BaalVikas
Menu

त्वरित लिंक्स

Civil services
5 views

भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 161' के अंतर्गत राज्यपाल की 'क्षमादान की शक्ति' (Pardoning Power) तथा इससे संबंधित न्यायिक निर्णयों और प्रावधानों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत राज्य के राज्यपाल को उस विषय से संबंधित, जिसके संबंध में राज्य की कार्यकारी शक्ति का विस्तार है, किसी विधि के विरुद्ध किसी अपराध के लिए दोषी ठहराए गए किसी व्यक्ति के दंडादेश को क्षमा, प्रविलंबन, विराम या परिहार करने अथवा दंडादेश का निलंबन, परिहार या लघुकरण करने की शक्ति प्राप्त है, किंतु राज्यपाल को मृत्युदंड (Death Sentence) को पूरी तरह से माफ करने या क्षमा (Pardon) देने की संवैधानिक शक्ति प्राप्त नहीं है।
  2. 2. 'मरु राम बनाम भारत संघ (1980)' और 'एतवा उरांव बनाम झारखंड राज्य' मामलों में उच्चतम न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि राज्यपाल की क्षमादान की शक्ति का प्रयोग राज्य मंत्रिपरिषद की सलाह के अनुसार ही किया जाना अनिवार्य है, और यह शक्ति न्यायोचित (Justiciable) है, अर्थात् यदि इसका प्रयोग दुर्भावनापूर्ण, राजनीतिक पूर्वाग्रह या असंगत आधारों पर किया जाता है, तो न्यायालय द्वारा इसकी न्यायिक समीक्षा की जा सकती है।
  3. 3. 'श्रीहरन उर्फ मुरुगन बनाम भारत संघ (2016)' मामले में सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने यह व्यवस्था दी थी कि यदि किसी मामले में केंद्र सरकार के कानूनों (जैसे IPC या ताज़ा BNS या विशेष केंद्रीय कानून) के तहत अपराध हुआ है और दंडादेश दिया गया है, तो उस स्थिति में राज्य के राज्यपाल के पास अनुच्छेद 161 के अंतर्गत क्षमादान देने की अनन्य शक्ति होती है, भले ही उस मामले में अंतिम अपील सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तय की गई हो।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 गलत है: संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत राज्यपाल को राज्य सूची और समवर्ती सूची (जहाँ राज्य की कार्यकारी शक्ति का विस्तार है) के विषयों से संबंधित विधियों के विरुद्ध दिए गए दंडों के मामले में क्षमा, प्रविलंबन, विराम, परिहार, निलंबन या लघुकरण की शक्ति प्राप्त है। हालाँकि, सर्वोच्च न्यायालय (जैसे 'केहर सिंह' और 'मार्तंड राव' मामलों में) यह स्पष्ट कर चुका है कि राष्ट्रपति और राज्यपाल दोनों की क्षमादान शक्तियों में सैद्धांतिक अंतर केवल 'मृत्युदंड' और 'सेना न्यायालय के दंड' के संबंध में है—राज्यपाल मृत्युदंड को 'क्षमा' (Pardon) नहीं कर सकते (यह शक्ति केवल राष्ट्रपति के पास अनुच्छेद 72 के तहत है), किंतु राज्यपाल मृत्युदंड के मामलों में भी अन्य विकल्पों जैसे कि निलंबन, परिहार या लघुकरण का प्रयोग कर सकते हैं। इसके अलावा, राज्यपाल को मृत्युदंड के पूर्ण क्षमादान का अधिकार न होना इस कथन को सही नहीं ठहराता क्योंकि राज्यपाल मृत्युदंड को छोड़कर अन्य सभी प्रकार के दंडादेशों को क्षमा कर सकते हैं, लेकिन मृत्युदंड के मामले में पूर्ण क्षमा का अधिकार राष्ट्रपति के पास ही अनन्य रूप से है। कथन 2 सही है: 'मरु राम बनाम भारत संघ (1980)' और बाद के कई मामलों में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि अनुच्छेद 72 और अनुच्छेद 161 के तहत शक्तियों का प्रयोग राष्ट्रपति और राज्यपाल द्वारा अपने वैयक्तिक स्वविवेक से नहीं, बल्कि संबंधित मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह के आधार पर किया जाता है। साथ ही, यह भी निर्धारित किया गया है कि यदि क्षमादान शक्ति का प्रयोग दुर्भावनापूर्ण, मनमाने ढंग से, किसी अप्रासंगिक आधार पर या भेदभावपूर्ण तरीके से किया जाता है, तो यह न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के दायरे में आता है और न्यायालय इसे रद्द कर सकता है। कथन 3 गलत है: 'श्रीहरन उर्फ मुरुगन बनाम भारत संघ (2016)' (और इससे पूर्व 'धर्मेंद्र सिंह' मामले) में सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने यह स्पष्ट किया था कि यदि किसी मामले में अपराध केंद्र सरकार के किसी कानून के तहत किया गया है या मामले की जाँच सीबीआई (CBI) जैसी केंद्रीय एजेंसी द्वारा की गई है, अथवा जहाँ दंडादेश सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिया गया है, वहाँ राज्यपाल की तुलना में राष्ट्रपति की शक्ति प्रभावी होती है। विशेष रूप से, जहाँ केंद्र सूची के विषयों या विशेष कानूनों से जुड़े मामले होते हैं, वहाँ राज्य सरकार या राज्यपाल की शक्ति सीमित होती है और धारा 432/433CrPC (या नए कानून) के तहत भी समुचित सरकार (Appropriate Government) का निर्धारण केंद्रीय मामलों में केंद्र सरकार होती है, न कि राज्य का राज्यपाल।
Share:

