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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 143' के अंतर्गत 'उच्चतम न्यायालय से परामर्श करने की राष्ट्रपति की शक्ति' (Power of President to consult Supreme Court) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत राष्ट्रपति को यह शक्ति प्राप्त है कि यदि उसे प्रतीत होता है कि विधि या तथ्य का कोई ऐसा प्रश्न उत्पन्न हुआ है या उत्पन्न होने की संभावना है, जो लोक महत्व का है, तो वह उस प्रश्न पर उच्चतम न्यायालय की राय प्राप्त करने के लिए उसे विचारार्थ भेज सकता है।
- 2. अनुच्छेद 143 के तहत उच्चतम न्यायालय के लिए यह अनिवार्य (Mandatory) है कि वह राष्ट्रपति द्वारा परामर्श के लिए भेजे गए प्रत्येक मामले (चाहे वह संवैधानिक मामलों से जुड़ा हो या पूर्व-संविधान संधियों और करारों से उत्पन्न विवादों से) पर अपनी राय राष्ट्रपति को अवश्य दे।
- 3. उच्चतम न्यायालय द्वारा अनुच्छेद 143 के अधीन दी गई सलाह या राय राष्ट्रपति पर किसी भी स्थिति में बाध्यकारी (Binding) नहीं होती है, और न ही यह सलाह भारतीय न्यायक्षेत्र के अंतर्गत एक 'पूर्ण निर्णय' (Judgment) या दृष्टांत (Precedent) होती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 143 के अनुसार, यदि राष्ट्रपति को यह प्रतीत होता है कि विधि या तथ्य का कोई ऐसा प्रश्न उत्पन्न हुआ है या उत्पन्न होने की संभावना है, जो लोक महत्व का है, तो वह उस पर उच्चतम न्यायालय की राय मांग सकता है।
कथन 2 गलत है: अनुच्छेद 143 के तहत दो प्रकार के मामलों का प्रावधान है। प्रथम श्रेणी (लोक महत्व के सामान्य प्रश्न) के मामलों में उच्चतम न्यायालय के लिए राष्ट्रपति को सलाह देना 'विवेकाधीन' (Discretionary) है, यानी न्यायालय चाहे तो अपनी राय देने से इनकार कर सकता है (जैसे 'अयोध्या मामले' में 1993 में हुआ था)। हालांकि, द्वितीय श्रेणी के मामलों में (जो कि संविधान लागू होने से पहले की किसी संधि, समझौते, प्रसंविदा या अन्य समान दस्तावेजों से उत्पन्न विवादों से संबंधित हैं), उच्चतम न्यायालय के लिए राष्ट्रपति को अपनी राय देना **अनिवार्य** है। इसलिए यह कहना गलत है कि प्रत्येक मामले में राय देना अनिवार्य है या सभी मामलों में न्यायालय बाध्य है।
कथन 3 गलत है: यद्यपि उच्चतम न्यायालय द्वारा दी गई सलाह राष्ट्रपति पर बाध्यकारी नहीं होती है (राष्ट्रपति इसे मानने के लिए स्वतंत्र हैं), किंतु यह सलाह केवल एक विधिक राय होती है और इसे पारंपरिक अर्थों में 'निर्णय' (Judgment) नहीं कहा जा सकता, तथापि सर्वोच्च न्यायालय के परामर्शदात्री अधिकार क्षेत्र (Advisory Jurisdiction) के अंतर्गत दिए गए ये परामर्श भविष्य के मामलों के लिए उच्च न्यायालयों और अन्य न्यायालयों के लिए उच्च साक्ष्यात्मक महत्व रखते हैं।
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भारतीय अर्थव्यवस्था और सतत विकास के संदर्भ में, 'हरित债券' (Green Bonds) तथा 'जलवायु वित्तपोषण' (Climate Finance) के प्रावधानों और मानकों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. हरित बॉन्ड एक प्रकार का निश्चित आय वाला वित्तीय उपकरण है, जिसे विशेष रूप से सकारात्मक पर्यावरणीय और/या जलवायु लाभ वाली परियोजनाओं के लिए धन जुटाने के लिए जारी किया जाता है, तथा इसे केवल संप्रभु सरकारों (Sovereign Governments) द्वारा ही जारी किया जा सकता है, कॉर्पोरेट संस्थाओं द्वारा नहीं।
2. भारत में 'संप्रभु हरित बॉन्ड' (Sovereign Green Bonds) फ्रेमवर्क के अंतर्गत प्राप्त होने वाली आय को सार्वजनिक क्षेत्र की उन परियोजनाओं में लगाया जाता है जो देश के सकल ग्रीनहाउस गैस (GHG) उत्सर्जन की तीव्रता को कम करने में सहायता करती हैं, और इसके तहत प्रत्यक्ष रूप से जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuels) से जुड़ी ऊर्जा उत्पादन परियोजनाओं को भी वित्तपोषित करने की पूर्ण अनुमति होती है।
3. भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने हरित ऋण पत्रों (Green Debt Securities) के लिए भारतीय बाजारों में विनियामक ढांचा स्थापित किया है, जिसके तहत जारीकर्ताओं के लिए यह अनिवार्य किया गया है कि वे जुटाई गई राशि के उपयोग और उसके पर्यावरणीय प्रभावों की निगरानी तथा स्वतंत्र तृतीय-पक्ष (Third-party) समीक्षा की रिपोर्ट नियमित रूप से सार्वजनिक करें।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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संसदीय कार्यवाही में शून्यकाल का समय कब होता है?
