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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 123' के अंतर्गत राष्ट्रपति की 'अध्यादेश प्रख्यापित करने की शक्ति' (Ordinance-making Power) तथा इससे संबंधित न्यायिक निर्णयों और सीमाओं के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. संविधान के अनुच्छेद 123 के तहत राष्ट्रपति को अध्यादेश प्रख्यापित करने की शक्ति केवल तभी प्राप्त होती है जब संसद के दोनों सदन सत्र में न हों, और इस शक्ति का विस्तार उन्हीं विषयों पर होता है जिन पर कानून बनाने की शक्ति संसद को प्राप्त है, किंतु इसका प्रभाव और मर्यादा वही होती है जो संसद द्वारा बनाए गए अधिनियम की होती है।
  2. 2. 'डी. सी. वाधवा बनाम बिहार राज्य (1987)' मामले में सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने यह स्पष्ट किया कि कार्यपालिका द्वारा अध्यादेशों को बार-बार पुनरप्रख्यापित (Re-promulgation) करना संवैधानिक धोखाधड़ी (Constitutional Fraud) है और यह विधायिका के प्रति कार्यपालिका की जवाबदेही के लोकतांत्रिक सिद्धांत का उल्लंघन करता है।
  3. 3. 'कृष्णा कुमार सिंह बनाम बिहार राज्य (2017)' मामले में सर्वोच्च न्यायालय की सात न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने यह ऐतिहासिक व्यवस्था दी कि अध्यादेश के माध्यम से प्राप्त किए गए वित्तीय लाभों या संपत्तियों को छोड़कर, विधानमंडल के समक्ष अध्यादेश को प्रस्तुत न किए जाने या उसके निरस्त होने पर भी अध्यादेश के अंतर्गत किए गए सभी संविदात्मक (Contractual) और कार्यकारी कार्य स्थायी रूप से वैध बने रहते हैं और उनकी न्यायिक समीक्षा नहीं की जा सकती।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है: संविधान के अनुच्छेद 123 के अनुसार, राष्ट्रपति संसद के विश्रामकाल (Recess) के दौरान अध्यादेश प्रख्यापित कर सकते हैं। इन अध्यादेशों की शक्ति और प्रभाव वही होते हैं जो संसद के किसी अधिनियम के होते हैं, बशर्ते कि उनका विस्तार उन्हीं विषयों पर हो जिन पर संसद कानून बना सकती है। कथन 2 सही है: 'डी. सी. वाधवा बनाम बिहार राज्य (1987)' मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने यह व्यवस्था दी थी कि बिना विधानमंडल के समक्ष रखे अध्यादेशों को बार-बार पुनरप्रख्यापित करना (Re-promulgation) संविधान की लोकतांत्रिक भावना के विरुद्ध और एक 'संवैधानिक धोखाधड़ी' है। कथन 3 गलत है: 'कृष्णा कुमार सिंह बनाम बिहार राज्य (2017)' के 7-न्यायाधीशों की संविधान पीठ के निर्णय के अनुसार, यह एक सामान्य नियम है कि अध्यादेश के कालखंड में किए गए सभी कार्य समाप्त हो जाते हैं यदि वह अधिनियम का रूप नहीं लेता। न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि अध्यादेश के तहत किए गए कार्यों का स्वतः स्थायी रूप से वैध रहना आवश्यक नहीं है, और विधायिका के समक्ष न रखे जाने पर इसके परिणामशीलता की न्यायिक समीक्षा की जा सकती है।
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