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भारतीय पर्यावरण, पारिस्थितिकी और जैव विविधता के संदर्भ में, 'संकटापन्न प्रजातियों के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर कन्वेंशन' (CITES) और वन्यजीव संरक्षण से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. CITES एक अंतरराष्ट्रीय समझौता है जिसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जंगली पशुओं और पौधों के नमूनों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार से उनके अस्तित्व को कोई खतरा न हो, तथा यह कन्वेंशन कानूनी रूप से बाध्यकारी (Legally binding) है, जो घरेलू कानूनों के स्थान पर सीधे तौर पर सदस्य देशों में लागू होता है।
- 2. CITES के 'परिशिष्ट I' (Appendix I) में उन प्रजातियों को रखा जाता है जो विलुप्त होने के कगार पर हैं और व्यापार के कारण सबसे अधिक संकटग्रस्त हैं, तथा इन प्रजातियों के नमूनों का अंतरराष्ट्रीय व्यापार केवल असाधारण परिस्थितियों में ही अनुमति योग्य होता है, जिसमें वाणिज्यिक उद्देश्यों के लिए व्यापार पूरी तरह से प्रतिबंधित है।
- 3. 'वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972' (Wildlife Protection Act, 1972) के अंतर्गत हाल ही में किए गए संशोधनों के अनुसार, इस अधिनियम की सूचियों (Schedules) की संख्या को घटाकर चार कर दिया गया है, जिसमें CITES के अंतर्गत सूचीबद्ध प्रजातियों के प्रबंधन के लिए एक अलग से समर्पित अनुसूची का प्रावधान किया गया है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 गलत है: CITES (Convention on International Trade in Endangered Species of Wild Fauna and Flora) सरकारों के बीच एक अंतरराष्ट्रीय समझौता है जिसका उद्देश्य वन्यजीवों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार को विनियमित करना है। हालांकि यह कन्वेंशन सदस्य देशों के लिए कानूनी रूप से बाध्यकारी (Legally binding) है, लेकिन यह राष्ट्रीय कानूनों का स्थान नहीं लेता है; बल्कि, प्रत्येक सदस्य देश को इस समझौते को लागू करने के लिए अपने स्वयं के घरेलू और राष्ट्रीय कानून बनाने तथा उन्हें लागू करने की आवश्यकता होती है।
कथन 2 सही है: CITES के 'परिशिष्ट I' (Appendix I) में दुनिया की उन सबसे अधिक संकटग्रस्त पादप और जंतु प्रजातियों को शामिल किया जाता है जो विलुप्त होने के खतरे का सामना कर रही हैं। CITES इन प्रजातियों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर पूर्ण प्रतिबंध लगाता है, और इसका व्यापार केवल तभी अनुमति योग्य होता है जब वह किसी गैर-वाणिज्यिक उद्देश्य (जैसे वैज्ञानिक अनुसंधान) के लिए हो, जिसके वास्ते सख्त परमिट प्रणाली की आवश्यकता होती है।
कथन 3 गलत है: वन्यजीव (संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2022 (Wildlife Protection Amendment Act, 2022) के माध्यम से मूल अधिनियम की सूचियों (Schedules) की संख्या को 6 से घटाकर 4 कर दिया गया है। इसमें अब सामान्य वन्यजीवों के लिए दो अनुसूचियाँ (Schedule I और II), पादपों के संरक्षण के लिए एक अनुसूची (Schedule III), तथा CITES के अंतर्गत आने वाले नमूनों के लिए 'विशिष्ट अनुसूची IV' (Schedule IV) का प्रावधान किया गया है। यहाँ कथन 3 में यह कहा गया है कि CITES के लिए अलग अनुसूची है, किंतु संशोधन अधिनियम के तहत सूचियों की कुल संख्या चार की गई है और CITES अनुसूची चौथी अनुसूची के रूप में शामिल है, लेकिन कथन 1 के असत्य होने के कारण समग्र विकल्प 'केवल 2' सही उत्तर बनता है। (नोट: UPSC पैटर्न के अनुसार परिशिष्ट और अनुसूची का यह सूक्ष्म अंतर परीक्षा में भ्रमित करने के लिए होता है, अतः यहाँ केवल कथन 2 सही है क्योंकि कथन 1 में CITES को घरेलू कानूनों के स्थान पर सीधे लागू होने वाला बताया गया है जो कि भ्रामक है)।
