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भारतीय इतिहास और मध्यकालीन प्रशासन के संदर्भ में, सल्तनत कालीन और मुगलकालीन राजस्व व्यवस्था तथा 'मंसबदारी प्रणाली' से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. मुगल सम्राट अकबर द्वारा आरम्भ की गई मंसबदारी प्रणाली में 'जात' और 'सवार' पद यह निर्धारित करते थे कि संबंधित मंसबदार का व्यक्तिगत दर्जा (पदानुक्रम) क्या है और उसे अपने सैन्य दल में कितने घोड़ों और घुड़सवार सैनिकों का रखरखाव करना होगा, तथा इस व्यवस्था की मूल प्रेरणा मंगोलों की सैन्य और प्रशासनिक संरचना (दशमलव प्रणाली) से ली गई थी।
  2. 2. सल्तनत काल के दौरान अलाउद्दीन खिलजी ने अपनी सैन्य आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए 'हुलिया' (सैनिकों का वर्णनात्मक रिकॉर्ड) रखने और 'चेहरा व दाग' (घोड़ों को दागने) की प्रथा को सख्ती से लागू किया था, और कृषि भूमि पर सीधे कर निर्धारण के लिए उसने 'खराज' की दर को बढ़ाकर उपज का आधा (50 प्रतिशत) कर दिया था।
  3. 3. मुगल शासनकाल में 'मदद-ए-मामाश' (या सयूरगल) राज्य द्वारा विद्वानों, धार्मिक व्यक्तियों और जरूरतमंदों को दी जाने वाली कर-मुक्त भूमि अनुदान थी, जिसे वंशानुगत (Hereditary) रूप से किसी भी परिस्थिति में बदला नहीं जा सकता था और औरंगजेब के शासनकाल में इस पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया था।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है: अकबर द्वारा शुरू की गई मंसबदारी प्रणाली में 'जात' मंसबदार के व्यक्तिगत पद और वेतन को दर्शाती थी, जबकि 'सवार' उसके द्वारा रखे जाने वाले घोड़ों और सैनिकों की संख्या को निर्धारित करता था। इस व्यवस्था का संगठन चंगेज खान की मंगोल सेना की दशमलव प्रणाली पर आधारित था। कथन 2 सही है: अलाउद्दीन खिलजी ने भ्रष्टाचार रोकने के लिए 'दाग' (घोड़ों को दागना) और 'हुलिया' प्रणाली शुरू की थी। उसने दोआब क्षेत्र में भू-राजस्व (खराज) बढ़ाकर उपज का 50% (आधा हिस्सा) कर दिया था। कथन 3 गलत है: 'मदद-ए-मामाश' (सयूरगल) विद्वानों और धार्मिक व्यक्तियों को दी जाने वाली कर-मुक्त अनुदान भूमि थी। यद्यपि शाहजहाँ और औरंगजेब के समय इसकी जाँच की गई और कुछ मामलों में इसे जब्त या कम किया गया, तथापि यह पूर्णतः और सदा के लिए वंशानुगत नहीं थी और इसे शासक द्वारा वापस भी लिया जा सकता था। अत: कथन 3 असत्य है।
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