Related Questions

भारतीय पर्यावरण, पारिस्थितिकी और जैव विविधता के संदर्भ में, 'रामसर अभीसमय' (Ramsar Convention) और भारत में 'आर्द्रभूमियों' (Wetlands) के संरक्षण से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. रामसर अभीसमय वर्ष 1971 में ईरान के रामसर शहर में हस्ताक्षरित एक अंतर-सरकारी संधि है, जो आर्द्रभूमियों के संरक्षण और उनके संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग (Wise use) के लिए एक राष्ट्रीय कार्रवाई और अंतरराष्ट्रीय सहयोग का फ्रेमवर्क प्रदान करती है, तथा यह जैविक विविधता सम्मेलन (CBD) के अंतर्गत औपचारिक रूप से संचालित होती है। 2. 'अंतर्राष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमि' (Ramsar Sites) की सूची में किसी स्थल को शामिल करने के लिए यह आवश्यक है कि वह स्थल जलपक्षियों (Waterbirds) के लिए वर्ष के किसी भी समय 20,000 या उससे अधिक पक्षियों को आश्रय देता हो, या पक्षियों की किसी प्रजाति या उप-जाति की वैश्विक आबादी के कम-से-कम 1% भाग को नियमित रूप से अपने यहाँ धारण करता हो। 3. 'मॉन्ट्रो रिकॉर्ड' (Montreux Record) रामसर सूची के अंतर्गत आने वाले ऐसे आर्द्रभूमि स्थलों का एक रजिस्टर है जहाँ पारिस्थितिकीय परिवर्तन, तकनीकी विकास या मानवीय हस्तक्षेप के परिणामस्वरूप पर्यावरणीय संकट उत्पन्न हो गया है या उत्पन्न होने की संभावना है, और वर्तमान में भारत की चिल्का झील और केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान दोनों इसी रिकॉर्ड के अंतर्गत सूचीबद्ध हैं। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग XIV' के अंतर्गत 'संघ और राज्यों के अधीन सेवाएँ' (Services Under the Union and the States - अनुच्छेद 308 से 323) तथा 'अखिल भारतीय सेवाएँ' (All-India Services) के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 312 के अनुसार राज्य सभा यदि उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत से कोई संकल्प पारित कर दे कि राष्ट्रीय हित में यह आवश्यक या समीचीन है, तो संसद विधि द्वारा अखिल भारतीय सेवाओं (जिनमें भारतीय प्रशासनिक सेवा, भारतीय पुलिस सेवा और भारतीय वन सेवा शामिल हैं) का सृजन कर सकती है। 2. भारतीय वन सेवा (Indian Forest Service - IFS) को मूल संविधान में एक अखिल भारतीय सेवा के रूप में शामिल किया गया था, जबकि 'भारतीय वन अधिनियम, 1927' के तहत इसे संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया था। 3. अखिल भारतीय सेवाओं के सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, किंतु वे केंद्र और राज्य दोनों सरकारों के अधीन कार्य करते हैं और उनका नियंत्रण तथा अनुशासनात्मक अधिकार पूरी तरह से संबंधित राज्य सरकार के पास होता है, जिसमें केंद्र सरकार का कोई हस्तक्षेप नहीं होता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? भारतीय अर्थव्यवस्था और सतत विकास के संदर्भ में, 'राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम' (NCAP) और उससे संबंधित रणनीतिक पहलों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) को पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) द्वारा वर्ष 2019 में देश भर के सभी शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में वायु प्रदूषण के स्तर को कम करने के लिए एक दीर्घकालिक, समयबद्ध राष्ट्रीय रणनीति के रूप में शुरू किया गया था। 2. इस कार्यक्रम का प्रारंभिक लक्ष्य वर्ष 2024 तक देश के चयनित गैर-प्राप्ति शहरों (Non-attainment Cities) में पार्टिकुलेट मैटर (PM10 और PM2.5 दोनों) सांद्रता में वर्ष 2017 के आधार स्तर (Base Year) की तुलना में 20% से 30% तक की कमी लाना था, जिसे बाद में संशोधित करके वर्ष 2026 तक 40% तक की कमी लाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। 