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भारतीय पर्यावरण, पारिस्थितिकी और जैव विविधता के संदर्भ में, 'जैविक विविधता अधिनियम, 2002' (Biological Diversity Act, 2002) और उससे जुड़े संस्थागत तंत्र के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. जैविक विविधता अधिनियम, 2002 रियो डी जेनेरियो में आयोजित 'जैविक विविधता पर कन्वेंशन' (CBD) के प्रति भारत की प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के लिए अधिनियमित किया गया था, जिसका मुख्य उद्देश्य जैविक संसाधनों का संरक्षण, उनके घटकों का सतत उपयोग और जैविक संसाधनों के उपयोग से उत्पन्न होने वाले लाभों का न्यायसंगत और निष्पक्ष बंटवारा करना है।
2. इस अधिनियम के तहत राष्ट्रीय स्तर पर 'राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण' (NBA) की स्थापना की जाती है, जो कि एक सांविधिक निकाय है, तथा यह प्राधिकरण विदेशी नागरिकों, निगमों या अनिवासी भारतीयों (NRIs) द्वारा किसी भी जैविक संसाधन को प्राप्त करने या जैव-सर्वेक्षण करने के लिए पूर्व अनुमति देना अनिवार्य बनाता है।
3. इस त्रि-स्तरीय प्रशासनिक ढांचे के अंतर्गत राज्य स्तर पर 'राज्य जैव विविधता बोर्ड' (SBB) और स्थानीय स्तर पर गठित 'जैव विविधता प्रबंधन समितियाँ' (BMCs) आती हैं, जिनमें 'राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण' को देश के सभी क्षेत्रों में जैव विविधता विरासत स्थल (Biodiversity Heritage Sites) घोषित करने की अनन्य और अंतिम शक्ति प्राप्त होती है, जिसमें राज्य सरकारों की सहमति की कोई आवश्यकता नहीं होती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, 'भारतीय निर्वाचन आयोग' (Election Commission of India) और निर्वाचन सुधारों से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के भाग XV के अंतर्गत अनुच्छेद 324 से 329 तक निर्वाचन आयोग की स्थापना, शक्तियों और प्रक्रियाओं का प्रावधान किया गया है, जिसके अनुसार निर्वाचन आयोग एक स्थायी और स्वतंत्र निकाय है जो संसद, राज्य विधानमंडलों, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के पदों के लिए सभी चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण का कार्य करता है।
2. मुख्य चुनाव आयुक्त (Chief Election Commissioner) और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, तथा संविधान में यह अनिवार्य किया गया है कि निर्वाचन आयोग को बहु-सदस्यीय निकाय बनाने से पूर्व संसद द्वारा एक विशेष बहुमत वाला कानून पारित किया जाना आवश्यक है।
3. निर्वाचन आयुक्तों को उनके पद से हटाने की प्रक्रिया और उनके सेवा शर्तें सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान होती हैं, जबकि मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए केवल राष्ट्रपति की इच्छा ही सर्वोपरि होती है और उसे संसद के महाभियोग प्रस्ताव की आवश्यकता नहीं होती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग IX' और 'भाग IX-A' के अंतर्गत 'पंचायतों' तथा 'नगरपालिकाओं' से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. 73वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 द्वारा संविधान में जोड़ी गई ग्यारहवीं अनुसूची के अंतर्गत पंचायतों को आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय के लिए योजनाएं तैयार करने के संबंध में कुल 29 कार्यात्मक विषय सौंपे गए हैं, तथा इस भाग के प्रावधान देश के सभी राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों पर बिना किसी अपवाद के पूर्ण रूप से अनिवार्य रूप से लागू होते हैं।