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संबलपुर रियासत का ब्रिटिश साम्राज्य में विलय किस वर्ष हुआ था?
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भारतीय पर्यावरण, पारिस्थितिकी एवं जैव विविधता के संदर्भ में, 'राष्ट्रीय हरित अधिकरण' (National Green Tribunal - NGT) और इसके क्षेत्राधिकार के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) की स्थापना वर्ष 2010 में 'राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010' के अंतर्गत पर्यावरण संरक्षण, वनों और अन्य प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से संबंधित कानूनी अधिकारों के प्रभावी और तीव्र प्रवर्तन के लिए की गई थी, और यह भारत का ऐसा पहला विशेष न्यायिक निकाय है जो पर्यावरण संबंधी मामलों के लिए सामान्य न्यायालयों की प्रक्रियात्मक संहिताओं (जैसे सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908) से पूरी तरह बाध्य नहीं है।
2. इस अधिकरण के क्षेत्राधिकार के अंतर्गत 'वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980' और 'पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986' जैसे प्रमुख कानून शामिल हैं, किंतु 'वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972' और 'अनुसूचित जातियों और अन्य पारंपरिक वन जातियों (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006' (Forest Rights Act) को इसके विधायी क्षेत्राधिकार से बाहर रखा गया है।
3. NGT के लिए यह अनिवार्य किया गया है कि वह किसी भी पर्यावरण संबंधी आवेदन या अपील की प्राप्ति की तारीख से अधिकतम 6 महीने की अवधि के भीतर अपने अंतिम निर्णय या आदेश का निपटारा करे, तथा इसके निर्णयों के विरुद्ध अपील सीधे सर्वोच्च न्यायालय में ही की जा सकती है, जिसके लिए उच्च न्यायालयों का क्षेत्राधिकार वर्जित किया गया है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 72' के अंतर्गत राष्ट्रपति की 'क्षमादान की शक्ति' (Pardoning Power) और इसकी न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति को किसी ऐसे अपराध के लिए जिसमें दंड या वधियाज्ञा (Sentence of Death) दी गई है, क्षमा, प्रविराम, विराम या परिहार करने की अथवा दंडादेश के निलंबन, परिहार या लघुकरण की शक्ति प्राप्त है, और इस शक्ति का प्रयोग वह केंद्रीय मंत्रिमंडल की सलाह के बिना अपने स्वविवेक से कर सकता है।
2. ऐतिहासिक 'इEकेरुद्दीन बनाम आंध्र प्रदेश राज्य' तथा 'एतवा बरिया' जैसे मामलों में उच्चतम न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि राष्ट्रपति की क्षमादान की शक्ति न्यायिक समीक्षा के दायरे से पूरी तरह बाहर है और न्यायालय इस शक्ति के प्रयोग में राष्ट्रपति या सरकार द्वारा लिए गए निर्णयों की मनमानी या दुर्भावना के आधार पर समीक्षा नहीं कर सकता है।
3. राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति और राज्यपाल की अनुच्छेद 161 के तहत प्रदत्त क्षमादान शक्ति के बीच एक मुख्य अंतर यह है कि राष्ट्रपति मृत्युदंड (Death Sentence) को पूरी तरह माफ कर सकता है और सैन्य न्यायालय (Court Martial) द्वारा दिए गए दंड के विरुद्ध भी क्षमादान दे सकता है, जबकि राज्यपाल मृत्युदंड को माफ नहीं कर सकता और न ही सैन्य न्यायालय के निर्णयों पर क्षमादान दे सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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