त्वरित लिंक्स
Civil services
4 views
भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 368' के अंतर्गत संविधान संशोधन की प्रक्रिया और इसकी न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 368 में संविधान संशोधन के दो प्रकार के बहुमतों का प्रावधान किया गया है, तथा राष्ट्रपति के लिए यह संवैधानिक रूप से अनिवार्य है कि वह संविधान संशोधन विधेयक पर अपनी स्वीकृति (Assent) प्रदान करे और वह इस पर अपनी 'जेबी वीटो' (Pocket Veto) शक्ति का प्रयोग नहीं कर सकता है।
- 2. 'केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973)' के ऐतिहासिक निर्णय में उच्चतम न्यायालय की 13 न्यायाधीशों की पीठ ने यह निर्धारित किया था कि संसद को अनुच्छेद 368 के तहत संविधान के किसी भी हिस्से में संशोधन करने की असीमित शक्ति प्राप्त है, जिसमें संविधान की 'मूल संरचना' (Basic Structure) को बदलना या समाप्त करना भी शामिल है।
- 3. 'संविधान (बयालीसवां संशोधन) अधिनियम, 1976' द्वारा अनुच्छेद 368 में खंड (4) और खंड (5) जोड़े गए थे, जिन्हें उच्चतम न्यायालय ने 'मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ (1980)' वाद में इस आधार पर असंवैधानिक घोषित कर दिया था कि न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) का अधिकार संविधान की मूल विशेषता है और इसे संसद द्वारा समाप्त नहीं किया जा सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत संशोधन प्रक्रिया के लिए संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत (और कुछ मामलों में आधे राज्यों के विधानमंडलों के अनुसमर्थन) की आवश्यकता होती है। वर्ष 1971 के 24वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा यह अनिवार्य कर दिया गया कि राष्ट्रपति संविधान संशोधन विधेयक पर अपनी अनुमति देंगे (वे इसे रोक नहीं सकते या वीटो का उपयोग नहीं कर सकते)। कथन 2 गलत है: 'केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973)' वाद में उच्चतम न्यायालय ने यह निर्णय दिया था कि संसद को अनुच्छेद 368 के तहत संविधान में संशोधन करने की शक्ति है, किंतु वह इसके 'मूल ढांचे या आधारभूत संरचना' (Basic Structure) को नष्ट या परिवर्तित नहीं कर सकती है। अतः संसद की संशोधन शक्ति असीमित नहीं है। कथन 3 सही है: 42वें संशोधन द्वारा जोड़े गए अनुच्छेद 368(4) और (5) के तहत यह प्रावधान किया गया था कि संसद द्वारा किए गए किसी भी संशोधन को किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती। 'मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ (1980)' वाद में सुप्रीम कोर्ट ने इन खंडों को असंवैधानिक घोषित कर दिया क्योंकि न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) संविधान की मूल संरचना का एक अनिवार्य हिस्सा है।
Related Questions
→
भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग XI' (केंद्र-राज्य प्रशासनिक संबंध - अनुच्छेद 256 से 263) तथा 'अंतर-राज्यीय परिषद' (Inter-State Council) से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 263 के अनुसार राष्ट्रपति को यह शक्ति प्रदान की गई है कि यदि किसी समय यह प्रतीत हो कि एक अंतर-राज्यीय परिषद की स्थापना से लोकहित होगा, तो वह ऐसी परिषद की स्थापना कर सकता है और उसके कृत्यों, संगठन तथा प्रक्रिया को परिभाषित कर सकता है, और यह एक संवैधानिक निकाय (Constitutional Body) है।
2. 'सरकारिया आयोग' (Sarkaria Commission, 1983-88) की मुख्य सिफारिशों के आधार पर वर्ष 1990 में राष्ट्रपति के आदेश द्वारा 'अंतर-राज्यीय परिषद' का गठन किया गया था, जिसके अध्यक्ष प्रधानमंत्री होते हैं, और इसके सदस्यों में सभी राज्यों के मुख्यमंत्री तथा वे प्रशासक शामिल होते हैं जिनकी विधानसभाएँ नहीं हैं।
3. अंतर-राज्यीय परिषद के अंतर्गत राज्यों के बीच उत्पन्न होने वाले सभी प्रकार के कानूनी और न्यायिक विवादों का अंतिम रूप से न्यायनिर्णयन (Adjudication) करने की अनन्य शक्ति निहित होती है, और इसके द्वारा दिए गए निर्णय उच्चतम न्यायालय के निर्णयों की तरह सभी पक्षों पर पूरी तरह से बाध्यकारी होते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
→
भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग XV' (निर्वाचन - अनुच्छेद 324 से 329क) के अंतर्गत 'भारत के निर्वाचन आयोग' (Election Commission of India) तथा चुनावी सुधारों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 324 के अनुसार निर्वाचन आयोग एक अखिल भारतीय निकाय है, जो संसद, राज्य विधानमंडलों, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के पदों के लिए निर्वाचनों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की शक्ति अपने में निहित रखता है, और मूल संविधान में इसे एक बहु-सदस्यीय निकाय के रूप में स्थापित किया गया था जिसमें मुख्य निर्वाचन आयुक्त के अलावा दो अन्य निर्वाचन आयुक्तों का होना अनिवार्य किया गया था।
2. मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, और संविधान में मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया वही है जो उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने के लिए निर्धारित की गई है, जबकि अन्य निर्वाचन आयुक्तों को मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफारिश के बिना राष्ट्रपति द्वारा उनके पद से नहीं हटाया जा सकता है।
3. निर्वाचन आयोग को संसद या राज्य विधानमंडलों के सदस्यों की अयोग्यता के प्रश्नों पर निर्णय देने की शक्ति सीधे तौर पर प्राप्त नहीं है, बल्कि इस संबंध में आयोग केवल राष्ट्रपति या संबंधित राज्य के राज्यपाल को अपनी परामर्शदात्री (Advisory) राय देता है, और राष्ट्रपति या राज्यपाल इस राय के अनुसार निर्णय लेने के लिए कानूनी रूप से बाध्य होते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
→
स्वराज पार्टी की स्थापना किसने की थी?
→
भारतीय इतिहास के संदर्भ में, सल्तनत काल के दौरान प्रशासनिक व्यवस्था और सैन्य सुधारों से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. सल्तनत काल में 'इक्ता' (Iqta) व्यवस्था एक प्रकार की भू-राजस्व असाइनमेंट प्रणाली थी, जिसके तहत सैन्य कमांडरों या अधिकारियों को वेतन के बदले एक निश्चित क्षेत्र से राजस्व एकत्र करने का अधिकार दिया जाता था, और यह मूल रूप से सुल्तान इल्तुतमिश के शासनकाल में बड़े पैमाने पर संगठित की गई थी।
2. सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने अपनी सेना को मजबूत करने और सैनिकों को नकद वेतन देने के लिए बाजार नियंत्रण (Market Control) और मूल्य स्थिरीकरण की नीति लागू की थी, जिसके तहत उसने घोड़ों की पहचान के लिए 'दाग' (Daag) प्रथा और सैनिकों के हुलिया का पंजीकरण करने की प्रणाली शुरू की थी।
3. मुहम्मद बिन तुगलक के शासनकाल में 'दीवान-ए-कोही' (Diwan-e-Kohi) नामक एक नए कृषि विभाग की स्थापना की गई थी, जिसका मुख्य उद्देश्य राज्य की प्रत्यक्ष देखरेख में बंजर भूमि को कृषि योग्य बनाना और किसानों को तकावी (Takavi) ऋण प्रदान करना था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
→
भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग XX' के अंतर्गत 'संविधान का संशोधन' (Amendment of the Constitution - अनुच्छेद 368) के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत संविधान में संशोधन करने की शक्ति केवल संसद को प्राप्त है, और इस प्रयोजन के लिए संशोधन का आरंभ संसद के किसी भी सदन में एक विधेयक पेश करके ही किया जा सकता है, न कि किसी राज्य के विधानमंडल में।
2. संविधान के कुछ विशिष्ट प्रावधानों (जैसे राष्ट्रपति के निर्वाचन, संघ और राज्यों की कार्यपालिका शक्तियों के विस्तार, या संसद में राज्यों के प्रतिनिधित्व से संबंधित) में संशोधन करने के लिए संसद के दोनों सदनों द्वारा विशेष बहुमत (प्रत्येक सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत तथा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का कम से कम दो-तिहाई बहुमत) के साथ-साथ देश के कम से कम आधे राज्यों के विधानमंडलों द्वारा साधारण बहुमत से अनुसमर्थन (Ratification) होना अनिवार्य है।
3. सर्वोच्च न्यायालय ने 'केशवानंद भारती वाद (1973)' में यह स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 368 के तहत संसद को संविधान के किसी भी भाग में संशोधन करने की व्यापक शक्ति प्राप्त है, जिसके अंतर्गत संविधान की 'मूल संरचना' (Basic Structure) को भी संशोधित किया जा सकता है, बशर्ते इसके लिए देश की जनता से जनमत संग्रह (Referendum) कराया गया हो।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Log in
to add to quiz, bookmark, or report issues.