2. 74वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 के तहत नगरपालिकाओं के तीन प्रकार - नगर पंचायत, नगर परिषद और नगर निगम - का गठन किया जाता है, तथा प्रत्येक नगरपालिका में वार्ड समितियों (Ward Committees) का गठन उन नगरपालिकाओं के लिए अनिवार्य है जिनकी जनसंख्या दस लाख या उससे अधिक है।
3. पंचायतों और नगरपालिकाओं दोनों के चुनावों का अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण करने तथा मतदाता सूचियों को तैयार कराने की शक्ति राज्य के राज्यपाल द्वारा नियुक्त किए जाने वाले 'राज्य निर्वाचन आयोग' (State Election Commission) में निहित होती है, जिसे हटाने की प्रक्रिया और शर्तें उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान होती हैं।
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग X' के अंतर्गत 'अनुसूचित और जनजाति क्षेत्रों' (Scheduled and Tribal Areas - Articles 244-244A) से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान की 'पाँचवीं अनुसूची' (Fifth Schedule) के तहत असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम को छोड़कर किसी भी राज्य के अनुसूचित क्षेत्रों (Scheduled Areas) के प्रशासन और नियंत्रण से संबंधित उपबंध किए गए हैं, तथा किसी क्षेत्र को 'अनुसूचित क्षेत्र' घोषित करने या उसकी सीमाओं में परिवर्तन करने की शक्ति केवल और केवल संसद में निहित है।
2. 'छठी अनुसूची' (Sixth Schedule) असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम राज्यों के जनजाति क्षेत्रों के प्रशासन के लिए विशेष प्रावधान करती है, जिसके अंतर्गत इन राज्यों में स्वायत्त जिला परिषदों (Autonomous District Councils - ADCs) का गठन किया जाता है, जिन्हें भूमि, वनों, और सामाजिक रीति-रिवाजों से जुड़े मामलों पर कानून बनाने की विधायी शक्तियाँ प्राप्त होती हैं।
3. छठी अनुसूची के अंतर्गत गठित प्रत्येक स्वायत्त जिला परिषद में कुल सदस्यों की संख्या अधिकतम 30 होती है, जिनमें से चार सदस्यों को राज्यपाल द्वारा मनोनीत किया जाता है, जबकि शेष सदस्यों का निर्वाचन वयस्क मताधिकार के आधार पर किया जाता है।
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हुरुन ग्लोबल यूनिकॉर्न इंडेक्स 2026 में भारत की रैंक क्या है?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग IVक' (मूल कर्तव्य - अनुच्छेद 51क) तथा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए विभिन्न निर्णयों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मूल कर्तव्यों को मूल संविधान में शामिल नहीं किया गया था, बल्कि इन्हें स्वर्ण सिंह समिति की संस्तुति पर 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा संविधान के भाग IVक में जोड़ा गया, और वर्तमान में संविधान में कुल 11 मूल कर्तव्य हैं जिन्हें वर्ष 2002 के 86वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा अंतिम बार संशोधित किया गया था।
2. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51क के अंतर्गत उल्लिखित सभी 11 मूल कर्तव्य प्रकृति से वाद योग्य (Justiciable) हैं, जिसका अर्थ है कि यदि कोई नागरिक अपने किसी मूल कर्तव्य का पालन नहीं करता है, तो उसके विरुद्ध उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अनुच्छेद 226 और अनुच्छेद 32 के तहत सीधे रिट याचिका जारी की जा सकती है।
3. 'रंगनाथ मिश्रा बनाम भारत संघ' (2003) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया था कि मूल कर्तव्यों को केवल कानूनी रूप से लागू करने या दण्डित करने का विषय नहीं बनाया जाना चाहिए, बल्कि देश में नागरिकों के बीच इनके प्रति जन-जागरूकता पैदा की जानी चाहिए और इन्हें कानून के अन्य प्रावधानों के साथ समेकित करके लागू किया जाना चाहिए।
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