3. 'गैर-प्राप्ति शहर' (Non-attainment Cities) वे शहर होते हैं जो पिछले पांच वर्षों के दौरान राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानकों (NAAQS) का लगातार उल्लंघन करते हैं और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) द्वारा निर्धारित स्वीकार्य सीमा से अधिक वायु प्रदूषण स्तर दर्ज करते हैं। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग IV-क' (मूल कर्तव्य - अनुच्छेद 51-क) तथा स्वर्ण सिंह समिति (Swaran Singh Committee) की सिफारिशों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. मूल कर्तव्यों को मूल संविधान में शामिल नहीं किया गया था, बल्कि इन्हें वर्ष 1976 के 42वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा सरदार स्वर्ण सिंह समिति की सिफारिशों के आधार पर संविधान में जोड़ा गया था, और वर्तमान में संविधान में कुल 11 मूल कर्तव्य हैं जिन्हें अनुच्छेद 51-क के अंतर्गत रखा गया है। 2. 11वाँ मूल कर्तव्य, जिसके तहत छह से चौदह वर्ष की आयु के बच्चों के माता-पिता या संरक्षण को अपने बच्चे को शिक्षा के अवसर प्रदान करने का कर्तव्य सौंपा गया है, उसे वर्ष 2002 के 86वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा जोड़ा गया था। 3. भारतीय संविधान के अंतर्गत ये सभी मूल कर्तव्य प्रकृति से न्यायोचित (Justiciable) हैं, जिसका अर्थ है कि यदि कोई नागरिक अपने किसी मूल कर्तव्य का पालन नहीं करता है, तो संसद या राज्य विधानमंडल उसके उल्लंघन पर कानूनी कार्रवाई या दंड का प्रावधान करने के लिए स्वतंत्र हैं, और इन्हें लागू करने के लिए संविधान में सीधे तौर पर रिट अधिकारक्षेत्र का प्रावधान किया गया है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 105' (संसद के सदनों की तथा उनके सदस्यों और समितियों की शक्तियाँ, विशेषाधिकार आदि) के अंतर्गत प्राप्त 'संसदीय विशेषाधिकारों' (Parliamentary Privileges) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 105 के तहत संसद के सदस्यों को सदन में या उसकी किसी समिति में कही गई किसी बात या दिए गए किसी मत के संबंध में किसी भी न्यायालय में किसी भी कानूनी कार्रवाई से उन्मुक्ति (Immunity) प्राप्त होती है, और यह संरक्षण संसद के सदस्यों के साथ-साथ उन व्यक्तियों पर भी समान रूप से लागू होता है जिन्हें सदन की कार्यवाही में बोलने और भाग लेने का अधिकार दिया गया है (जैसे महान्यायवादी)। 2. जब संसद का सत्र चल रहा हो या सत्र आरंभ होने के 40 दिन पूर्व और सत्र समाप्त होने के 40 दिन पश्चात् तक, संसद के किसी भी सदस्य को किसी सिविल मामले में गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है, और यह विशेषाधिकार दीवानी मामलों के साथ-साथ आपराधिक मामलों (Criminal Cases) और निवारक नजरबंदी (Preventive Detention) के मामलों में भी समान रूप से पूर्ण सुरक्षा प्रदान करता है। 3. भारत के संविधान ने संसद के प्रत्येक सदन को अपने विशेषाधिकार के हनन या सदन की अवमानना (Contempt of the House) के लिए किसी व्यक्ति (चाहे वह सदस्य हो या बाहरी व्यक्ति) को दंडित करने और सदन से निष्कासित करने की शक्ति प्रदान की है, और यदि सदन किसी व्यक्ति को अपने विशेषाधिकार हनन के लिए कारावास का दंड देता है, तो न्यायालय 'बंदी प्रत्यक्षीकरण' के माध्यम से उस आदेश की न्यायिक समीक्षा कर सकते हैं। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Log in to add to quiz, bookmark, or report issues.