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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 352' के अंतर्गत 'राष्ट्रीय आपातकाल' (National Emergency) की उद्घोषणा तथा 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 के बाद इसके विधिक प्रभावों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत राष्ट्रपति पूरे भारत या उसके किसी भाग में राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणा केवल तभी कर सकते हैं जब मंत्रिमंडल (Cabinet) द्वारा लिखित रूप में ऐसा निर्णय राष्ट्रपति को संसूचित किया जाता है, तथा यह लिखित अनुशंसा सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के पूर्व अनुमोदन के अधीन होती है।
  2. 2. 'मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ (1980)' और 'एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994)' मामलों में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणा को इस आधार पर किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती कि यह किस आंतरिक या बाह्य परिस्थितियों के कारण लगाई गई है, क्योंकि यह पूरी तरह से कार्यपालिका का अनन्य और विशुद्ध राजनीतिक निर्णय है।
  3. 3. 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 द्वारा यह प्रावधान किया गया कि राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान भी नागरिकों को प्राप्त 'अनुच्छेद 20' (दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण) और 'अनुच्छेद 21' (प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण) द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों को निलंबित नहीं किया जा सकता है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 गलत है: अनुच्छेद 352(3) के अनुसार राष्ट्रपति राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणा तभी कर सकते हैं जब संघ के मंत्रिमंडल (जिसमें प्रधानमंत्री और कैबिनेट मंत्री शामिल हैं) का निर्णय उन्हें लिखित रूप में संसूचित किया जाता है। इसके लिए सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के पूर्व अनुमोदन की कोई संवैधानिक अनिवार्यता नहीं है। कथन 2 गलत है: 'मिनर्वा मिल्स' और अन्य मामलों में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणा न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के दायरे से बाहर नहीं है। यदि उद्घोषणा माला फाइड (mala fide - दुर्भावनापूर्ण), अप्रासंगिक या मनमाने आधार पर की गई है, तो न्यायालय उसकी न्यायिक समीक्षा कर सकता है। कथन 3 सही है: 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 के माध्यम से यह सुनिश्चित किया गया कि राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान भी किसी भी परिस्थिति में 'अनुच्छेद 20' और 'अनुच्छेद 21' के तहत प्रदत्त मूल अधिकारों को निलंबित नहीं किया जा सकता है।
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