं को उग्रवादियों के पूर्ण बहिष्कार के लिए उकसाया था।
3. सूरत अधिवेशन के पश्चात कांग्रेस के दोनों गुटों के बीच वैचारिक मतभेद इतने बढ़ गए थे कि आगामी नौ वर्षों तक गर्म दल के नेताओं को कांग्रेस संगठन से पूरी तरह निष्कासित रखा गया, और वे वर्ष 1916 के लखनऊ अधिवेशन के बाद ही पुनः कांग्रेस में शामिल हो सके।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय अर्थव्यवस्था और सामाजिक विकास के संदर्भ में, 'सतत विकास लक्ष्य' (Sustainable Development Goals - SDGs) और उनके कार्यान्वयन के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. सतत विकास लक्ष्य (SDGs) वर्ष 2015 में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 'एजेंडा 2030' के एक भाग के रूप में अपनाए गए थे, जिसमें वर्ष 2030 तक प्राप्त किए जाने वाले कुल 17 वैश्विक लक्ष्य और 169 मात्रात्मक एवं गुणात्मक लक्ष्य (Targets) शामिल हैं, और ये लक्ष्य कानूनी रूप से बाल्टी (Legally Binding) प्रकृति के हैं।
2. भारत में सतत विकास लक्ष्यों के राष्ट्रीय स्तर पर समन्वय, निगरानी और प्रगति के आकलन के लिए 'नीति आयोग' (NITI Aayog) नोडल संस्था है, जो नियमित रूप से 'SDG इंडिया इंडेक्स' जारी करती है, जिसमें राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय मापदंडों के आधार पर रैंक किया जाता है।
3. सतत विकास लक्ष्य 1 (SDG 1) 'गरीबी के सभी रूपों को हर जगह समाप्त करना' से संबंधित है, जबकि लक्ष्य 13 (SDG 13) जलवायु परिवर्तन और उसके प्रभावों से निपटने के लिए तत्काल कार्रवाई करने का आह्वान करता है, तथापि इन लक्ष्यों के वित्तपोषण की पूरी जिम्मेदारी केवल विकसित देशों की है, विकासशील देशों की इसमें कोई घरेलू वित्तीय प्रतिबद्धता नहीं है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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पशुजन्य युद्ध अभ्यास (PYA) Mock Drill का आयोजन कहाँ किया गया?
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किस सुल्तान ने अपनी राजधानी दिल्ली से दौलताबाद स्थानांतरित करने का असफल प्रयास किया था?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 161' के अंतर्गत राज्यपाल की 'क्षमादान की शक्ति' (Pardoning Power) तथा इससे संबंधित न्यायिक निर्णयों और प्रावधानों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत राज्य के राज्यपाल को उस विषय से संबंधित, जिसके संबंध में राज्य की कार्यकारी शक्ति का विस्तार है, किसी विधि के विरुद्ध किसी अपराध के लिए दोषी ठहराए गए किसी व्यक्ति के दंडादेश को क्षमा, प्रविलंबन, विराम या परिहार करने अथवा दंडादेश का निलंबन, परिहार या लघुकरण करने की शक्ति प्राप्त है, किंतु राज्यपाल को मृत्युदंड (Death Sentence) को पूरी तरह से माफ करने या क्षमा (Pardon) देने की संवैधानिक शक्ति प्राप्त नहीं है।
2. 'मरु राम बनाम भारत संघ (1980)' और 'एतवा उरांव बनाम झारखंड राज्य' मामलों में उच्चतम न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि राज्यपाल की क्षमादान की शक्ति का प्रयोग राज्य मंत्रिपरिषद की सलाह के अनुसार ही किया जाना अनिवार्य है, और यह शक्ति न्यायोचित (Justiciable) है, अर्थात् यदि इसका प्रयोग दुर्भावनापूर्ण, राजनीतिक पूर्वाग्रह या असंगत आधारों पर किया जाता है, तो न्यायालय द्वारा इसकी न्यायिक समीक्षा की जा सकती है।
3. 'श्रीहरन उर्फ मुरुगन बनाम भारत संघ (2016)' मामले में सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने यह व्यवस्था दी थी कि यदि किसी मामले में केंद्र सरकार के कानूनों (जैसे IPC या ताज़ा BNS या विशेष केंद्रीय कानून) के तहत अपराध हुआ है और दंडादेश दिया गया है, तो उस स्थिति में राज्य के राज्यपाल के पास अनुच्छेद 161 के अंतर्गत क्षमादान देने की अनन्य शक्ति होती है, भले ही उस मामले में अंतिम अपील सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तय की गई हो।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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